मर्द का इश्क़

(मेरी अम्मी और उनका धेवत आयान)

जिस तरह मर्द अपनी हाजिरजवाबी के चलते इश्क का इज़हार करने में फुर्ती दिखाता है उसी की नकल मैने भी की और इश्क का इजहार एक भीड़भाड़ वाले चौराहे पर कर दिया, उसकी तरफ से फ़ौरन जवाब तो नही आया पर मुझे इनकार सुनने को नही मिलना था यह मुझे उम्मीद थी।





हालांकि मर्द अपने इज़हार ए मुहब्बत के बाद हल्का फुल्का हो जाता है और आगे की जिम्मेदारी उठाती है औरत... जिसकी जिंदगी में पहले से ही काफी दुसवारियाँ होती हैं अब इस आशिकमिजाज मर्द की आशिक़ी को और अब इस कदरदान मख़लूक़ को ढोना पड़ेगा ।

जिस चौराहे पर इश्क का इजहार किया था वँहा अब फ्लाइओवर बन चुका है , मतलब, अब इश्क के इज़हार की वह निशानी भी मिट सी गई है , जिसे देखकर अक्सर आशिक़ लोग या तो कुछ खुश हो लिया करते हैं या दो आंशु बहाकर अपने मरे हुए इश्क़ का फातिहा पढ़ रहे होते हैं।

आपका इश्क भी एक प्रोग्रामिंग सिस्टमकी तरह बन जाता है ख़ासकर उन दिनों जब आप किसी चलती हुई मुहब्बत या ताजा - ताजा बेवफाई के बाद दोबारा इसी मैदान में कूद रहे होते हैं मसलन आप ने अभी किसी को खोया है या कोई आपको किसी वजह से छोड़कर जुदा होकर चला गया है भले ही वजह यह दोनों न हो , और आप फिर किसी के इश्क में गिरफ्त हो रहे हैं या किसी को गिरफ्त कर रहे हैं।





आपकी अमीरी,  गरीबी इश्क़ में सुरुआति दौर में किसी काम की चीज नहीं मानी जाती, अक्सर मुहब्बत की सुरुआति बातें झूठ भी हो सकती हैं, आप यह कह सकते हैं कि मेरा लाखों का बिजनेस है या आप यह भी कह सकते हैं कि मैं बिजनैसमैन की इकलौती बेटी हूँ , पैसे की भूख तो हर इंसान में कुछ या ज्यादा होती ही है।
और रकम के साथ अगर मेहबूब भी मिल जाय तो आने वाली परेशानी आपको मिटती नजर आती हैं , भले ही आपके अंदर लालच न हो पर अगर आपका मेहबूब किसी हैसियत वाला इंसान है तो आपको बदनाम तो जरूर किया जायेगा।
उसके लिए आप खुदको तयार नही कर पाते हैं क्योंकि आप एक डगमगाने वाली कश्ती में बैठ चूके हैं अब आपको केवल अपना सफर पूरा करना सबसे ज्यादा जरूरी लगता है भले ही आपको कितनी ही चट्टानों से गुजार कर अपनी कश्ती किनारे पर लगानी हो



जिस तरह इंसान खुदा से हर बड़ी आरजू करता है ,मसलन जब भी वह किसी बेचैनी में होता है तो वह चाहता है कि उसको राहत मिले, उसको सुकून मील जाय और वह शुकुन केवल उस निर्माता के द्वारा ही मिल सकता है जिसने इस इंसान की तख़लीक़(पैदा) की है।
यही हाल इश्क में भी है , महबूबा या मेहबूब एक दूसरे से बस इसी तरह की उम्मीद पाले हुए रहते हैं कि उनको अपने चाहने वाले से सुकून मिले, राहत मिले, जबकि वह गलती पर हैं भले ही उनका मेहबूब या महबूबा कितने भी अज़ीज हों ,नेक हों, हुक्म के पाबंद हों ,मर-मिटने वाले हों ..पर सुकून देना उनके बस से बाहर है बहुत से मामलों में तो आपका मेहबूब या महबूबा आपके लिए बहुत बड़ी परेशानी बन जाती हैं जिसके चलते बहुत लोगो की ज़िंदगी साँस लेने के लिए भी तंग जो जाती है।

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