#किस्मत #तकदीर
इस ह़फ्ते के तीन अलग अलग वाकये , किस्मत पर ।
वैसे तो ये रोज़ मर्रा की बात है इर्द गिर्द लोग कहते मिल ही जाते हैं साहब जितना किस्मत मे लिखा है उतना मिलेगा वही होगा।
अशिक्षित मज़दूर वर्ग के एक साहब लकड़ी की कारीगरी मे कुछ करते हैं सुबह नौ से रात नौ तक। गुज़र बसर ठीक चल रहा है बच्चे छोटे हैं स्कूल नही जाते घर अपना है
पिछले दो अढ़ाई साल मे दो बार काम बदलने का ट्राई किया मगर नाकाम होकर फिर पुराने पर लौटे और अन्तत: वही किस्मत की बात।
दो रोज़ पहले मिले बोले सब बढ़िया चल रहा है , वैसे अब फ़ास्ट फ़ूड का ठेला लगाने का विचार है -
अब सोचना है, क्यूं?
किस्मत मे लिखा है तो मिल ही जायेगा ना?
नही वो अस्ल मे कुछ तो करना ही होता है
अरे भई अगर कुछ करके ही मिलना है तो किस्मत क्या हुई?
लोग कहते हैं कर्म से होगा मगर किस्मत मे लिखा ही होगा
ज़रा तर्क लगाइये अगर किस्मत मे लिखा आपके कर्म का मोहताज है तो ईश्वर की किस्मत लिखने की योजना का कोई जवाज़ बनता है ,ये दोनो बातें एक साथ सही हो सकती हैं?
साहब वो ग्रंथो मे भी लिखा है वो जिसे चाहे खुला रिज़्क दे और जिसे चाहे तंगी,
तो ये भी बताइये कि उन ग्रंथो मे ये कहां लिखा है कि किस्मत भी कर्म की मोहताज है यानि कर्म/अस्बाब से होगा ? इसका भी प्रमाण है या नही या आपने ख़ुद माना हुआ है।
सच्चाई ये है कि आपने ये माना नही अनुभव किया है कि कर्म करना है , माना हुआ तो वह किस्मत का अ़कीदा है , यहां एक सत्य मे असत्य की मिलावट हो गई है
ग्रंथ कह क्या रहे हैं ये समझने मे ग़ल्ती हो सकती है
ये हमने ख़ुद अनुभव किया है कि कर्म से होगा (यानि जीवन के सत्य या आयतुल्लाह को महसूस किया है) मगर धार्मिक मान्यताओं के कारण एक झूठ इसमे शामिल है जिसे ग्रंथो और ईश्वर के नाम डालकर हमपर मढ़ा गया है
अच्छा जब किस्मत मे लिखा मिलना है और आप नौ से नौ अस्बाब/कर्म भी धारण कर भी रहे हैं तो फ़ास्ट फूड का ठेला लगाने की क्यों सोच रहे हैं, यानी कर्मक्षेत्र बदलने का रिस्क क्यूं, नये काम की दिक्कते उठाना क्यूं ? कहीं ये किस्मत आपके हाथ मे तो नही?
कहीं वो क़द्र (तकदीर, मुकद्दर) जिसकी ग़लत इंटरप्रिटेशन की गई है किसी और चीज़ का नाम तो नही?
A- नही नही। हमने ख़ुद देखा है लोग ख़ून पसीना एक कर रहे हैं और रूखा सूखा खा रहे हैं वहीं दूसरे लोग ऐश के साथ ए सी मे बैठे हैं और लाखों कमाते हैं ये किस्मत नही तो और क्या है?
या
B- हमने देखा है कि कई लोग बहुत कोशिश करके भी कामयाब नही होते मगर कई लोग बहुत कम मे वहां पहुंच जाते हैं जबकि वो भी पहले वही थे जो/जहां हम थे ,ये भी तो किस्मत ही हुई?
बात फिर वही कि फिर आप कर्मक्षेत्र क्यूं बदलना चाह रहे हैं
A- ऐसी मे बैठकर वो आज कमा रहा है मगर यहां तक बैठने के लिये एक क्वालिफ़िकेशन ज़रूरी है , वहां तक वो उनकी बुनियाद पर पहुंचा है
कुछ हासिल करने कुछ से कुछ हो जाने के लिये सिर्फ़ कर्म/मेहनत ही शर्त नही है ये ख़्याल अधूरा है, पूरी बात ये है कि सही दिशा मे आवश्यक प्रयास करने की ज़रूरत है, आपको बनना डाक्टर है मगर आप पढ़ रहे हैं एल एल बी?
हमने मेहनत की शरीर से और परिणाम वो चाहते हैं जो दिमाग़ से मेहनत करने वालों को मिलता है तो हमारी ना समझी है । दिमाग़ का स्थान सबसे ऊपर है जिसने इस नेमत की इज़्जत की उसे बदले मे इज़्जत मिली, आप देखिये इसीलिये लीडर्स कुछ ही होते हैं फा़लोअर्स ज़्यादा
कुछ लोग पढ़ना नही चाहते दिमाग़ पर ज़ोर पड़ता है, बोझ पड़ता है बस कुछ तय शुदा टास्क मिल जायें जिनकी आदत है वो कर लेते हैं ।
मज़दूर वर्ग के मज़दूर रहने का कारण यही है वह दिमाग़ पर ज़ोर नही चाहता भावनाओं से चलता है, साहब मैने ये काम किया मुझे मज़दूरी चाहिये बस।
क़ुरआन बार बार अ़क्ल के इस्तेमाल को कहता है और एक जगह तो अक्ल इस्तमाल ना करने वालों पर गंदगी डालने की बात कहता है,(10/100) मतलब क्या हुआ?
चाहे शरीर हो या दिमाग़ जिस अंग से काम लिया जाता है स्वस्थ रहता है और जिस इंटेसिटी का काम लिया जाता है उसी दर्जे का स्ट्रांग बनता जाता है जिस अंग से काम लेना छोड़ दे वो अंग बेकार होने लगता है
"ज़मीन पर (एक खास कोर्स/समय के बाद) वही ठहरता है जो मनुष्यों के लिये लाभकारी होता है' 13/17
दिमाग़ पर डाला जाने वाला भार शरीर पर डाले जाने वाले भार से ज़्यादा होता है इसीलिये हर इंसान दिमाग़ पर आदत से अतिरिक्त भार डालने से बचता है ।
B- मेरे घर से घंटाघर की दूरी माना 1000 कदम पर है और मुझमे एक प्रयास मे 50 ही कदम चलने की सामर्थ्य है और मैने दस बार प्रयास किया तो कहां पहुंचूगां? आधे रस्ते पर जबकि दूसरे ने हर प्रयास मे 250 कदम चले वे चार ही प्रयास मे पहु्च जायेगा
मैं ये सब (यानि प्रयास का वज़न) नही देख पाऊंगा, कहूंगा साहब किस्मत अपनी अपनी!!! मैं कामयाब नही हुआ वो हो गया
एक और सिचुएशन है, जब उसने भी हर प्रयास मे पचास ही कदम लिये और चार ही बार मे घंटाघर पहुंच गया यानि प्रयास मुझसे कम मगर वो कम (4) प्रयास मे पहुंच गया ?
दरअस्ल आलरेडी मुझसे आगे ही था उसका घर था ही घंटाघर से सिर्फ दो सो कदम पहले यानि मुझसे आठ सौ कदम आगे।
यहां भी भ्रम हो सकता है,
मै भी नाई था वो भी , मुझे भी हलवाई बनना था उसे भी दोनो ही उस पेशे से बिल्कुल अंजान थे फिर भी वो कम कोशिशों मे कैसे कामयाब हुआ?
ज़ाहिरी तौर पर, आपका पेशा भले एक था, और आप हलवाई गिरी से दोनो ही अन्जान थे मगर कुछ गौण चीज़ें होती हैं
जैसे एक हलवाई को गर्मी बर्दाश्त करने की आदत होनी चाहिये, भारी भरकम पतीले उठाने यहां वहां सरकाने की ताकत भी हो, फ़ुर्ती भी आदि आदि
वो भी पहले भले ही नाई था लेकिन कुछ बेसिक रिक्वायरमेंट्स उसमे आपसे ज़्यादा पहले से ही मौजूद थी जो आपमे नही थी, उस तरह वो उस मंज़िल के सफ़र मे आपसे आगे पहले ही था इसलिये कम प्रयास मे घंटाघर पहुंचने मे कामयाब हुआ।
क़ुरआन मे क़ाफ़ दाल र ق د ر के माद्दा से बने अल्फा़ज़ मुकद्दर, तक़दीर को कुछ उलमा ने एस्टीमेट/पैमाना के तौर पर परिभाषित किया है और इस परिभाषा को अरब साहित्य से प्रमाणित किया है ।
पैमाना यानि (मिसाल) मैं मुझे एक घंटा काम करने के मेरी कंपनी 10 रूपये देगी अब जितने घंटे काम करूं उस हिसाब से भुगतान करेगी ,
इसे ही क़द्र (मुकद्दर तकदीर) कहा है
वल्लाहु आलम ।
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