राजनीति के रूप

राजनीतिक इतनी महंगी क्यो.?

ऐसा प्रतीत होता है कि इस समय या पिछले कुछ दशकों में या आगामी कुछ शताब्दियों में सबसे अधिक समय और ध्यान केवल राजनीति पर ही लगाया जा रहा है।
चाहे वह देश में केंद्र की राजनिति हो प्रदेश में प्रांतीय राजनीति हो , विश्व पटल पर वैश्विक राजनीति हो , कचेरियों में अधिवक्ता संघ की राजनीति हो या छोटे छोटे इलाकों में चल रही गुट बाजी व राजकीय प्रसासन में मंत्रियों के प्रिय होने की राजनीति,

यदि हम गौर करें तो यह राजनीति अब अपना असर हम सब पर डाल रही है यानी छोटे बालक से लेकर महिला व वृद्ध भी इसका अटूट हिस्सा बनते जा रहे हैं ।
यदि कोई यह कहता है कि मैं राजनीतिक नही हूँ तो असल मे वह व्यक्ति राजनीति से परेशान होकर खुद को इस जंजाल से दूर करना चाहता है और सबसे पहले उसे स्वंय को समझाना पड़ रहा है कि वह राजनीति से तंग आ चुका है और वह इससे छुटकारा पाना चाहता है।

पर इसका अर्थ यह कभी भी नही होता है कि वह राजनीति पर कोई व्यंग या कटाक्ष करने से बचता है बल्कि वह राजनीति से दूर रहकर बहुत बड़ा राजनीतिज्ञ बन जाता है वह किसी दल का हिमायती बनने से बचकर एक यथार्थ को सामने लाने का प्रयत्न करना अपना  कर्तव्य समझता है , हम उससे कुछ समय के लिए ही सही पर कुछ सही दिशा निर्देश जरूर सीख सकते हैं।

हम में से बहुत से लोग खुद राजनीति को नापसन्द करते हैं जबकि जानते बहुत हैं कि किस चाल से किसको क्या फायदा होगा किस दल में किन परिस्थितियों से उसका गौरव धरातल पर जा रहा है किस पार्टी-मुखिया को कोन से कदम उठाने की आवश्यकता है और किस प्रकार हम उभरते हुए दल को पुनः उसी स्थान पर या उससे भी नीचे ला सकते हैं।

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