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कुरान का पैगाम by आक़िब खान पार्ट 12 तक
कुरआन का पैग़ाम पार्ट -
1अहद ए अलस्त (सबसे पहली प्रतिज्ञा)
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अल्लाह तआला ने जब इन्सानों की रूहों की तखलीक (रचना) की तो उनको दो-तीन ऐसे वाक़यात से गुज़ारा कि वो वाक़यात हमेशा-हमेशा के लिए हमारी रूह, हमारे मिज़ाज और हमारी फितरत का हिस्सा बन गए। इस पार्ट में हम कुरआन मजीद की रौशनी में ये समझने की कोशिश करेंगे कि खुदा और उसके बंदों के बीच का ताल्लुक कितना पुराना है। क्या सबसे पहले हमें ख़ुदा के वुजूद के बारे में पैगंबरों या फलसफ़ियों ने बताया या फिर ये हमारे अंदर हमारी पैदाइश के साथ ही से मौजूद रहा है? कुरआन मजीद से हमें ये पता चलता है कि “ख़ुदा का बुनियादी तसव्वुर (संकल्पना)” हमारे अंदर हमेशा से मौजूद रहा है और पैगंबरों ने आकर सिर्फ इसको दोहराया है और इसकी व्याख्या की हैं। यानि अगर किसी इंसान तक पैगंबरों का पैग़ाम नहीं भी पहुंचता है तो भी वो इस फितरत (अंतर्निहित संकल्पना) की बिना पर ख़ुदा के सामने जवाबदेह ज़रूर होगा। कुरआन मजीद से हमें पता चलता है कि अल्लाह तआला ने क़यामत तक आने वाले तमाम इनसानों (उनकी जीवात्माओं) को तखलीक करने के बाद अपने सामने हाज़िर किया और उनसे एक अहद (वचन) लिया, वो यह था कि “अल्लाह एक हैं और वही सबका परवरदिगार है”। ये वाक़या इंसान को ये जिस्म अता करने और उसे इस दुनिया में भेजने से पहले का हैं। ये वाक़या, गुज़रे हुए और आने वाले तमाम इनसानों के साथ हो चुका हैं, आपके और मेरे साथ भी ! इस वाकये को अरबी में “अहद-ए-अलस्त” यानि “सबसे पहली प्रतिज्ञा” कहा जाता हैं। इसे कुरआन में कुछ इस तरह बयान किया गया हैं: (ए पैग़ंबर, उन्हें वो वक़्त भी याद दिलाओ), जब तुम्हारे परवरदिगार ने बनी-आदम की पुश्तों से उनकी नसल को निकाला और उन्हें ख़ुद उनके ऊपर गवाह ठहराया था। (उसने पूछा था): क्या मैं तुम्हारा रब नहीं हूँ? उन्होंने जवाब दिया: हाँ, (आप ही हमारे रब हैं), हम इसकी गवाही देते हैं। ये हमने इसलिए किया कि क़ियामत के दिन तुम कहीं ये ना कह दो कि हम तो इस बात (यानि एकेश्वरवाद) से बेख़बर ही रहे। या अपना ये बहाना पेश करो कि शिर्क (बहुदेववाद) की शुरुवात तो हमारे बाप दादा ने पहले से कर रखी थी और हम बाद को उनकी औलाद हुए हैं, फिर क्या आप उन ग़लतकारों के अमल के बदले में हमें हलाक करेंगे? हम ईसी तरह अपनी आयतों की व्याख्या करते हैं, (इसलिए कि लोगों पर प्रमाण स्थापित हो) और इसलिए कि वो हमारी तरफ प्रवृत्त हों । [सूरह अल आराफ़ 7: 172-174] इस अहद और मुआहिदे (वचन) ने हमारी फितरत में ये सबक रख दिया है कि अल्लाह ही हमारा रब है और हम उसके बंदे हैं। इस आयत में लफ़्ज़ “रब” इस्तेमाल हुआ है जिसका मतलब आक़ा/मालिक होता है। जब हम ये इक़रार करते है कि अल्लाह ही हमारा रब है तो हम आप से आप उसके बंदे हो जाते है। यानि इस अहद से हमने खुदा को तो खुदा माना ही इसके साथ ही अपने बंदे होने को भी कुबूल कर लिया। ये इक़रार हमारे ज़मीर का हिस्सा बन गया है और ये हमसे जुदा नहीं हो सकता चाहे हम किसी भी इलाक़े के हो, किसी भी नस्ल से ताल्लुक रखते हों, किसी भी धर्म के मानने वाले हो, चाहे शहर में रहते हो या किसी गुफा में। अल्लाह रब है और हम उसके बंदे है, ये तसव्वुर एक और चीज़ को बड़ी ज़ोर के साथ नुमाया करता है वो है “जवाबदेही का तसव्वुर”। जैसे ही हमने अपने आप को उसका बंदा मान लिया तो अब हम उसके सामने जवाबदेह भी लाज़िमन होंगे। यानि वो ये हक़ रखता है कि हमसे पूछे कि हमने फलां काम क्यों किया और फलां काम क्यों नहीं किया वगैरह। चुनांचे जवाबदेही का ये एहसास भी इस अहद ने हमारे अंदर रख दिया है। इस अहद (प्रतिज्ञा) से ये बात बिलकुल साफ है कि ख़ुदा और उसके सामने जवाबदेही का तसव्वुर इंसान का प्राकृतिक स्वभाव है। वो अपने वुजूद ही से ये तक़ाज़ा करता हैं कि उसका एक बनाने वाला होना चाहिए। चूंकि ये दुनिया इम्तेहान के उसूल पर बनाई गयी है इसीलिए इस वाकये की याद हमारे ज़हन (स्मृति) से मिटा दी गयी हैं लेकिन इसकी मुहर हमारे (यानि हर इंसान के) दिलों में मौजूद हैं और इसे कोई भी चीज़ नहीं मिटा सकती। ये ठीक उसी तरह है जिस तरह हममें से हर शख़्स माँ के पेट से जन्म लेता है मगर उसकी याद हमारे अंदर मौजूद नहीं रहती। इन्सान को ज़रा तवज्जो दिलाई जाये तो वो ख़ुदा की तरफ़ उसी तरह लपकता है, जिस तरह बच्चा माँ की तरफ़ लपकता है, और इस यक़ीन के साथ लपकता है, जैसे कि वो पहले ही से उसको जानता था, वो महसूस करता है कि ख़ुदा का ये इक़रार उसका प्रकृतिक स्वभाव हैं जो उसके अंदर ही मौजूद था। इसमें भी शक नहीं कि बाज़ इन्सान कई बार इस हक़ीक़त का इनकार देते है लेकिन ये एक अंतर्विरोध (तज़ाद) मात्र है, इसलिए कि जिस वक़्त वो इनकार कर रहा होता है, ठीक उसी वक़्त वो हर तखलीक (रचना) के लिए एक ख़ालिक़ (रचनाकार) के होनें के उसूल को भी अपनी पूरी ज़िंदगी में मान रहा होता हैं। इसी अहद की बुनियाद पर तमाम इंसान क़यामत के दिन जवाबदेह ठहराये जाएंगे और ख़ुदा की बारगाह में कोई भी शख़्स ये बहाना नहीं बना सकेगा कि उसे किसी पैग़ंबर की दावत नहीं पहुंची या उसने शिर्क (बहुदेववाद) के माहौल में आँख खोली थी और ख़ुदा के इक़रार और उसके एक (अकेला और तन्हा) होने के नतीजे तक पहुंचना उसके लिए मुमकिन नहीं था। खुलासा ये है कि इस वाक़ये से हमारे अंदर दो चीज़ें वुजूद में आ गयी, पहला ये कि अल्लाह ही हमारा रब है और हम उसके बंदे है और दूसरा ये हम अपने कर्मो के प्रति उसके सामने जवाबदेह है। इस वाक़ये ने तमाम इन्सानों के अंदर ये दो तसव्वुर उसकी जड़ (फितरत) में रख दिये है। ..
.कुरआन का पैग़ामपार्ट-2
अच्छाई और बुराई की समझ
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पहले पार्ट में हमने देखा कि कुरआन हमें उस वाक़ये की ख़बर देता हैं जिसमें अल्लाह तआला ने अपनी तौहीद का अहद हमसे लिया था और इस तरह ये बता दिया हैं कि खुदा की मारिफ़त (पहचान) हर इंसान के अंदर इल्हाम (प्रेरित) करके ही उसे दुनिया में भेजा गया हैं। कुरआन बताता हैं कि एक दूसरी चीज़ भी हैं जिसको हमारी फितरत (स्वभाव) में प्रेरित किया गया हैं और वो चीज़ है “अच्छाई और बुराई की पहचान”। यानि इस बात की पहचान कि फलां चीज़ बुराई है और फलां चीज़ अच्छाई है। मिसाल के तौर पर झूठ एक बुराई है और सच एक अच्छाई हैं, इसकी पहचान हमें देकर ही ज़मीन पर भेजा गया हैं। यह बुनियादी समझ हर इंसान के अंदर है चाहे वो हिन्दू हो, बौद्ध हो, मसीही हो, मुसलमान हो या सिरे से किसी मज़हब को मानता ही न हो। कुरआन मजीद इसके लिए “फुजूर” (बुराई) और “तकवा” (अच्छाई) के लफ़्ज़ इस्तेमाल करता हैं। यही अच्छाई/बुराई की पहचान, जज़ा और सज़ा (reward or punishment) के तसव्वुर को जन्म देती है।अल्लाह तआला की तौहीद (एकेश्वरवाद) के बाद दीन का दूसरा सबसे अहम अक़ीदा “आखिरत” (यानि जज़ा और सज़ा) पर ईमान हैं। आखिरत की बुनियाद इसी अच्छाई और बुराई की समझ पर हैं। अगर हम अच्छाई और बुराई की समझ रखते हैं और उनको अलग अलग पहचानते हैं तो उसका लाज़मी नतीजा (स्वाभाविक परिणाम) यह हैं कि हमें उनके अंजाम के बारे में भी ये मानना पड़ेगा कि वो एक जैसा नहीं हो सकता। और अगर वो एक जैसा नहीं हो सकता तो फिर दुनिया में हम जो कुछ कर रहे है एक दिन उसका नतीजा हमारे सामने आना चाहिए। यही दिन “आखिरत” का दिन कहलाता है। जिस तरह इंसान अल्लाह की तौहीद (एकेश्वरवाद) के बारे में ये बहाना नहीं बना सकता कि उसके पास किसी पैग़ंबर का पैग़ाम नहीं पहुंचा था ठीक उसी तरह अच्छाई और बुराई के बारे में भी वो ये बहाना नहीं बना सकता। पूरी इंसानियत इसकी गवाही देती हैं कि अच्छाई और बुराई की बुनियादी समझ हमारे अंदर मौजूद हैं। इन्हीं बुनियादी नैतिकता (अख्लाक़ियत) से ही सामाजिक नैतिकता जन्म लेती हैं। अगर आप इस दुनिया के निज़ाम (कार्य पद्धति) को ही देखें तो पता चलता हैं कि हम, लोगों को अच्छे काम के बदले पुरुस्कार देतें हैं और जुर्म करने के बदले में सज़ा दी जाती हैं, ये दोनों बातें खुद ऊपर बताए गए उसूल की हमारी दुनिया में मौजूद ज़िंदा मिसालें हैं। ये न्याय पद्धति, पुरुस्कार और सज़ा देना, न्यायालय जैसी संस्था का होना असल में उसी समझ का नतीजा हैं जो हमारे अंदर मौजूद हैं और वो इन रूपों में हमारे सामने आती हैं। चूंकि सामाजिक नैतिकता बदलती रहती हैं तो उससे यह गलतफहमी पैदा हो जाती हैं कि असल में “नैतिकता” हमने सामाजिक अनुसंधान से सीखी हैं और इसकी कोई असल बुनियाद नहीं हैं। लेकिन कुरआन मजीद हमें “बुनियादी नैतिकता” और “सामाजिक नैतिकता” को अलग अलग करके बताता हैं कि “बुनियादी नैतिकता” हमारे अंदर मौजूद है लेकिन उसकी बुनियाद पर जो “सामाजिक नैतिकता” जन्म लेती हैं वो वक़्त और माहौल के हिसाब से बदलती रहती हैं। इसे कुरआन में कुछ इस तरह बयान किया गया हैं: और नफ़्स (जीवात्मा) और जैसा कुछ उसे संवारा फिर उसको समझ दी उसकी बुराई और अच्छाई की। कामयाब हुआ वो जिसने अपने नफ़्स को पाक किया और नामुराद हुआ वो जिसने उसे गंदा किया। [सूरह अश-शम्स 91:7-9]इसका खुलासा ये हुआ कि अल्लाह तआला ने जिस तरह इन्सान को देखने के लिए आँखें और सुनने के लिए कान दिए हैं, बिलकुल उसी तरह नेकी और बदी को अलग अलग पहचानने के लिए एक नैतिक चेतना (अखलाक़ी शऊर) भी दी है। इंसान का सिर्फ एक हैवानी और बौद्धिक (अक़्ली) वुजूद ही नहीं बल्कि उसके साथ एक नैतिक वुजूद भी है। ये हक़ीक़त आलमगीर (विश्वव्यापी) हैं और इसी के नतीजे में क़यामत बरपा की जाएगी। तो जो लोग भी अपनी नफ़्स को फ़ुजूर (बुराई) से पाक कर लें और उसको उभारे तो उनके लिए उनके परवरदिगार की तरफ़ से पुरुस्कार है और जो कोई भी अपनी नफ़्स को गंदा करेगा और उसे दबाएगा तो फिर उसका अंजाम भी बुरा ही होगा।
कुरआन का पैग़ाम
पार्ट-3
बुनियादी अख्लाक़ियात (नैतिकता)
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दोस्तों हमने अभी तक ये समझा कि अल्लाह तआला ने इंसान को ज़मीन पर भेजने से पहले ही अपनी पहचान उसके अंदर इल्हाम (प्रेरित) कर दी थी और उसके साथ ही अच्छाई और बुराई की बुनियादी समझ भी उसे दे दी। इन्हीं दो चीजों पर सारे दीन की बुनियाद हैं। दीन इसी चीज़ को कहते हैं कि हम स्वीकार करें कि हमारा एक परवरदिगार हैं जो अकेला और तन्हा हैं और इसके साथ ये भी कि अच्छाई अच्छाई हैं और बुराई बुराई हैं और इसके लाज़मी नतीजे (स्वाभाविक परिणाम) को भी हम माने कि बुराई और अच्छाई का परिणाम एक जैसा नहीं हो सकता और अगर एक नहीं हो सकता तो फिर एक ऐसा दिन आना ही चाहिए जब बुराई अपने अंजाम तक पहुंचे और अच्छाई अपना सिलाह पाये। बुराई/अच्छाई की ये समझ हमारे अंदर सिर्फ बुनियादी नैतिकता की हद तक इलहाम (प्रेरित) की गयी हैं और इन्हीं से सामाजिक नैतिकता वुजूद में आती हैं जो माहौल के अनुसार बदलती भी हैं। अब सवाल ये पैदा होता हैं कि वो बुनियादी नैतिकता आख़िर क्या है? कुरआन मजीद ने इसे सूरह नहल में बहुत साफ-साफ बयान किया हैं। आयत मुबारक में तीन चीजों की हिदायत की गयी हैं और तीन चीजों से रोका गया हैं। चुनांचे इरशाद हैं:
हक़ीक़त ये है कि अल्लाह अदल, अहसान और ईताए ज़िल कुरबा यानि रिशतेदारों को उनके अधिकार देते रहने की हिदायत करता है और फहशा (बेहयाई), मुनकर (बुराई) और बग़ी (सरकशी) से रोकता है। वो तुम्हें नसीहत करता है ताकि तुम याददहानी हासिल करो।
[सूरह नहल 16:90]
इन्सान की फितरत जिन फ़ज़ाइल और अख़लाक़ को पाने और जिन बुरी चीजों से बचने का तक़ाज़ा करती है, उनकी बुनियादें इस आयत मुबारक में वाज़िह कर दी गई हैं । ख़ैर और शर्र (अच्छाई और बुराई) के ये उसूल बिलकुल फ़ितरी हैं, लिहाज़ा ख़ुदा के दीन में भी हमेशा एक समान रहे हैं। तौरत के दस अहकाम (ten commandments) इन्ही पर मबनी (आधारित) हैं और क़ुरआन ने भी अपने तमाम अख़लाक़ी अहकाम में इन्ही की तफ़सील की है।
आयत मुबारक में जिन बातों की हिदायत की गयी हैं वो ये है:
1. अदल : अल्लाह हमें अदल यानि इंसाफ़ की हिदायत करता हैं। इसका मतलब ये हैं कि दूसरे का हक पूरा पूरा अदा कर दिया जाये चाहे जिसका हक़ अदा किया जा रहा हो वो कमज़ोर हो या ताकतवर या चाहे हम उसे पसंद करते हो या नहीं। हमें हर हाल मे हक़ अदा करना है। ये एक आलमगीर तसव्वुर हैं यानि इस तसव्वुर को पूरी दुनिया मानती है। रियासतें, संयुक्त राष्ट्र यहाँ तक कि दुनिया का नज़्म इसी तसव्वुर पर कायम हैं।
2. अहसान: इसका मतलब ये हैं कि इंसान एक दूसरे के साथ अच्छा रवैया करें। ये “अदल” से बढ़कर हैं क्योंकि “अदल” में तो इंसान सिर्फ हक़ देता हैं लेकिन “अहसान” में वो उससे कुछ ज़्यादा भी देता हैं। इस से मुराद सिर्फ ये नहीं कि हक़ अदा कर दिया जाये बल्कि हक़ से कुछ ज़्यादा दें और ख़ुद अपने हक़ से कुछ कम पर राज़ी हो जाएं।
3. ईताए ज़िल कुरबा: अल्लाह तआला ने दुनिया को जैसे बनाया है उसमें बहुत से रिश्ते वुजूद में आते हैं। इन रिश्तों को पहचानना और उनका हक़ अदा करना “ईताए ज़िल कुरबा” का मतलब हैं। ये रिश्ते हमारे माल पर भी हक़ रखते हैं। अगर अल्लाह ने हमें आर्थिक तौर पर मजबूत और हमारे किसी रिशतेदार को कमजोर बनाया हैं तो ये हमारा फर्ज़ हैं कि हम उसकी ज़रूरत का ख्याल रखें। उन्हें किसी हाल में भूका-नंगा ना छोड़ें और अपने बाल बच्चों के साथ उनकी ज़रूरतें भी जिस हद तक मुम्किन हो, फ़य्याज़ी के साथ पूरी करने की कोशिश करें ।
“अदल”, “अहसान” और ईताए ज़िल कुरबा यानि “रिश्तेदारों का हक़ अदा करना” ये तीनों बुनियादी नैतिकता हैं। इसके अलावा तीन बातें वो है जिनसे हमें रोका गया हैं वो हैं फहशा, मुनकर और बग़ी। एक एक करके इनको समझते हैं:
1. फहशा: इसका तात्पर्य उन शारीरिक सम्बन्धों से हैं जिन्हें दीन ने मना किया हैं। इनकी तफसील करने की ज़रूरत नहीं है क्योंकि ये हर शख़्स समझता है।
2. मुनकर: इसका मतलब किसी का हक़ मारना है। और इसमे वो बुराईयां भी शामिल है जिन्हें इन्सान आमतौर पर बुरा जानते हैं और हमेशा से बुरा कहते रहे हैं और जिनकी बुराई ऐसी खुली हुई है कि इसके लिए किसी इस्तिदलाल की ज़रूरत नहीं होती।
3. बग़ी: यानि किसी की जान, माल या इज्ज़त के खिलाफ ज़्यादती। यानी आदमी अपनी क़ुव्वत, ताक़त और ज़ोर और असर से नाजायज़ फ़ायदा उठाए, हद से आगे बढ़े और दूसरों के हुक़ूक़ (rights) पर, चाहे वो हुक़ूक़ ख़ालिक़ (ख़ुदा) के हों या उसकी मख़लूक़ के, हड़प करने की कोशिश करे।
ये वो तीन चीज़ें है जिनसे हमें रोक गया है। एक दिलचस्प बात आपको बताऊँ कि जिस आयत मुबारक की तफसील हमनें अभी देखी है वो आप हर हफ्ते जुमे के खुतबे में सुनते है। लेहाज़ा में अरबी में भी आयत मुबारक को लिख रहा हूँ ताकि आपको याद आ जाएँ:
إِنَّ اللَّـهَ يَأْمُرُ بِالْعَدْلِ وَالْإِحْسَانِ وَإِيتَاءِ ذِي الْقُرْبَىٰ وَيَنْهَىٰ عَنِ الْفَحْشَاءِ وَالْمُنكَرِ وَالْبَغْيِ ۚ يَعِظُكُمْ لَعَلَّكُمْ تَذَكَّرُونَ
खुलासा यह है कि हमें “अदल”, ”अहसान” और “ईताए ज़िल कुरबा” को अपनाना है और “फहशा”, “मुनकर” और “बग़ी” से हर हाल मे रुकना है।
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कुरआन का पैग़ामपार्ट-4
पैग़ंबरों का सिलसिला क्यों?
अल्लाह तआला ने अपनी मारिफ़त (पहचान) इंसान के अंदर इल्हाम की और इसके साथ ही उसे अच्छाई और बुराई की / भी दी और इसी की बुनियाद पर हर इंसान क़यामत के दिन खुदा के सामने जवाबदेह होगा। अब सवाल ये पैदा होता है कि फिर पैगंबरों का सिलसिला क्यों शुरू किया गया? उसकी क्या ज़रूरत आन पड़ी ? कुरआन मजीद ने इसका जवाब सूरह बकराह की आयत 213 में दिया है । कुरआन मजीद हमें बताता है कि सबसे पहले इंसान (यानि हज़रत आदम) को जब दुनिया में भेजा तो नबी बनाकर भेजा गया और जो बुनियादी हिदायत इंसान के अंदर इल्हाम (प्रेरित) की हुई थी हज़रत आदम उसी की तज़कीर (याददिहानी) करते थे।लोगों में दीन के मामले में कोई इख्तिलाफ़ (मतभेद) नहीं था, वो अपने अंदर जिन बातों को मानते थे अपने बाप की तज़कीर के नतीजे में उसी को अपनाये हुए थे। यहाँ तक कि एक लंबा अरसा गुज़र गया फिर लोगों के दरमियान इख्तिलाफ़ (मतभेद) पैदा होने लगे। वही हक़ीक़त जो इंसान के अंदर इलहाम (प्रेरित) की गयी थी उसकी अलग अलग व्याख्या होने लगी। लेहाज़ा इस मतभेद को ख़त्म करने के लिए और लोगों को सही व्याख्या से दोबारा अवगत कराने के लिए ही अंबिया का सिलसिला शुरू किया गया।इसे कुरआन में कुछ इस तरह बयान किया गया हैं:सारे मनुष्य एक ही उम्मत (समुदाय) थे । फिर उनमें इख़तिलाफ़ (मतभेद) पैदा हुआ तो अल्लाह ने नबी भेजे, शुभसूचना देने वाले और इंज़ार (ख़बरदार) करने वाले और उनके साथ क़ौल-ए-फ़ैसल (यानि निर्णायक शब्द) की सूरत में अपनी किताब नाज़िल की ताकि लोगों के बीच वो उनके मतभेदों का फ़ैसला कर दें । और उसमें इख़तिलाफ़ नहीं किया मगर उन्हीं लोगों ने जिनको ये दी गई थी, सिर्फ परस्पर ज़्यादती करने के लिए, जबकि उनके पास साफ साफ हिदायात आ चुकी थीं । फिर ये जो (क़ुरआन के) मानने वाले हैं , अल्लाह ने अपनी तौफ़ीक़ (अनुज्ञा) से सत्य के विषय में उनके सब मतभेदों में उनकी रहनुमाई की । और अल्लाह जिसको चाहता है , (अपने क़ानून के मुताबिक़) सीधी राह की हिदायत अता फ़रमाता है। [सूरह बकरह 2:213]आयत के बाद वाले हिस्से में ये भी कहा गया है कि अल्लाह तआला “किताब” नाज़िल फरमाते है तो दीन की उन बातों में फैसला करने के लिए नाज़िल फरमाते हैं जिनमें लोग मतभेद कर रहे होते हैं। यह मक़ाम खुदा की नाज़िल की हुई हर किताब का है चाहे वो तौरात हो या फिर कुरआन। इससे एक रहनुमाई ये भी मिलती हैं कि कुरआन मजीद हमारे बीच एक ऐसी मीज़ान (मानदंड) हैं जिससे हम अपने बीच दीन के बारें में मौजूद मतभेदों का फैसला कर सकते हैं। क्या हमनें अपने जीवन में कुरआन को यह मक़ाम दिया है? अपने आप से पूछिये! ये हमारी ज़िम्मेदारी हैं कि हम अपने हर अकीदे और हर वो अमल ''जो हम दीन समझ कर करते हैं'' को कुरआन की रौशनी में परखे।।।।
।कुरआन का पैग़ामपार्ट-5
इतमाम ए हुज्जत
पिछले पार्ट में हमने देखा कि इंसानियत के शुरुवाती दौर में मज़हब के बारे में कोई इख्तिलाफ़ (मतभेद) नहीं था उसके बाद धीरे धीरे इख्तिलाफ़ पैदा हुए और अल्लाह तआला ने पैग़मबरों के ज़रिये से इंसान को सचेत किया और उनके साथ किताबें भी नाज़िल की ताकि वो अपने दरमियान मतभेदों का फैसला उसकी रोशनी में कर लें।। कुरआन मजीद में इसके अलावा पैगंबरों के आगमन की एक अहम वजह और बताई गयी है और वो है अपनी क़ौम पर “इतमाम ए हुज्जत” करने के लिए। इतमाम ए हुज्जत का मतलब होता है कि सच्चाई को इस हद तक वाज़ेह (स्पष्ट) कर दिया जाये कि उससे इन्कार करने का कोई बहाना बाकी न रहें। इसके लिए ये तरीका इख्तियार किया गया कि अल्लाह तआला ने हर क़ौम की तरफ एक "रसूल" भेजा। और रसूल ने ख़ुदा का पैगाम पहुंचाया और उस पैग़ाम को इस हद तक स्पष्ट किया कि उससे इनकार करने के लिए कोई बहाना बाकी न रहा। फिर जब ये बात साफ हो गयी कि क़ौम इनकार पर अड़ गयी है और जानते बूझते सच को झुटला रही हैं तो फिर उनका फैसला सुना दिया गया। अब सवाल ये है कि ये फैसला किस तरह सुनाया जाता है? इसका जवाब है कि जो लोग रसूल पर ईमान ले आते हैं और हक़ को मान लेते हैं उनको इस दुनिया में बालादसती (वर्चस्व) दी जाती है और जो लोग इनकार पर अड़ चुके होते हैं उनको पहले तो आज़ाब से ख़बरदार किया जाता है फिर आखिरकार उनपर अज़ाब नाज़िल कर दिया जाता हैं। वो क़यामत जो बड़े पैमाने पर पूरी इंसानियत के लिए बरपा होनी है उसे छोटे पैमाने पर उस क़ौम के ऊपर बरपा करके दिखाया जाता हैं। आपने कुरआन में कई जगह पढ़ा होगा और सुना भी होगा कि क़ौम ए नूह पर आज़ाब आया, क़ौम ए हूद पर आज़ाब आया, क़ौम ए लूत तबाह कर दी गयी इत्यादि । ये तमाम आज़ाब इसी कानून के नतीजे में नाज़िल होते हैं। इसी कानून को “कानून इतमाम ए हुज्जत” कहा जाता हैं। क़ुरआन का इरशाद है कि रसूलों की तरफ़ से इतमाम-ए-हुज्जत के बग़ैर ये अज़ाब किसी क़ौम पर कभी नहीं आया। चुनांचे फ़रमाया है कि:हम कभी सज़ा नहीं देते, जब तक एक रसूल ना भेज दें। [सूरह अल इसरा 17:15] इस पर ये सवाल किया जा सकता है कि ये इतमाम-ए-हुज्जत किस तरह होता है? क़ुरआन से मालूम होता है कि इस के लिए तीन चीज़ें ज़रूरी हैं:1. सबसे पहला ये ख़ुदा का रसूल दुनिया में मौजूद हो और वो किसी क़ौम को अपने ऊपर ईमान लाने की दावत दे।2. दूसरा ये कि क़ौम को इतनी मोहलत दी जाये कि उसके लोग अगर चाहें तो रसूल को आकर देखें और उसकी ज़बान से सीधे तौर पर ख़ुदा का पैग़ाम सुनें। 3. तीसरा ये कि रसूल और उसके साथीयों के साथ ख़ुदा की निशानियों का ज़हूर (नुमाया होना) उनकी आँखों के सामने होना और इस शान के साथ हो जाये कि इसके बारे में कोई दूसरी राय क़ायम करना मुम्किन ना रहें और इसके बाद किसी के लिए कोई बहाना ख़ुदा के सामने पेश करने के लिए बाक़ी नहीं रहे। इन तीनों शर्तों के पूरा होने के बाद इनकार करने वालों पर ये अज़ाब दो तरीकों से नाज़िल होता है। पहला ये कि अगर रसूल पर ईमान लाने वाले लोग बहुत कम तादाद में हो तो उन्हें हिजरत (migration) करने को कहा जाता है उसके बाद अल्लाह तआला उस क़ौम पर फरिश्तों के जरिये से आज़ाब नाज़िल कर देते हैं कभी बाढ़ की सूरत में, कभी पत्थरों की बारिश की सूरत में, कभी तेज़ कड़क की सूरत में इत्यादि। इस तरह का अज़ाब क़ौम ए नूह, क़ौम ए आद, क़ौम ए समूद इत्यादि पर नाज़िल हुआ था। दूसरा तरीक़ा ये कि यदि रसूल के मानने वाले अधिक तादाद में हैं और इसी के साथ उनके पास एक हुकूमत भी कायम हो गयी है तो फिर ये आज़ाब अल्लाह तआला मुसलमानों की तलवार के ज़रिये से मुनकिरीन (इन्कार करने वालों) पर नाज़िल करते हैं। हज़रत मुहम्मद (स) की क़ौम के लोगों पर इस दूसरे तरीक़े के मुताबिक आजाब नाज़िल किया गया यानि सहाबा किराम (र) की तलवारों के ज़रिये। चूंकि मुहम्मदुर रसूलअल्लाह आख़री रसूल थे तो इतमाम-ए-हुज्जत के बाद आज़ाब का ये सिलसिला भी क़यामत तक के लिए ख़त्म कर दिया गया है। कुरआन मजीद ने इस कानून को सूरह युनूस की एक आयत में बहुत संक्षिप्त में बयान किया हैं। प्रत्येक समुदाय के लिए एक रसूल है। फिर जब उनके पास उनका रसूल आ जाता है तो उनके बीच न्यायपूर्वक फ़ैसला कर दिया जाता है। उनपर कुछ भी अत्याचार नहीं किया जाता। [सूरह युनूस 10:47]सबसे अहम बात जो यहाँ समझने की है वो ये कि कुरआन मजीद में “किताल” (जंग) की बहुत सी आयात इसी अज़ाब से मुतल्लिक़ (संबंधित) है। जैसे सूरह तौबाह (नंबर 9) तो पूरी अज़ाब की ही सूरह है। चूंकि हज़रत मुहम्मद (स) एक रसूल थे और जब आपने, अपनी क़ौम पर जब इतमाम ए हुज्जत कर दिया तो ख़ुदा के इस कानून के तहत क़ौम पर आज़ाब नाज़िल हुआ। और ये अज़ाब मुसलमानों की तलवार के जरिये से नाज़िल किया गया। ये आज़ाब बिलकुल उसी नोइय्यत (प्रकार) का था जैसे आपसे पहले आए रसूलों की क़ौम पर इन्कार के नतीजा में नाज़िल हुआ था। इन आयतों को पढ़ते वक़्त चूंकि लोग कानून इतमाम ए हुज्जत से नावाकिफ रहते है और वो इन आयात को आज के जमाने का कोई हुक्म समझ बैठते है और इससे ये गलत नतीजा निकालते है कि कुरआन काफिरों को मारने की तालीम देता है। हालांकि ये आज़ाब की आयतें है और ये आप(स) की मुखातब क़ौम के मुनकिरीन के लिए ख़ास (specific) थी और हक़ीक़त में इनका आज के वक़्त से कोई भी संबंध नहीं है। इसलिए कुरआन मजीद को पढ़ते वक़्त इस कानून को ज़हन में रखें। इस कानून की और भी डिटेल्स है लेकिन आर्टिकल ज़्यादा तवील न हो इसलिए इतने पर ही रुक रहे हैं। इसी के साथ “नबी” और “रसूल” के बीच के फर्क को भी यहीं समझ लें। अल्लाह तआला किसी क़ौम पर इतमाम ए हुज्जत सिर्फ “रसूल” के जरिये से फरमाते है न कि “नबी” के जरिये। “नबियों” की ज़िम्मेदारी सिर्फ इतनी होती है कि वो अपनी क़ौम तक ख़ुदा का पैगाम पहुंचा दे और उन्हें क़यामत के दिन से खबरदार करें। लेकिन रसूलों की इसके अलावा एक और ज़िम्मेदारी है वो है इतमाम ए हुज्जत के बाद इसी दुनिया में अपनी क़ौम का फैसला करके रुखसत होना। तो इससे मालूम हुआ कि हर रसूल नबी है लेकिन हर नबी रसूल नहीं होता। हज़रत मुहम्मद (स) आखरी नबी भी है और आखरी रसूल भी। ..
..।।कुरआन का पैग़ामपार्ट-6.
दीन एक ही है
!अल्लाह तआला ने अपनी मारिफ़त (पहचान) इंसान के अंदर इल्हाम की और इसके साथ ही उसे अच्छाई और बुराई की पहचान भी दी जिसकी बुनियाद पर हर इंसान क़यामत के दिन खुदा के सामने जवाबदेह होगा। फिर हमने देखा कि इंसानियत के शुरुवाती दौर में मज़हब के बारे में कोई इख्तिलाफ़ (मतभेद) नहीं था उसके बाद धीरे धीरे इख्तिलाफ़ पैदा हुए और अल्लाह तआला ने पैग़मबरों के ज़रिये से इंसान को सचेत किया और उनके साथ किताबें भी नाज़िल फरमायी। इसी के साथ हमनें ये भी देखा कि अल्लाह के चुने हुए पैगंबर जिनहे रसूल कहा जाता है उन्होनें अपनी- अपनी क़ौमों पर इतमाम ए हुज्जत किया और उसके बाद उनकी क़ौमों का फैसला इसी दुनिया में सुना दिया गया। चुनांचे इनकार करने वालों पर आज़ाब नाज़िल हुआ। और ईमान लाने वालों को इसी दुनिया की ज़िंदगी में वर्चस्व प्रदान प्रदान किया गया। अब यहाँ सवाल ये है कि इन तमाम पैगंबरों (नबी और रसूल) का दीन आख़िर क्या था? कुरआन मजीद हमें बताता है कि इन सभी पैगंबरों का दीन "इस्लाम" था। इस्लाम का अर्थ होता है "ख़ुदा की आज्ञा का पालन करना" । कुरआन के अनुसार “इस्लाम” सबसे क़दीम (प्राचीन) मज़हब है जिसको मानने वाले सबसे पहले इंसान यानि हज़रत आदम (Adam) एवं उनकी पत्नी हज़रत हव्वा (Eve) है। और ये दीन असल में उसी चीज़ की याददिहानी और तफसील के लिए आया था जिसे अल्लाह तआला ने बुनियादी तौर पर इंसान की फितरत में रखा था (यानि तौहीद और अच्छाई/बुराई की समझ)। मज़हब की तारीख़ को जब हम कुरआन की रोशनी में देखते है तो मालूम होता है कि असल में मज़हब सिर्फ इस्लाम ही है बाकी जितने भी मज़हब है वो या तो किसी दार्शनिक (फलसफियाना) नज़रिये से निकले हैं या फिर वो मूल इस्लाम धर्म के फिरके हैं। हज़रत मुहम्मद (स) का मर्तबा इस्लाम को शुरू करने वाली हस्ती का नहीं है बल्कि इस्लाम के नवजीवनदाता का है। खुद हज़रत मुहम्मद (स0) ने अपने आप को किसी नए मज़हब का संस्थापक नहीं बताया बल्कि उसी “दीन ए कय्यिम” का प्रचारक बताया है जो हमेशा से ख़ुदा के पैग़ंबरों का दीन रहा है। हज़रत मुहम्मद (स) से पहले जो भी पैगंबर इस दुनिया मे आए जैसे की हज़रत आदम, हज़रत नूह, हज़रत इब्राहीम, हज़रत मूसा, हज़रत दाउद, हज़रत ईसा इत्यादि (सब पर अल्लाह की सलामती और रहमत हो) सभी का दीन इस्लाम (यानि ईश्वर का आज्ञापालन) ही था। इसे कुरआन में कुछ इस तरह बयान किया गया हैं: उसने तुम्हारे लिए वही दीन निश्चित किया है जिसकी हिदायत उसनें नूह को फ़रमाई और जिसकी वही, (ए पैग़ंबर), हमने तुम्हारी तरफ़ की है और जिसका हुक्म हमने इबराहीम और मूसा और ईसा को दिया कि (अपनी ज़िंदगी में) इस दीन को क़ायम रखों और उसमें विभेद पैदा ना करो। तुम जिस चीज़ की तरफ़ उन मुशरिकों को बुला रहे हो (कि ये ख़ुदा को एक मानें), वो उनपर बहुत शाक़ गुज़र रही है। अल्लाह जिसको चाहता है, अपनी तरफ़ आने के लिए चुन लेता हैं, लेकिन अपनी तरफ़ आने की राह वो उन्हीं को दिखाता है जो उस की तरफ़ मुतवज्जे होते हैं। [सूरह शूरा आयत 42:13] कुरआन के अनुसार हज़रत मुहम्मद (स) इस्लाम के पहले नबी नहीं है बल्कि आखरी नबी है। ठीक ऐसे ही "कुरआन" मजीद अल्लाह तआला की नाज़िल की हुई पहली नहीं बल्कि आख़री किताब है। और तो और इस दुनिया में सबसे पहले मुस्लिम भी हज़रत मुहम्मद (स0) नहीं बल्कि इंसानियत के बाप हज़रत आदम और उनकी पत्नी हज़रत हव्वा (सलामुन अलयहा) हैं। जैसा की हमने देखा कि इस्लाम असल में ख़ुदा की फर्माबरदारी का नाम है, इस परिभाषा के हिसाब से, तारीख़ में जिस जिस इंसान ने भी एक ख़ुदा के रब होने को कुबूल किया और उसके हुक्म का पालन किया वो शख्स मुस्लिम यानि ईश्वर का आज्ञाकारी ही कहलता है। यानि हज़रत आदम, हज़रत नूह, हज़रत इब्राहीम, हज़रत मूसा, हज़रत दावूद, हज़रत ईसा इत्यादि सभी पैगंबर और इन सभी हस्तियों पर उनके उनके दौर में हक़ीक़ी ईमान लाने वाले तमाम इंसान वासत्व में मुस्लिम ही है। ।।।।।।
...कुरआन का पैग़ामपार्ट-7
नबुव्वत के दो दौर
नबुव्वत के दो दौर है। पहला दौर हज़रत आदम (अ) से शुरू होता है और हज़रत इब्राहीम (अ) पर ख़त्म होता है और दूसरा दौर हज़रत इब्राहीम से शुरू होता है और हज़रत मुहम्मद (स) पर आकार ख़त्म हो जाता है। पहले दौर में अल्लाह तआला ने हर क़ौम में एक रसूल भेजा और किताबें भी नाज़िल की गयी। कुरआन ने हमें इस दौर के चंद अंबिया के नाम बताए है जो निम्नलिखित है: 1. हज़रत आदम 2. हज़रत इदरीस 3. हज़रत नूह 4. हज़रत हूद 5. हज़रत सालेह (सब पर अललह की रहमत हों) चुनांचे कुरआन मजीद में इरशाद है: हर क़ौम के लिए एक रसूल है। [सूरह युनूस 10:47] कोई उम्मत (दुनिया में) ऐसी नहीं गुज़री कि उसके पास (हमारा) ख़बरदार करने वाला पैग़म्बर न आया हो। [सूरह फातिर 35:24] और (हमारा तरीक़ा यही है कि) हमने जो रसूल भी भेजा है, उस क़ौम की ज़बान में भेजा है, इस लिए कि वो उन्हें अच्छी तरह खोल कर समझा दे।[सूरह इब्राहीम 14:4] दूसरा दौर हज़रत इब्राहीम (अ) से शुरू होता हैं। हज़रत इब्राहीम के दो बेटे थे, बड़े बेटे का नाम इसमाईल था और छोटे बेटे का नाम इसहाक था।हज़रत इसहाक़ के बेटे थे हज़रत याक़ूब जिनका एक नाम इसराईल भी था। इसी वजह से उनके बारह बेटों और उनकी पूरी नस्ल को "बनी इसराईल" (या यहूदी) कहा जाता है। वहीं दूसरी और हज़रत इसमाईल की नस्ल "बनी इसमाईल" कहलाई। इसको आसानी से ऐसे समझ लीजिये हज़रत इसहाक़ ---> बनी इसहाक़ = बनी इसराईल = यहूदी हज़रत इसमाईल ---> बनी इसमाईल इस दौर में अल्लाह तआला ने ये फैसला किया कि पैग़ाम पहुंचाने के इस अज़ीम मनसब (स्टेटस) पर अब वो एक पूरी उम्मत को सरफराज करेगा। चुनांचे सय्यदना हज़रत इब्राहीम ने जब बाबिल में अपनी क़ौम पर इतमाम ए हुज्जत कर दिया तो फिर उनसे कहा गया कि आप अपनी एक औलाद को “कनआन” यानि फिलिस्तीन में आबाद कीजिये और दूसरे को “जज़ीरा-ए-अरब” में । बनी-इसहाक़, कनआन में और बनी-इसमाईल अरब में आबाद किए गए। इन दोनों के ज़िम्मे ये काम लगाया गया कि वो ख़ुदा का मरकज़ बनाएँगे और पूरी दुनिया को क़ौमी हैसियत से ख़ुदा का पैगाम देंगे। एक लंबे अरसे तक अल्लाह तआला ने नबुव्वत उन्हीं के लिए ख़ास (विशिष्ट) कर दी। इसमें भी दो चरण है: पहले चरण में बनी इसराईल (इसहाक़ की औलाद) की तरफ पैगंबर आए, किताबें आई और उनसे ये तक़ाज़ा किया गया कि फिलिस्तीन (कनआन) के इलाक़े को तौहीद का मरकज़ (केंद्र) बनाएँ और दुनिया को पैगाम पहुंचाएँ । अल्लाह तआला ने लगभग 2000 साल तक इस ख़िदमत को अंजाम देने का मौका बनी इसराईल (यहूदियों) को दिया। फिर दूसरे चरण में हज़रत इब्राहीम की दूसरी शाख़ बनी इसमाईल का चुनाव किया गया और उनमें हज़रत मुहम्मद (स0) की पैदाइश हुई और आप बनी इसमाईल के दूसरे और पूरी दुनिया के आखरी पैग़ंबर है। बनी इसहाक़ = बनी इसराईल = यहूदी ----> कनआन में आबाद हुए बनी इसमाईल ----> जज़ीरा ए अरब में आबाद हुए इसे कुरआन मजीद में कुछ इस तरह बयान किया गया है: अल्लाह ने आदम और नूह को, और इबराहीम और इमरान की नस्ल को तमाम दुनिया वालों पर तर्जीह देकर (उनकी हिदायत के लिए) मुंतख़ब फ़रमाया । [सूरह अल इमरान 3:33] क़ुरआन मजीद में बनी इसराईल (यहूदियों) की तरफ जो पैग़ंबर भेजे गए उनमें से बाज़ का ज़िक्र किया है, उनके नाम है: इसहाक़, याक़ूब, यूसुफ, शुऐब, अय्यूब, ज़ुल किफ्ल, मूसा, हारून, दाऊद, सुलैमान, इलयास, अल-यसअ, यूनुस, जकरिय्या, यह्या, ईसा(सब पर अल्लाह की सलामती हो) और बनी इसमाईल में दो पैगंबर आए पहले हज़रत इसमाईल और दूसरे हज़रत मुहम्मद(स) जो बनी-इसमाईल के साथ साथ पूरी दुनिया के भी (क़यामत तक के लिए) आखरी पैगंबर है।.
.कुरआन का पैग़ामपार्ट-8
दो क़िस्म की आयतें
कुरआन हमारे लिए “मीज़ान” और “फुरकान” है यानि एक ऐसी कसौटी है जिससे हक़ और बातिल का फैसला किया जाता है। जब हम इसका अध्ययन करते है तो हमें बताया जाता है कि इसके अंदर दो क़िस्म की आयतें हैं एक “मुहकमात” और दूसरी “मुताशाबिहात”। और फिर ये भी बताया जाता है कि हमें सिर्फ “मुहकमात” ही पर ध्यान देना चाहिए और “मुताशाबिहात” पर ज़्यादा छानबीन नहीं करना चाहिए। आख़िर इसका क्या मतलब है? “मुहकमात” और “मुताशाबिहात” क्या होती हैं?लेकिन सबसे पहले देखते है कि कुरआन मजीद ने इस बात को कैसे बयान किया है:वही है जिसने तुम पर ये किताब उतारी है जिसमें आयतें “मुहकम” भी हैं जो इस किताब की असल बुनियाद हैं और (उन के इलावा) कुछ दूसरी “मुतशाबिहात” भी हैं। सो जिनके दिल फिरे हुए हैं, वो इसमें से हमेशा “मुतशाबिहात” के पीछे पड़े होते हैं, इसलिए कि फ़ितना पैदा करें और इसलिए कि उनकी हक़ीक़त मालूम करें, लेकिन असल में उनकी हक़ीक़त अल्लाह के सिवा कोई नहीं जानता। (इस के बर-ख़िलाफ़) जिन्हें इस इलम में रसूख़ है, वो कहते हैं कि हम उन्हें मानते हैं, ये सब हमारे परवरदिगार ही की तरफ़ से है, और (हक़ीक़त ये है कि इस तरह की चीज़ों को) वही समझते हैं जिन्हें अल्लाह ने अक़ल अता फ़रमाई है।[सूरह अल इमरान 3:7]“मुहकम आयत” से मतलब वें आयतें हैं जिनमें ऐसी हक़ीक़तें बयान की गयी हैं जिन्हें पूरी तरह से समझना इंसान के लिए मुमकिन है, जो उसके इलम और अक़ल से परे नहीं हैं और जिनकी तय तक पहुंचने की सलाहीयत उसकी फ़ित्रत (स्वभाव) में मौजूद हैं। कुरआन में अकीदा, अमल, अख़लाक़, नसीहत की बातों को ''मोह्कमात'' कहा जाता है। क़ुरआन की ज़्यादातर आयतें ऐसी ही हैं और इन्हीं पर उसकी हिदायत का दारोमदार है। क़ुरआन ने इसी वजह से उन्हें “उम्मुल किताब”, यानी कुरआन की असल बुनियाद क़रार दिया है।उदाहरण के लिए:लोगो , तुम अपने इस परवरदिगार की बंदगी करो जिसने तुम्हें पैदा किया है और तुमसे पहलों को भी, इसलिए कि तुम (उस के अज़ाब से) बचे रहो, (वही) जिसने तुम्हारे लिए ज़मीन को बिछौना और आसमान को छत बनाया है और आसमान से पानी उतारा है, फिर उससे तुम्हारी रोज़ी के लिए तरह तरह के मेवे पैदा कर दिए हैं । लिहाज़ा तुम अल्लाह के हमसर ना ठहराओ, जबकि तुम (इन सब बातों को ) जानते हो।[सूरह अल बकरह 2:21-22]वहीं दूसरी तरफ “मुताशाबिहात” से तात्पर्य वो आयतें हैं जिनका ज़ाहिरी मतलब समझने में तो कोई दिक्कत नहीं आती लेकिन उनकी वास्तविकता (reality) हम नहीं समझ पाते। इस तरह की आयातों में ज़्यादातर आख़िरत की नेअमतों, जन्नत और जहन्नुम के हालात या अल्लाह तआला के गुण एवं कार्य इत्यादि का वर्णन तमसील (बामुहावरा) और तशबीह (उपमा) की शैली में हुआ होता हैं।“मुताशाबिहात” लफ्ज़ से आप इस संदेह में न पड़े कि इसका मतलब शुबाह (संदेह) में डाल देने वाली आयातें हैं, हरगिज़ नहीं! कुरआन में कुछ भी शुबाह में डालने वाला नहीं है। वो सब चीज़ें जिनके लिए अभी अलफ़ाज़ ही वुजूद में ना आए हों, उन्हें मुहावरे या उपमा की शैली में ही बयान किया जा सकता है। किसी अनदेखी दुनिया (unseen world) की वास्तविकताएँ, दुनिया की सभी भाषाओं के साहित्य में इसी तरह बयान की जाती हैं। चूंकि जन्नत/जहन्नम एक दूसरे आलम(दुनिया) की हक़ीक़त है। लेहाज़ा वहाँ के हालात या नेमतों की कोई भी चीज़ अगर हमें समझाई जाएगी तो हमारी इसी दुनिया के अलफाज़ की मदद से समझाई जा सकती है। इस सूरत में हम उन्हें समझ तो सकते है लेकिन उनकी वास्तविकता को नहीं जान सकते क्योंकि हमने उस अदृश्य जगत का कभी अनुभव ही नहीं किया होता है। मिसाल के तौर पर, आज से "दो सदी" पहले कोई शख़्स अगर भविष्य का ज्ञान पाकर उस वक़्त एक लोगों के सामने बिजली के बल्ब का वर्णन करता तो संभवतः इसी तरह करता कि दुनिया में ऐसे चिराग़ जलेंगे जिनमें ना तो तेल डाला जाएगा और ना ही उन्हें आग दिखाने की ज़रूरत होगी। “मुताशाबेह आयात” की ख़ासियत बिलकुल ऐसी ही हैं । वो अनिश्चित नहीं हैं और ना ही उनके अर्थ में कोई अस्पष्टता है। हाँ, ये ज़रूर है कि उनकी हक़ीक़त हम इस दुनिया में नहीं जान सकते, लेकिन इसे जानने या ना जानने का क़ुरआन को समझने और उससे हिदायत हासिल करने से चूँकि कोई ताल्लुक़ नहीं है, इसीलिए किसी साहिब-ए-ईमान को इसके पीछे नहीं पड़ना चाहिए।इनका अर्थ जिस हद तक हमारे लिए समझना ज़रूरी है, उतना हमारी समझ में आ जाता है और इससे हमारे इलम और यक़ीन में इज़ाफ़ा होता है, लेकिन अगर हम अपनी हद से आगे बढ़कर उनकी असल हक़ीक़त और सूरत को अपनी गिरिफ़्त में लेने की कोशिश करें तो ये चीज़ फ़ितना बन जाती है और इसका नतीजा सिर्फ ये निकलता है कि इन्सान अपने ज़हन से शक का एक कांटा निकालना चाहता है और उसके नतीजे में बेशुमार कांटे उसके अंदर चुभा लेता है ।इसकी एक और मिसाल ये है कि अगर आप किसी शाकाहारी शख़्स को ये समझाना चाहें कि गोश्त का स्वाद कैसा होता है तो आप उससे ये कहेंगे की "कटहल" जैसा कुछ होता है। लेकिन हम जानते है कि "कटहल" और "गोश्त" के स्वाद में बहुत फर्क होता है लेकिन इसके अलावा उसे समझाया ही नहीं जा सकता। चूंकि उस शख़्स ने कभी गोश्त चखा नहीं होता है तो वो गोश्त के स्वाद की हक़ीक़त को नहीं समझ सकता लेकिन वो "कटहल" का मतलब भी समझता है और उससे गोश्त के स्वाद का कुछ अंदाज़ा भी लगा लेता है। :)उदाहरण के लिए:उस जन्नत की शान, जिसका वादा डर रखनेवालों से किया गया है, यह है कि ऐसे पानी की नहरें होगी जो प्रदूषित नहीं होता। और ऐसे दूध की नहरें होंगी जिसके स्वाद में तनिक भी अन्तर न आया होगा, और ऐसे पेय की नहरें होंगी जो पीनेवालों के लिए मज़ा ही मज़ा होंगी, और साफ़-सुधरे शहद की नहरें भी होंगी। और उनके लिए वहाँ हर प्रकार के फल होंगे और क्षमा उनके अपने रब की ओर से ... [सूरह मुहम्मद 47:15]अब ज़ाहिरी अलफाज से तो हमें समझ आ ही रहा है की पानी, दूध, शहद की नहर का क्या मतलब है लेकिन असल में उनकी हक़ीक़त (reality) कैसी है, उनका स्वाद कैसा होगा, उनको पीने का हम पर क्या असर पड़ेगा इससे हम अंजान है। इसी बात को कुरआन मजीद ने एक जगह बहुत साफ अंदाज़ में बयान किया है:सो किसी को पता नहीं कि उनके आमाल के सिले में उनके लिए आँखों की क्या ठंडक छिपा रखी गई है। [ सूरह सजदाह 32:17]...
..कुरआन का पैग़ामपार्ट-9
इंसान आज़ाद
हैअल्लाह तआला ने हमारे बारे में बहुत से फैसले ऐसे कर दिये है जिन्हें तब्दील करने का इख्तियार हममें से किसी शख़्स के पास नहीं। हमारी शख्सियत क्या होगी, हम कहाँ पैदा होंगे, हमारे वालिदैन कौन होंगे, हमारा वतन कौनसा होगा, हम किस ज़माने में पैदा होंगे वगैरह। ये सारे फैसले अल्लाह तआला ने कर दिये हैं और इनमें से कोई चीज़ हमारे हाथ में नहीं है। इसके अलावा अल्लाह तआला ने हमें जो सलाहियातें देना थी वो भी दे दी गयी है मिसाल के तौर पर कौन शायर होगा, कौन मुसव्विर (पेंटर) होगा, कौन अदीब होगा वगैरह। इसमें भी इंसान का कोई बहुत ख़ास किरदार नहीं होता। ज़ाहिर है इन सबके बारे में आप जवाबदेह भी नहीं होंगे।लेकिन इसके आगे फिर इंसान के इख्तियार का दायरा शुरू होता है। ये दायरा दो पहलुओं से है: एक दुनिया के लेहाज़ से और दूसरा आखिरत के लेहाज़ से। दुनिया के लेहाज़ से इंसान अपनी सलाहियातों को निखारता है , उसे पोलिश करता है, उन्हें बेहतर बनाता है और कई बार उनसे गैर मामूली कारनामे अंजाम देता है। इसका इख्तियार उसे दिया हुआ है। इसी वजह से वो दुनिया में तरह तरह की इजादात (inventions) करता है और कई बार फसाद भी बरपा कर बैठता है। दूसरा दायरा जो आखिरत के लेहाज़ से है वो अख्लाक़ियत का है। इंसान चूंकि अच्छे और बुरे का शऊर रखता है और अपना हर अच्छा बुरा अमल यही समझ रखकर करता है तो उसके नतीजे के बारे में भी वो जवाबदेह होगा। हमारी जवाबदेही केवल इस अखलाकी दायरे में हैं। यानि आखिरत में ये नहीं पूछा जाएगा कि कोई शख़्स फलां वतन में क्यो पैदा हुआ या फलां नस्ल में क्यों पैदा हुए बल्कि ये पूछा जाएगा कि तुमने अपने इरादे और इख्तियार को अखलाकी तौर पर कैसा इस्तेमाल किया मिसाल के तौर पर झूठ, कम तौलाना, किसी का हक़ मारना वगैरह के बारे में सवाल होगा।मालूम हुआ की अल्लाह तआला ने इंसान को कर्म करने की आज़ादी और इख्तियार (Free-Will) दिया है। इरादे और इख्तियार" का ये उसूल इतना ज़ाहिर है कि इसे पूरी दुनिया मानती है। ये इतना साफ और नुमाया उसूल है जिसकी बुनियाद पर इस दुनिया में अदालते कायम है, पुलिस फोर्स तैनात है वगैरह। क्योंकि इंसान को इनाम या सज़ा तभी दिया जाता है जब की कोई काम उसने किया हो। अगर ये सच नहीं है तो चोरी करने पर किसी चोर को जेल मे डालना और समाजसेवा करने पर किसी इंसान को पुरुसकार देना बेकार है क्योंकि इन कामो को भी यही कह कर टाल देना चाहिए की सब तो ख़ुदा की मर्ज़ी से हो रहा है इसमे करने वाले का क्या कमाल या दोष ? असल में हम ये जानते है कि कौनसा काम हम इख्तियार से करते है और कौनसे कामों में हम मजबूर है।बल्कि इन्सान तो स्वयं अपने ऊपर गवाह है। [सूरह अल कियामह 75:14]कुरआन साफ तौर पर बताता है कि अल्लाह तआला ने अच्छाई और बुराई को स्पष्ट कर दिया है और उसके साथ ही इंसान को इख्तियार दिया है की वो जो रास्ता चाहे अपनाएँ।चुनांचे इरशाद है:कह दो, वह सत्य है तुम्हारे रब की और से। तो अब जो कोई चाहे मान ले और जो चाहे इनकार कर दे। [सूरह कहफ 18:29]और हमने उसको रास्ता दिखा दिया, अब चाहे वह शुक्रगुजार बने या नाशुक्रा। [सूरह इंसान 76:3]ये इंसान के इख्तियार और इरादे का बयान है कि अल्लाह तआला ने उसको नेकी और बदी का इम्तियाज़ दे कर उसको इख्तियार बख्शा है की वह चाहे तो नेकी की राह इख्तियार करे, चाहे तो बदी की राह पर चले। अगर नेकी की राह इख्तियार करेगा तो वह अपने रब का शुक्रगुज़ार बंदा बनेगा और उस का इनाम पाएगा और अगर बदी की राह अपनाएगा तो वह नाशुक्रा बनेगा और उसकी सज़ा भुगतेगा।चूंकि अल्लाह तआला ने ये दुनिया इम्तेहान के उसूल पर बनाई है और इंसान को कर्म करने की आज़ादी दी गयी है, चाहे वो अच्छा कर्म करे या बुरा इसलिए उसे इस दुनिया मे उसके कर्म करने से नहीं रोका जाता। आखिरत में इंसान के सारे आमाल का पूरा हिसाब किताब होगा और ये दुनिया सिर्फ और सिर्फ एक मोहलत हैं यानि इम्तेहान के लिए दिया गया वक़्त।इस बात को कुरआन मजीद ने कुछ इस तरह बयान किया है :यदि अल्लाह लोगों को उनकी नाफ़रमानियों पर पकड़ने ही लग जाता तो ज़मीन पर किसी जीवधारी को न छोड़ता, किन्तु वह उन्हें एक मुकर्रर वक़्त तक मोहलत देता है। फिर जब उनका (वह) वक्त अा पहुँचेगा तो न एक घड़ी पीछे हट सकते हैं और न आगे बढ़ सकते हैं।[सूरह अन नहल 16:61].....
.कुरआन का पैग़ामपार्ट-10
क़ानून ए हिदायत
पिछले पार्ट में हमने देखा कि अल्लाह तआला ने इन्सानों को इरादा और इख्तियार दिया है और वो आज़ाद है चाहे जैसा अमल करें, चाहे तो नेकी की राह इख्तियार करे या चाहे तो बदी की राह पर चले। लेकिन एक बात हमने बचपन से सुनी और पढ़ी है कि अल्लाह जिसे चाहता है हिदायत देता है और जिसे चाहता है गुमराह होने देता है। यहाँ तक कि हमने ये भी सुना और पढ़ा है कि अललह तआला दिल पर मोहर लगा देते है, गले पर तौक डाल देते है वगैरह। बज़ाहिर यहाँ ये ऐतराज़ होता है कि जब ख़ुद अल्लाह तआला ही गुमराह कर रहे है तो फिर इसमें इंसान का क्या क़ुसूर वो तो वैसे भी ईमान नहीं ला पाएंगे। ये सारे ऐतराज़ात कुरआन के "कानून ए हिदायत" को न समझने की वजह से होते है। आखिर ये "कानून ए हिदायत" क्या है?कुरआन मजीद के अनुसार अल्लाह तआला ने इंसान को इस दुनिया मे इम्तेहान के लिए भेजा है और सही और गलत रास्ते की पहचान बता दी है। अब चूंकि ये दुनिया इम्तेहान के उसूल पर बनी है तो यहाँ अच्छी चीज़ें भी मौजूद है और लुभाने वाली, प्रलोभन देने वाली बुरी चीज़ें भी मोजूद है । मिसाल के तौर पर, झूठ बोलने से इस दुनिए मे मुमकिन है कि हमे कुछ फायदे हो जाए वहीं दूसरी और सच बोलने से मुमकिन है कि हम परेशानी मे पड़ जाये। लेकिन इंसान जब कोई गलत काम करता है तो उसके ज़मीर में ये बात ज़रूर उभरती है कि ये काम गलत है । उसके अंदर शर्मिंदगी का भाव भी आ जाता है । ये आत्मा की आवाज़ उसे कचोटती रहती है, लेकिन अगर इंसान हर बार अपनी आत्मा की आवाज़ को दबाता जाये तो फिर वही आत्मा की आवाज़ धीरे धीरे कम होने लगती है। इससे ये पता चलता है की आत्मा की ये आवाज़ हमेशा इंसान के अंदर नहीं रहती। और अगर वो ध्यान न दे तो वही आत्म शक्ति कुछ दिन बाद विलुप्त हो जाती है। वही दूसरी तरफ अगर इंसान अपने अंदर की आवाज़ को एहमियत दे तो उसकी आत्म शक्ति बढ़ती जाती है और बुराई को छोड़ने और सच्चाई को स्वीकार करने का जज़्बा भी उसके अंदर बढ़ता जाता है । संक्षिप्त में, जो शख्स अपनी आत्मा की आवाज़ को नहीं दबाता (अपने इख्तियार से) तो उसके लिए हिदायत की राह और आसान हो जाती है और जो शख्स अपनी आत्मा की आवाज़ को दबाता है (अपने इख्तियार से) तो उसके लिए हिदायत की राह मुश्किल होती चली जाती है और वो गुमराह होता चला जाता है। यही है कानून ए हिदायत।कुरआन मजीद ने इसे कई मक़ाम पर अलग अलग पहलुओं से स्पष्ट किया है। मिसाल के तौर पर:तो जिस किसी ने (खुदा की राह मे) धन खर्च किया और खुदा की नाफरमानी से परहेज किया और भलाई को सच माना उसको हम आसान रास्ते (यानि रज़ा ए इलाही) के लिए सहूलत देंगे, रहा वो व्यक्ति जिसने कंजूसी की और बेपरवाही बरती और अच्छी बात को झुठलाया उसको हम सख्त रास्ते (यानि आज़ाब की तरफ बढ़ने) के लिए सहूलत देंगे ।[सूरह लैल 92:5-10]आइये अल्लाह तआला से ख़ुद पूछते है कि वो किसे हिदायत देते है:वह अपनी और आने का रास्ता उसी को दिखाता है जो उसकी तरफ रुजू करता है। [सूरह राद 13:27]रहे वे लोग जिनहोने हमारे मार्ग मे मिलकर प्रयास किया, हम उन्हें ज़रूर अपना मार्ग दिखाएंगे और बेशक अल्लाह नेक काम करने वालों ही के साथ है।“ [सूरह अनकाबूत 29:69]अल्लाह तआला किसे गुमराह होने देता है:गुमराही में वह उन्हीं को डालता है जो फासिक है (यानि सीमा से निकाल जाने वाले हैं)। [सूरह अल बकरह 2:26]मज़ीद इरशाद है:और जो शख़्स रसूल के विरोध पर अड़ गया हो और ईमान लाने वालो के रास्ते के अलावा किसी और रास्ते पर चले, जबकि उसपर सीधा रास्ता स्पष्ट हो चुका हो, तो उसको हम उसी और चलाएँगे जिधर वह खुद फिर गया और उसे जहन्नम मे झोकेंगे जो सबसे बुरा ठिकाना है ।[सूरह निसा 4:115]यानि असल फैसला इंसान अपने बारे में खुद लेता है, वो जैसा रवैय्या अपनाता है ख़ुदा उसके साथ वैसा ही मामला करते हैं। बिलकुल यही उसूल अल्लाह तआला के दिलों पर मोहर लगाने और गर्दनों पर तौक डाल दिये जाने पर भी लागू होता है। जो कोई शख़्स हक़ के मुक़ाबले में सरकशी इख़तियार करता है और जानते बूझते उसे मानने से इनकार कर देता है तो अल्लाह तआला की तरफ़ से उसे पहले तो मोहलत दी जाती है, फिर उस मोहलत से वो अगर फ़ायदा उठाने के लिए तैय्यार नहीं होता तो उस के दिल-ओ-दिमाग़ पर मोहर कर दी जाती है और इस तरह वो ईसी दुनिया में ख़ुदा के अज़ाब की लपेट में आ जाता है। इस मोहर के नतीजे में आदमी का रवैया इस क़दर बिगड़ जाता है और उसके सोचने समझने की सलाहीयत इस क़दर प्रभावित हो जाती है कि उसे सिर्फ़ वही बातें उसे अच्छी लगती हैं जिन से उसके बिगड़े हुए रवैये को सुकून मिले । उसकी सारी दिलचस्पी सिर्फ़ बदी के कामों से रह जाती है। नेकी की बात माक़ूल से माक़ूल तरीके में भी कही जाये तो उससे उसको वहशत होती है। वो कभी दिल की आमादगी के साथ उसे सुनने के लिए तैय्यार नहीं होता।ये क़ानून दुनिया में हर शख्स के ऊपर बिना भेद भाव के बारीकी से लागू होता है । खुलासा ये है कि हिदायत उन्हे मिलती है जो हिदायत के सच्चे तालिब हैं और गुमराही के हवाले वही लोग किए जाते है जो अपने लिए खुद अपनी मर्ज़ी से, सच्चाई के स्पष्ट हो जाने के बाद, हठधर्मी की बिना पर गुमराही का रास्ता इख्तियार कर लें।एक सादा पहलु इस पूरी बहस का यह भी है कि हिदायत और गुमराही का यह सारा कानून चूंकि अल्लाह ही ने बनाया है तो वह उसको (यानि गुमराही एवं हिदायत को) अपनी तरफ मंसूब करता है। जैसे अल्लाह तआला पानी बरसाता है लेकिन देखने में तो पानी जल चक्र (water cycle) के नतीजे में बादल बरसाता है, लेकिन चूंकि यह बादल के बनने और फिर बरसने का सारा निज़ाम अल्लाह ही ने बना दिया है तो इसलिए अल्लाह पानी बरसाने को अपनी तरफ मंसूब करता है !
।कुरआन का पैग़ामपार्ट-11
ईमान बिल ग़ैब
कुरआन मजीद हमको “ग़ैब” पर ईमान लाने की दावत देता है। अब सवाल ये पैदा होता है कि आख़िर “ग़ैब” का मतलब क्या है? हमारे यहाँ आमतौर पर “ग़ैब पर ईमान” का मतलब बताया जाता है “बिना सोचे समझे ईमान लाना” बल्कि हक़ीक़त में ये मतलब बिलकुल ग़लत है। "ईमान बिल ग़ैब" का असल मतलब होता है बिन देखे ईमान लाना न कि बिन सोचे समझे। कुरआन मजीद ने हमें जगह जगह ये हिदायत दी है कि अक़ल और शऊर से काम लेना चाहिए और हमारा दीन इंसान की अक़ल को मुख़ातिब करता है। कुरआन मजीद ने अपने सारे हुक्म और अकीदे इसी बुनियाद पर इन्सानों के सामने पेश किए है। कुरआन मजीद ने कहीं ये नहीं कहा कि हमें बिना सोचे समझे ईमान लाना चाहिए और दीन के मसले में कोई सवाल नहीं करना चाहिए। उसने जो बात भी कही है, उसके लिए हर जगह अक्ली दलाइल पेश किए हैं और वो इन दलाइल से मुंह मोड़ने वालों को खबरदार करता है कि वे अपनी अक़ल से काम क्यों नहीं लेते। कुरान मजीद की दावत इस चीज़ पर है कि लोग उसे समझे और उसपर ग़ौर करें। अगर आप इमानियात ही को देखे तो कुरआन मजीद खुदा के वुजूद के बारे में दलाइल देता है, ठीक ऐसे ही रसूल पर ईमान लेने के बारे में वो दलाइल देता है कि सच्चे रसूल की क्या क्या अलामात होती है और उसपर लोगों को मुतनब्बेह करता है (ध्यान दिलाता है)। ठीक ऐसे ही आखिरत के बारे में बताता है कि आखिरत आखिर क्यों आएगी। हमारे साथ मसला ये है कि हमने कुरआन मजीद को कभी समझा नहीं होता है इसलिए हम उसके दिये हुए दलाइल से नावाकिफ रहते है। हम खुद भी बिना सोचे समझे मानते है और जब कोई शख़्स हमसे पूछता है कि आप ऐसा क्यों मानते हो तो हम लाजवाब हो जाते है। चुनांचे इरशाद है: इस में शक नहीं कि आसमानों और ज़मीन के बनाने (creation) में, और रात और दिन के बदल कर आने में, और लोगों के लिए दरिया में नफ़ा की चीज़ें लेकर चलती हुई कश्तीयों में, और उस पानी में जो अल्लाह ने आसमान से उतारा है, फिर उससे ज़मीन को उसके मर जाने के बाद ज़िंदा किया है और उसमें हर किस्म के जानदार फैलाए हैं, और हवाओं के फेरने में, और आसमान व ज़मीन के दरमयान हुक्म के ताबे बादलों में , (इस हक़ीक़त को समझने के लिए) बहुत सी निशानीयां हैं उनके लिए जो अपनी अक़ल से काम लेते हैं। [सूरह अल बकरह 2:164] यक़ीनन अल्लाह के नज़दीक बदतरीन जानवर यही बेहरे गूंगे लोग है जो अक़ल से काम नहीं लेते। [सूरह अनफाल 8:22]रात और दिन और सूरज और चांद को उसी ने तुम्हारे काम में लगा रखा है और उसी के हुक्म से सितारे भी तुम्हारे काम में लगे हुए हैं। यक़ीनन इस में इन लोगों के लिए बहुत निशानीयां हैं जो अक़ल से काम लें। [सूरह नहल 16:12] कुरआन मजीद के बारे में इरशाद है: ये एक बाबरकत किताब है जो हमने, (ए पैग़ंबर), तुम्हारी तरफ़ नाज़िल की है। इसलिए कि लोग उसकी आयतों पर ग़ौर करें और इसलिए कि अक़ल वाले इससे याददहानी हासिल करें। [सूरह साद 38:29] तुम उस चीज़ के पीछे ना पड़ो जिसे तुम जानते नहीं हो, इस लिए कि कान, आँख और दिल, उन सबके बारे में पूछा जाएगा। [सूरह इसरा 17:36] ग़ैब के संबंध में कहा गया है: ये किताब ए इलाही है इसमें कोई शक नहीं। हिदायत है उन ख़ुदा से डरने वालों के लिए जो बिन देखे मान रहे है और नमाज़ का इहतेमाम कर रहे है और जो कुछ हमने उन्हें दिया है उसमें से (हमारी राह में) खर्च कर रहे है। [सूरह बकरह 2: 2-3]मालूम हुआ कि जो बात असल मे कही गई है वो है “बिन देखे” ईमान लाना। ज़रा ग़ौर करने से ये बात भी समझ आ जाती है कि “बिन देखे” ईमान लाना ही असल में इंसान का शर्फ और कमाल है क्योंकि देखकर तो जानवर भी मान लेता है। इंसान ही वो हस्ती है जो बिन देखें भी सिर्फ अपनी अक़ल और अपने शऊर की बुनियाद पर भी चीजों को मानने की सलाहियत रखता है। मिसाल के तौर पर इंसान गुरुत्वाकर्षण के बल को देख तो नहीं रहा लेकिन उसे मालूम है कि कोई भी चीज़ को अगर छोड़ा जाये तो वो नीचे गिरती है और वो इस नीचे गिरने के अमल से ही गुरुत्व बल को जान लेता है। यानि महसूस से गैर महसूस का अनुमान लगा लेता है। असल में “ईमान बिल ग़ैब” की दावत तो अक़ल को बेदार करने की दावत है, कि इंसान किसी चीज़ को देख तो नहीं रहा लेकिन ज़रा ग़ौर और फिक्र के नतीजे में उसकी अक़ल उस चीज़ के वुजूद की शहादत दे रही है। मिसाल के तौर पर ये तक़ाज़ा नहीं होना चाहिए कि हम खुदा को देखेंगे तभी मानेंगे या क़यामत आँखों के सामने बरपा हो जाएगी तब मानेंगे क्योंकि ये ऐसे हकाइक है जिनकी शहादत इंसान की अक़ल भी देती है। जिसने सिर्फ देखकर मानने पर इसरार (आग्रह) किया तो उसने अपने आप को इंसान की सतह से उठाकर जानवर की सतह पर रख दिया। इस में भी शक नहीं कि हमारी अक़ल दीन के कई हकाइक खुद मालूम नहीं कर सकती। लेकिन अल्लाह के नबियों की तरफ से उन की वज़ाहत (व्याख्या) के बाद उन्हें समझने की सलाहियत बेशक रखती है। दीन भी इंसान की अक़ल ही को संबोधित करता है। इसलिए वह कोई शिक्षा अक़ल के खिलाफ़ नहीं देता। उसकी सारी शिक्षाएँ अक़ल के मुताबिक हैं और इसी बुनियाद पर हम इसकी दावत दुनिया के सामने रख सकते हैं। आख़िर में अपनी बात इस आयत से पूरी करता हूँ: और वे कहेंगे, "यदि हम सुनते या बुद्धि से काम लेते तो हम दहकती आग में पड़नेवालों में शामिल न होते।" [सूरह मुल्क 67:10]
कुरआन का पैग़ाम
पार्ट-12
क़ामयाबी का पैमाना
मज़हब की बुनियाद पर जब लोग एक गिरोह बन जाते है तो इस गलतफहमी में मुब्तिला हो जाते है कि अब यही गिरोह और इस गिरोह के साथ ताल्लुक उनके लिए नजात का ज़रिया बन जाएगा। कुरआन मजीद ने पूरी शिद्दत के साथ इसका खंडन किया है। हमसे पहले बनी इसराईल ख़ुदा की चुनी हुई उम्मत थे उनके बारे में खुद कुरआन मजीद ये कहता है कि पूरी दुनिया वालो पर फ़ज़ीलत देकर उन्हें परवरदिगार ने अपनी गवाही के लिए और अपने दीन की गवाही के लिए मुंतखब (नियुक्त) किया था। (ये बात हम पिछले पार्ट्स में देख चुके है)। वो लोग भी इसी गलतफहमी में मुब्तला हो गए थे और ये ख्याल करने लगे कि हम चूंकि पैगंबरों की औलाद है, हमारा इंतखाब ख़ुदा ने किया है और हम उसके चहेते है लेहाज़ा हम जो भी करते रहे हमारे साथ वो मामला नहीं होगा जो दूसरी क़ौमों के साथ या दूसरे लोगों के साथ होगा। मुसलमान भी बदकिस्मती से इसी गलतफहमी में मुब्तला हैं। उनका ख्याल भी यह है कि जब कोई शख़्स मुसलमानों के गिरोह मे शामिल हो जाता है तो उसके लिए नजात की जमानत है। कुरआन मजीद ने 2 जगह पर न सिर्फ इसका खंडन किया है बल्कि गैर मामूली तरीक़े से ये बताया है कि गिरोहबंदी, फिरकाबंदी या किसी खास गिरोह के साथ जुड़ाव ये अल्लाह के हाँ सिरे से कोई अहमियत ही नहीं रखती। अल्लाह ने निजात के लिए एक पैमाना मुकर्रर किया है वो हर गिरोह को, हर जमात को, हर फिरके को उसी पर परखेगा और इसमें दिलचस्प चीज़ ये है कि जहां सब गिरोहो का नाम लिया है वहाँ मुसलमानों से बात शुरू की है।
इसे कुरआन में कुछ इस तरह बयान किया गया हैं:
(इससे स्पष्ट है कि जज़ा और सज़ा का क़ानून बिलकुल अलग है। लिहाज़ा) वो लोग जो (आप स0 पर ) ईमान लाए हैं और जो (उनसे पहले) यहूदी हुए और जो नसारा और साबी कहलाते हैं, इनमें से जिन लोगों ने भी अल्लाह को माना है और क़ियामत के दिन को माना है और नेक अमल किए हैं, उनके लिए उनका सिला उनके परवरदिगार के पास है और (उसके हुज़ूर में) उनके लिए ना कोई अंदेशा होगा और ना वो कभी ग़मज़दा होंगे।
[सूरह बकरह 2:62]
बिलकुल यही बात सूरह माइदह 5:69 में भी दोहराया है। इस आयत के अनुसार आखिरत (परलोक) में किसी इंसान की सफलता तीन चीज़ों पर निर्भर करती है । ये तीन बातें इस्लाम के पैग़ाम का सार है जो सभी पैगंबरों ने हर दौर के लोगो को दिया है और ये तीनों बातें इंसान की फितरत में भी मौजूद है।
पहली शर्त : सिर्फ और सिर्फ एक ईश्वर पर यकीन रखा जाये, केवल उसी को इबादत के लायक जाना जाये और किसी भी प्रकार से शिर्क नहीं किया जाये।
दूसरी शर्त : क़यामत के दिन पर विश्वास रखा जाये और जीवन इस एहसास के साथ जिया जाए की उसे हर कर्म के लिए ख़ुदा के सामने जवाबदेह होना पड़ेगा।
तीसरी शर्त : वो शख़्स अच्छे कर्म करे।
ये है वो पैमाना जैस्पर हर शख़्स को आखिरत के दिन परखा जाएगा। लेकिन ये सारी चीज़े मुसबत (सकारात्मक) तौर से ज़रूरी है। इसके साथ ये भी अक़ल का तक़ाज़ा है कि ये सारे काम करने वाला शख़्स फिर कोई भी ऐसा काम न करें जिससे की ऊपर बयान की गयी चीज़ों पर असर पड़े। यानि कोई ऐसा गुनाह न करे जिससे कि वो आखिरत के दिन मुश्किल में पड़ जाये।
मिसाल के तौर पर, अगर कोई शख़्स एकेश्वरवाद पर यकीन रखता है, परलोक के दिन को भी मानता है और अच्छे कर्म कर रहा है लेकिन इसके साथ ही उसने किसी बेगुनाह की हत्या कर दी तो ये इतना बड़ा जुर्म है की उसे हमेशा की जहन्नम का मुस्तहिक (पात्र) बना देता है । बिलकुल ऐसे ही अगर किसी ऐसे शख्स के पास खुदा के रसूल का पैगाम पहुंचता है और वो ये जान लेता है कि ये ख़ुदा का पैगंबर है और ये पैगाम बिलकुल सही और स्पष्ट है लेकिन हठधर्मी की बुनियाद पर उसे मानने से इनकार कर देता है तो ये इतना बड़ा गुनाह है कि ऐसे शख्स के लिए भी हमेशा की जहन्नम की चेतावनी है। क्योंकि पैग़ंबर की बात का इन्कार हक़ीक़त में ख़ुदा की बात का इन्कार है।
ये ऐसे जुर्म है जो इस आयत में तो बयान नहीं हुए है लेकिन कुरआन में दूसरी जगह बयान हुए है । तो जो भी ऐसे जुर्म करेगा चाहे वो मुसलमान हो या यहूदी, या ईसाई या कोई और पंथ वाला उसे अपने इन जुर्मों के कारण कटघरे में खड़ा होना पड़ेगा। लेकिन मुसबत तौर पर (affirmatively) सिर्फ तीन ही मूल सिद्धांत है जो ऊपर बयान हुए है।
अब रहा कोई ऐसा शख्स जिसने किसी भी रसूल या नबी का पैगाम सुना ही नहीं या अगर सुना भी है तो उस तक गलत जानकारी पहुंची है (जैसे कि इंटरनेट के दौर में हम देख सकते है ) तो ऐसा शख्स के लिए ऊपर बयान किए हुए 3 सिद्धांत की बुनियाद पर फैसला होगा। ये कुरआन का बहुत ही न्यायपूर्वक सिद्धांत है। अगर आप गौर से देखे तो वो तीनों उसूल इंसान की मूल प्रवत्ति में मौजूद है और अक़ल भी इन्हीं की तरफ चिन्हित (इशारे) करती है !
To be continue]
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