#इश्क़
फ़र्क पड़ने और
फ़र्क ना पढ़ने के बीच
एक लंबा सफ़र तय किया है,
तुम्हारे लिए हज़ारों रतजगे किए
सैंकड़ों शामें मातम सी काटीं ,
खुद को बरसों बरस लानतें भेजीं
ये कहते हुए कि मेरा इश्क़ हार गया,
दरअसल मैं तुम्हें पाने की ज़िद को
इश्क़ समझ बैठा था
फिर मुझे इक दरवेश ने कहा
कहां खुद को ख़ाक कर रहै हो
उसने मुझे इश्क़ के मायने बताए
वो कहता इश्क़ ख़ुदा की इबादत है
बंदों के पीछे कहां भागै फिरते हो,
फिर मैंने तुम्हें खोजने के तमाम जतन छोड़ दिए थे
मैं तुम्हारे ना होने से उदास नहीं होता था
क्योंकि मेरे पास रूहानी इश्क़ था,
तुम जहां भी हो मुझे कोई गुरेज़ नहीं किसी बात से
तब मेरा इश्क़ मेरी इबादत सा बन गया है।
किताबे मेरा दिल बदल रही थी।
उन्हे फाड़ देने का मन भी हुआ अमल भी किया
फिर रोका खुदको की अपने सबसे ज्यादा करीब
इस नेमत में मुझे अब सुकून मिलने लगा था।
चिडन हुई और जिद्दी भी हुआ।
बारिश मुझे परेशान करती थी,
फिर यादों ने परेशान करना बंद कर दिया
फिर तुम चले गए बहुत आगे।
तुम्हे मुस्कुराता देख अच्छा लगने लगा
तुम्हे खुश देख मैं संभलने लगा।
फिर मैं तुम्हें प्यार करने लगा इश्क को त्याग दिया।
अब हम साथ हैं पहले की तरह...???
निदा रहमान
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