"रोशनी"
पार्ट-1
(जावेद अहमद मेरठ)
बेटा रहीस ...
जी अम्मी...?
बेटा मै पानी लेने जा रही हूं , टैंकर आ गया है , जल्दी से ल़ौट आऊंगी ,बेटा तुम जरा अपनी बहन रिफत का ख्याल रखना ,और चुल्हे पर दूध उबल रहा है...इसका भी ख्याल रखना ...!
रहीस ने पुरी बात नही सुनी....'और उसकी मां समीम उबलता दूध छौडकर पानी लेने चली गइ ..
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शहजाद जो रहीस का अब्बा है,बहुत गुस्से वाला है, वह चाहता है उसका बेटा भी प्लास्टीक की धुलाइ के काम पर जाये और पढाइ छौड़ दे... आखिर इस पढाइ -वढाइ से मिलता ही क्या है..?
रहीस अपने खेल मे इतना मशरूफ था कि दूध व बहन दोनो को भूल गया........
....
समीम कुछ बडबड़ाते हुए घर मे दाखिल हुइ, पानी की कैन जो वह भरकर लाइ थी , उसको भरने मे मौहल्ले की औरतो से उसकी नोकझोक , कहासुनी हो गइ ,जो अक्सर इन बस्तीयों मे होती है जहां "समीम" व उसका परिवार रहता है, ...!
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अब उसको खाना तैयार करना था और फिर अपने काम पर भी जाना था, क्योकि घर भी किराये का है, बिजली का बिल ,गैस का सिलेंडर , महीने का राशन और उपर से " शहजाद" के फालतु के शौक वह केवल शहजाद की अकेले की कमाइ से पूरा नही कर सकती थी,।
समीम ने बेटे रहीस को ढूडने के इरादे से आवाज लगाइ , क्योकि उसकी बेटी रिफत बहुत जोर -जोर रो रही थी, और रहीस को पास के सरकारी स्कुल मे पढने भी जाना है..'
"
रहीस....बेटा , कहां है तु,।।।।
रहीस घर मे हो तो आवाज पर जवाब दे ,
घर इतना बडा भी नही था कि समीम और आवाज लगाती, कि कहीं किसी दुसरे कमरे मे छुपा बैठा हो..एक कमरा था और उसी से जुडी़ एक रसौइ....!
तभी समीम की निगाह दूध पर पडी़...!
दूध का बर्तन बिल्कुल खाली था, और जमीन पर बिखरा पडा़ था...!
यह देख कर समीम का गुस्सा हद से बाहर हो गया और , गुस्सा लिये रहीस को मौहल्ले मे खौजने चल पडी़.।
काफि देर इधर -उघर देखा पर कहीं न मिला, समीम को अब अपने काम पर भी जाना था , लेट होने पर मालिक छुट्टी कर देता है, इस लिये अब समीम अपने घर की तरफ लौट आइ और यह सोचने लगी कि सायद दूध बिखरने की वजाह से रहीस डर गया है कि कहीं पिटाइ ना हो जाये इसयिये वह कहीं दूर चला गया है, सोच रहा होगा माँ के काम पर जाने के बाद घर वापस जाउंगा...!
देर होने की वजाह से समीम ने आज खाना भी नही बनाया और एक ब्रेड का पैकेट घर पर छोडकर और एक पैकेट अपने खाने के लिये साथ ले गइ.....
". रोशनी"
पार्ट-2
जावेद अहमद मेरठ
सुरज ढल रहा था,और समीम अब अपना काम निपटा कर घर की तरफ चल पड़ी....!
घर पहुंची तो देखा बाहर से दरवाजे पर कुंडी लगी हुइ है।
शहजाद बाहर एक पान की दुकान पर बैठा हैं जहा अक्सर वो लोग बैठते हैं जो सट्टा ,जुआ खेलने के शोकिन हैं,।
दरवाजे को खोल कर समीम अंदर दाखिल हो गइ ,रिफत सौ रही थी , और कुछ उल्टा सीधा खाना पका हुआ या यूं कहें कि किसी ने पकाने की कोशिस की थी पर कामयाबी न मिल सकी...!
समीम समझ गइ की यह शहजाद का ही काम है ,घर मे आज खाना न होने की वजह से यकीनन इन्ही साहब ने यह काम फैलाया है,।
बेचारी ने सारा घर साफ किया बर्तनो को इकट्ठा किया और जौर से आवाज लगाइ....
...
रहीस....'''
कहां है.....?
यहां आ.......!....!
थोडी देर रुककर फिर आवाज लगाइ ..!
रहीस ,ओ रहीस...!
सुनता नही क्या तुझको ...?
तभी कोइ कमरे मे बाहर से दाखिल हुआ..!
समीम ने उपर की तरह देखा तो "शहजाद" को पाया ।
शहजाद:- क्यों चिल्लाह रही है, पगला तो नही गइ..?
समीम :- -हां पगला गइ हूं ,तुम तो होश मे हो, तुम रहो होश मे..!
समीम:- सारा घर एसे गंदा कर रखा है जैसे यहां कोइ नौकरानी सफाइ करने आती हो..!
शहजाद:- फिर खाना क्यों नही बना कर गइ थी , ?
समीम डर गइ कि कहीं दुध बिखरने की बात शहजाद को बता दी तो , रहीस की हड्डी तोड देगा,जैसे पिछली गल्ती पर उसकी नाक से खुन निकाल दिया था..!
समीम ने खाना न बनाने की बात को टाल दिया,और कहने लगी रहीस को पचास रू दो ना, दुध मगाना है आज तुम्हे "खीर " बना के खिलाती हूं।
।
कहां है रहीस बुला इसको ,तेरे साथ ही तो गया था ,पर जब तू आइ तो वह तो नही आया,
मेरे साथ....?
नही तो मैं तो अकेली गइ थी..!
यही पर तो था,...!
शहजाद:- मेरे को चार घंटे हो गये घर पर आये हुए, मैने उसकी परछाइ तक नही देखी..
जारी रहेगा

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