मैं नही जानता मैं तुम्हे प्यार करता था या करने लगा हूँ, हालांकि प्यार तो एक ही बार होता है, वो किसी ज़माने में हो चुका अब दोस्ती सही लफ़्ज़ है ये कितना अजीब है जबकि हर जगह से सताय जाने की सूरत में पनपा इश्क़ दरख़्त नही बेल होता है,
इन दिनों मैंने जो सबसे ज़्यादा महसूस किया वो ये है कि नज़दीकियों से कहीं ज़्यादा साथ होने का वादा अच्छा है ऐसे में बेफ़िक्र होना अच्छा लगता है,
हालांकि इंसान मिज़ाज से बड़ा अजीब होता है, मसलन तुम सुनना चाहो तो ख़ामोश रहते है, तुम कुछ न पूछो तो पूछने की ज़िद करते है।
तुमसे बात करते हुए मैंने सवालों का ठीक ठाक पेपर तैयार कर लिया है, इधर खाली दिनों में एक सवाल ने मुझे बहुत परेशान किया,
तुमने दोस्त बहुत बना लिए है, तुम्हारे सभी दोस्त बहुत अच्छे है, मैं उन सब से मिला नही हूँ,
दूसरी तरफ मैंने दोस्त बहुत कम कर लिए है। ढेर सारे लोगो के साथ चलने से घबराने लगा हूँ, मेरा दोस्त कहता है कि सरसो के खेत मे हाथ खोलकर चलो और सारे रिश्तों को छूते चलो।
मैने उससे कहा कि हाथ मे पीला रंग क्या कहता है, उसका जवाब था यही कमाई है, मगर मुझसे ये नही होता, मुझे खुले और कठिन रास्तो से चलते हुए बरगद की छांव तक पहुंचना है।
प्यार और दोस्ती के बीच भी कुछ होता है मेरे ख़याल से दुनिया मे इसको लेकर कोई फ़लसफ़ा नही आया। मरने और जीने या आसमान और ज़मीन के बीच कितना कुछ है लेकिन इसे या तो दुख कहा गया या फिर शून्य।
अंत में बस यही कहना है कि तुम मुझे छोड़ कर नही गई थी, मेरे साथ जमाना आ खड़ा हुआ था यह कहते हुए की लोगो के दरमियान भी अकेला रहा जाता है
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