#दोस्ती
सालो पुरानी बात है 2005-06 उस वक्त मैं कक्षा 8 में पढ़ रहा था।
घर के हालात ऐसे थे की वालिद साहब जितना कमाते उतना ही खर्च हो जाता पढ़ाई के लिए भी वालिदा बड़ा पेट काट कर बंदोबस्त करती थी लेकिन हमारे पढ़ाई के साथ हमारी अम्मी ने कभी समझौता नहीं होने दिया भले ही हम एक साधारण स्कूल में पढ़ें हों लेकिन अम्मी का पूरा ध्यान था की मेरे बच्चे सही से पढ़ें।
हमारी फीस अक्सर समय पर जमा नहीं हो पाती थी जिसकी वजह से हमे प्रिंसिपल के द्वारा अक्सर ऑफिस में बुलाया जाता था ताकि याद्ध्यानी होती रहे और हम अपनी वालिदा को रिमांईड करवाते रहें।
पढ़ने में उस वक्त मैं होसियार था जिसकी वजह से मुझे अध्यापकों की कम ही डांट खाने को मिलती थी इसके विपरित यह बात भी हो सकती है कि मेरे साथ के बच्चे पढ़ने में कमजोर हों जिसकी वजह से मैं एक एवरेज स्टूडेंट भी टीचर्स को होनहार लगता होंगा।
एक रात हम सो रहे थे तो रात को तीन बजे शोर सा हुआ तो पता चला वालिद साहब को करंट लग गया जहां वो काम कर रहे थे, हालांकि वालिद साहब की आंख की रोशनी कम होने के अलावा कुछ नही हुआ जो आज ठीक है लेकिन अब वह कुछ और बीमारी से ग्रस्त हैं।
उसी दौरान मेरी दोस्ती एक ऐसे परिवार के बेटे से भी थी जिनका पूरा परिवार बेहद खूबसूरत अखलाक वाला था , चूंकि ऐसा माना जाता है कि मर्द अपने गम को एकदम किसी के सामने शेयर नही करता, यही मैने भी किया ,धीरे धीरे घर में जरूरी चीजों की दिक्कत होती चली गई, और यह बात मेरे दोस्त के साथ साथ उनकी वालिदा मोहतर्म को भी पता चल गई और उन्होंने मुझे बुलाया और कहा कि " तू हमे इतना गैर समझता है कि हमे बताया भी नहीं इतनी दिक्कत चल रही है" मेरी उनके सामने बोलने की हिम्मत ही नही होती थी इसलिए उस वक्त भी खामोश रहकर सुनता रहा ।
फिर अगले को वह अपने खेतों पर से आते वक्त एक बोरी अनाज गेंहू की अपनी भैंसा बुग्गी पर रखकर लाए और हमारे घर पर उतार कर गए।
उस वक्त यह मदद हमारे लिए रेगिस्तान में पानी के समान थी।
Zaif Mirza ( अली भाई)
Sultan Saifi
उपरोक्त दोनो भाई उसी मां के बेटे हैं जिनको एक अच्छी मां पाल पोस कर बड़ा करती उनके अंदर तरबियत झलकती है।
अल्लाह आपके परिवार को हर मुसीबत से बचाए।
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