"मैं" में हम सब

मैं परिवारिक रहना पसंद करता हूँ न कि व्यापारिक , राजनीतिक व सांसारिक।
मैं सिमट कर रहना पसंद करता हूँ जिसकी वजह से मेरी ज़िंदगी मे चैलेंजेस कम ही हैं , जिंदगी इसका नाम नही है ऐसा मैंने कुछ किताबों में पढ़ा है।

अगर मेरे करीब 100 लोग तफरी कर रहे हैं और कोई एक किताब या कोई दवाई का इंस्ट्रुक्सन ही हो मैं लोगो से हटकर उसे पढ़ना पसन्द करता हूँ।
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मैं शादियों में जाना टूर पर जाना किसी मौनमेन्ट पर या किसी देश की यात्रा करना पसंद नही करता था पर अब जबसे बहनों की शादियां हुई है तो कुछ बुलावों पर दावतों में जाने लगा हूँ।
 उनमें जाकर भी हर्ष का अनुभव नही होता , कोई मुझे अपना घर जो उसने बनवाया हो, या शादी में मिला दहेज, या कोई और वस्तु दिखाता है तो मैं अंदर ही अंदर चीड़ सा जाता हूँ जबकि उसके कहने पर मुझे कुछ रिएक्शन देना पड़ता है इसके विपरीत यदि कोइ मुझे अपनी लिखी हुई कविता, कृति शायरी या यात्रा वृतांत दिखाता है या सुनाता है तो मुझे बहुत ख़ुशी होती है।

अनजान लड़की , लड़कों महिलाओं व कुछ पुरुषों से मैं बात नही कर पाता चाहे वह मेरे रिश्तेदार या बिरादरी के ही क्यो न हो जबकि ऑनलाइन मैं काफी बात कर लेता हूँ और मेरे मित्र भी काफी हैं सोसियल मीडिया पर।

,मुझे पूरे लोकडौन में जरा भी उबासी, अकेलापन , तन्हाई व डिप्रेशन नही हुआ क्योंकि मेरी जिंदगी इस माहमारी से पहले भी कुछ इसी तरह चल रही थी शायद आगे कुछ बदलाव आएं।

मेरे दोस्तों को एक हाँथ की उंगलियों पर गिना जा सकता है जिसमें आपको अंगूठे की आवश्यकता भी नहीं होगी।

मैं जिस तरह से दोस्त कम रखता हूँ उसी तरह दुसमन भी शायद कोई हो.....!
हाँ , एक बात है लोग मुझसे नाराज बहुत होते हैं कुछ उम्मीदे जो इंसान एक दूसरे से लगा लेता है उसके पूरे न होने पर जो व्यवहार जन्म लेता है माहौल पैदा  होता है उसका मैं हमेशा शिकार रहा हूँ।

मैं वादे का पक्का रहने वाले लोगो की तरह बनने की कोसिस करता हूँ पर अधिकतर विफल रहा, जबकि मैं समय का पाबंद रहा हूँ इसमें नाममात्र की चूक हुई थी है।
मुझे मज़ाक पसंद है बस इतना कि जिसमे ज़िंदगी जीने के उसूल न टूटे , मुझे इस्लाम से बहुत मुहब्बत है पर मैं किसी की किसीभी जजबाती बात  जिसे वह इस्लाम का हिस्सा बनाकर पेश करता है जबकि वह इसलाम का हिस्सा नही है , उससे कभी प्रभावित नही हुआ।

 इसी के साथ मैं किसी भी मजहब से आजतक कोई दूरी न बना कर रख सका मैं उनको हमेशा जानने की समझने की कोसिस करता रहा, अभी कुछ दिनों पहले मेने रिसर्च शुरू की और एक किताब लिखने की कोसिस की जिसका subtitle था " राम को किस तरह के लोग पसन्द है " इसके लिए मेने दक्षिणी एशिया को अपना प्लाट बनाया पर अनेक जानकारों से बात करने पर मैं सही से कुछ जान न सका शायद वह लोग प्रेज्यूडिस से घिरे हुए थे , फिर मेने अपनी खोज बन्द करदी और सोचा की साउथ इंडियन पुजारिओं से मिलूं और बाद में इस किताब को पूरा करू उसी दौरान यह माहमारी आ गई और मेरा इरादा स्थगित हो गया।

मैं इस लेख में बहुत सी बातें और जोड़ना विस्तार करना चाहता था पर लेख विस्तृत हो गया , इसलिए नही लिख रहा।
इसमें जो सर्वनाम " मैं " है इसको तकब्बुर कतई न समझ लिया जाय, क्योंकि यह अलामतें ज्यादातर अंतर्मुखी लोगो मे पाई जा सकती हैं।

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