असल मे जितना मस्तिष्क होता है
इंसान उतना ही सोच पता है।
मस्तिष्क शांत करने के लिए मस्तिष्क को बढ़ाने के लिए इंसान को अध्ययन करना पड़ता है।
और अध्ययन करने के लिए अच्छी किताबों को पढ़ना पड़ता है और अच्छी किताबों को पढ़ने के लिए उन्हें अपने घर में सजाना पड़ता है।
उन पर वक्त जाया करना पड़ता है उन्हें समझने के लिए और लोगों की किताबों को भी पढ़ना पड़ सकता है।
बात क्या है जब कोई भी इंसान गलती करता है तो उसके दिमाग से समान एक जैसे सिग्नस निकलते हैं कि आप इस गलती को मत करें,
चाहे तो आप गलती करके देख लेना या इस पर आप कोई परीक्षण करके देखना या प्रैक्टिकल कर के देख लेना,
तो फिर जब दिमाग के द्वारा प्राप्त सिगनल्स को इंसान नहीं मानता उन सिंगनल्स से इंकार कर देता है उसको यह लगता है कि अभी जो मैं सोच रहा हूं यही सही है यही करने से मुझे फायदा है तो तभी उसी पल वह हर तरह की मजहबी बॉन्डरी से बाहर निकल जाता है।
वह किसी भी मजहब का इंसान नहीं रह जाता क्योंकि मजहब का अनुयाई होने पर उसे बहुत सारे नियम का पालन करना पड़ेगा और यह नियम - पालन उसके गलत कार्य में बाधा बनेंगे तो उसको मजहब छोड़ना पड़ता है ताकि वह फ्री होकर अपने कृत को अंजाम दे सके।
पापी आदमी मजहब छोड़कर पाप करता है ना कि मजहब के साथ या उसकी शिक्षाओं के साथ , मेरे हिसाब से इसको मान लेना चाहिए इसको समझ लेना चाहिए नई किताबें खरीदने के लिए अग्रिम शुभकामनाएं।
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