जब छोटी थी तो पापा नहीं रहे। हम तीन भाई बहन थे। मम्मी ने छोटा मोटा काम करके हम सबको पढ़ाया लिखाया और बड़ा किया। मेरी बड़ी बहन जब 17 साल की थी तब ही मां के मायके वालों ने उसकी शादी कर दी। भाई आठवीं में पढ़ाई के बाद स्कूल जाना छोड़कर जॉब करने के लिए मजबूर हुआ। सिर्फ मैं ही 12वीं क्लास तक पढ़ पाई। फिर मेरी भी शादी कर दी गई। मेरे हसबैंड एक छोटी सी चाय की दुकान चलाते थे। ससुराल में वो आठ भाई बहन थे। अपने घर में जो संघर्ष देखा वहां से निकलकर ससुराल में एक अलग संघर्ष से जूझने लगी।
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शादी के 12 साल तक मुझे कोई बच्चा नहीं हुआ तो हमने एक बेबी को गोद लेने की सोची। सास ने उसमें भी शर्त लगा दी कि गोद लेना ही है तो बेटे को लेना, बेटी को नहीं। यह सुनकर मुझे बहुत बुरा लगा क्योंकि मुझे बेटी चाहिए थी। खैर, सास की बात माननी पड़ी और हमने एक बच्चे को गोद लिया और उसका नाम युग रखा। अपने बेटे को पाकर मैं बहुत खुश थी। लेकिन ये खुशी ज्यादा दिन नहीं चली। जब युग एक साल का हुआ तो पता चला कि वो चल नहीं सकता। उसके पैरों के ज्वाइंट में समस्या थी।
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हमने बहुत कोशिश की। कई डॉक्टरों के पास युग को ले गई तब जाकर युग ने चलने लगा। पति की चाय की दुकान से इतना कुछ नहीं हो सकता था इसलिए मैंने भी जॉब करनी शुरू कर दी थी। युग को मेरे हसबैंड अपने साथ चाय की शॉप पर ले जाने लगे। फिर बेबी केयर सेंटर भेजना शुरू किया। जब युग तीन साल का था तो एक और बीमारी से उसका सामना हुआ। इसका नाम था हर्लर सिंड्रोम। इसमें बच्चे की ग्रोथ रूक जाती है और हड्डियां कड़ी होने लगती हैं। लेकिन मैंने हिम्मत नहीं हारी और बच्चे को पीजीआई तक ले गई। फिर डॉक्टरों ने बताया कि इस रोग में बच्चा बारह तेरह साल तक ही जीवित रहता है तो मैं टूट गई। मेरे पति भी ये सुनकर रोने लगे। हम दोनों एक दूसरे को हिम्मत देते हुए जिंदगी से समझौता कर लिया।
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युग जो भी मांगता था हम उसे देते थे। हमने उसकी हर ख्वाहिश पूरी की। युग पढ़ने में होशियार था। हमारी जिंदगी बहुत अच्छी चल रही थी। तभी पति को माउथ कैंसर होने का पता चला। अकेले घर बाहर संभालना अब मेरे लिए बहुत मुश्किलों भरा हो रहा था। मेरे सास ससुर तो जैसे पड़ोसी हो गए थे और पड़ोसी तो फिर भी कभी कभी हालचाल पूछ लिया करते थे। खैर, उनको छोड़ो। मेरी जिंदगी में पता नहीं और कितने दुख देखने थे, ये मैं भी नहीं जानती थी। पति का इलाज तो चला लेकिन बीमारी लाइलाज हालत में पहुंच चुकी थी। पति बिस्तर पर पड़े पड़े रोते और दर्द से चिल्लाते। वो खा भी नहीं पा रहे थे। पति को इतने दर्द में देखकर मैं भगवान से उनके लिए मौत मांगने पर मजबूर हुई। फिर शायद भगवान को भी तरस आ गया और पति अपनी तकलीफ से हमेशा के लिए मुक्त होकर चले गए।
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मेरी 75 साल की मां मेरे साथ ही रहने लगी थी और मेरे पास एक बीमार बेटा बचा था। पति के इलाज में सबकुछ बिक गया और मैं किराए के मकान में रहने लगी। मैं एक रेस्टोरेंट में जॉब करने लगी लेकिन वहां रात को 11 बजे तक काम होता था। घर आने में भी देर हो जाती थी। घर पर मेरी बुजुर्ग मां और बेटा दो ही लोग रहते थे। एक रात घर आई और खाना खाकर सोने जा ही रही थी कि बेटा बेहोश सा हो गया। ना तो सांस ले पा रहा था, न ही कुछ रिएक्ट कर रहा था। आंखों में भी कोई मूवमेंट नहीं दिख रहा था तो मैं उसको रात में ही डॉक्टर के पास लेकर भागी। डॉक्टर ने कहा कि हर्लर सिंड्रोम ने अपना असर दिखाना शुरू कर दिया है। दो दिन बाद मेरे बेटे को एक आंख से दिखाई देना बंद हो गया।
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मैं फिर युग को एक डॉक्टर से दूसरे डॉक्टर के पास लेकर भागती रही। जांच में फिर एक नई बीमारी का पता चला। उसके ब्रेन में पानी भर चुका था जिसके दबाव की वजह से वो आंखों की रोशनी खो रहा था। युग को दिखना बंद हो गया और सुनाई देना भी कम होने लगा। वो बेचारा हर बार मुझसे पूछता कि मम्मी मैं कब बड़ा होऊंगा। मैं उसका सवाल सुनकर अंदर ही अंदर बुरी तरह टूट जाती थी। मैं भगवान से कहती कि ऐसी जिंदगी से अच्छा है कि हम तीनों को ही उठा लो। युग भी नहीं रहेगा, बुजुर्ग मां भी नहीं रहेगी तो मैं अकेली कैसे जी पाऊंगी? मैं वो बदनसीब हूं जो अपनों की मौत की दुआ मांगती रहती हूं।
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बहुत मुश्किल है इस दुनिया में सरवाइव करना। कोई साथ नहीं दोता। ना अपने, ना पराए। आज सुबह एक सपना मुझे आया कि पति के साथ मैं और युग मार्केट गए हैं। पति ने युग को गोद में उठा रखा है और मैं बेफिक्र होकर सब्जियां खरीद रही हूं। वो हमारा बहुत ख्याल रखते थे। युग को घुमाने ले जाते थे और उसके खाने के लिए तरह तरह का सामान लाते थे। आज फिर उनकी बहुत याद आ रही है। एक टूटे हुए परिवार में पैदा हुई और एक परिवार बसाकर जीने का सपना भी टूट गया।
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