कुरआन का पैग़ाम
पार्ट-24
#काफ़िर_कौन_है ??
“काफिर” शब्द कुरआन मजीद में दो तरह से इस्तेमाल हुआ है एक अपने “लुगवी मफ़हूम में” (यानि शाब्दिक अर्थ में) और दूसरा अपने “इस्तलाही मफ़हूम में” (यानि एक ख़ास अर्थ लिए हुए)। “काफिर” शब्द (क़+फ+र) के संयोग से बनता है और अरबी शब्दकोश मे इसके तीन अर्थ मिलते है वो है ढक लेना, इन्कार करना, न मानना और नाशुक्री करना। ये है इसका शाब्दिक अर्थ। अपने शाब्दिक अर्थ में ये लफ्ज जगह जगह इस्तेमाल हुआ है। मिसाल के लिए देखें:
[सूरह हदीद 57:20, सूरह बकरह 2:256, सूरह लुक़मान 31:12]
अपने इस्तलाही मफ़हूम (पारिभाषिक अर्थ) में काफिर का मतलब होता है, “ऐसा शख़्स जिस तक इस्लाम की दावत पहुंच चुकी हो और उसने उस पैग़ाम की सत्यता जान ली हो, उसके मन-मस्तिष्क पर इस्लाम की सच्चाई स्पष्ट हो चुकी हो लेकिन इसके बावजूद सिर्फ ज़िद और हठधर्मी की बुनियाद पर वो उसे कुबूल करने से इन्कार कर दें। ऐसा शख़्स काफिर कहलाता है”।
अगर आपने इस परिभाषा को ध्यान से पढ़ा है तो किसी शख़्स को “काफिर” करार देने के लिए दो चीज़ें ज़रूरी है। पहला ये कि उस शख़्स तक इस्लाम का पैग़ाम साफ तौर पर पहुंचा हो और दूसरा ये कि उसने उस पैग़ाम की सच्चाई जानने के बाद भी उसका जानते बूझते इन्कार कर दिया हो। हम पहली बात के बार में तो कुछ कह भी सकते है कि फलां शख़्स तक इस्लाम का पैग़ाम पहुँच चुका है लेकिन हम इस बात के बार में कोई हुक्म नहीं लगा सकते कि क्या उस शख़्स ने उस पैग़ाम को जानते बूझते झुठलाया है या किसी गलतफहमी की वजह से। क्योंकि इस दूसरी बात का ताल्लुक दिल से होता है और दिलों का हाल सिर्फ अललह तआला जानते है तो मालूम हुआ कि किसी भी शख़्स को “काफिर” सिर्फ और सिर्फ अललह तआला करार दे सकते है। मिसाल के तौर पर फिरौन और अबू-लहब वगैरह के काफिर होना हमें इसलिए पता है क्योंकि अल्लाह तआला और उसके रसूल ने हमें इसके बारे में सूचित किया है।
चुनांचे जब भी अल्लाह का कोई नबी या रसूल अपनी क़ौम को दावत देना शुरू करता है तो वो “ए मेरी क़ौम के लोगों” कहकर संबोधित करता है न कि “ए काफ़िरों” कहकर। क्योंकि लफ्ज “काफिर” का इतलाक होता ही तब है जब किसी शख़्स तक पैग़ाम पहुंचे और वो प्रमाण स्थापित हो जाने के बाद भी उसे मानने से इन्कार कर दे। लेहाज़ा जब अल्लाह के नबी और रसूल पैग़ाम को आखरी दर्जे तक पहुंचा देते है और सच्चाई इस तरह स्पष्ट हो जाती है जैसे सूरज चमक रहा हो और किसी शख़्स के लिए भी इन्कार करने की कोई गुंजाइश या बहाना बाकी नहीं रह जाता सिवाय इसके कि वो ज़िद और हठधर्मी की बुनियाद पर इन्कार करना शुरू कर दें। ये वो चरण (stage) है जब ऐसे लोगों को अल्लाह तआला “काफिर” करार देते है। अल्लाह तआला अपने रसूल को “वही” (आकाशवाणी) के जरिये स्वयं इस बात की जानकारी पहुंचा दिया करता था। चूंकि हज़रत मुहम्मद (स) अल्लाह के आख़री रसूल और नबी है लेहाज़ा आपके बाद अब कोई भी शख़्स किसी के बारे में भी यह निर्धारित नहीं कर सकता की वह “काफ़िर” हो गया है, क्योंकि अब किसी के पास अल्लाह का सन्देश नहीं आता। मालूम हुआ कि किसी शख़्स को “काफिर” करार देना बहुत बड़ी जुर्रत का काम है क्योंकि किसी भी “शख़्स” को काफिर कहना गोया उसके जहन्नम के मुस्तहिक (पात्र) होने का ऐलान करना है। और ये ऐलान केवल अल्लाह तआला की अज़ीम हस्ती ही कर सकती है।
जो लोग इन्कार करते है बावजूद इसके कि उनपर हक़ वाज़ेह हो जाये इसे कुरआन मजीद ने खुद कई जगह बयान किया है।
इरशाद है:
फिर जब उनके पास वह चीज़ आयी जिसको उन्होंने पहचान लिया था तो उन्होंने उसको झुठला दिया। अत: अल्लाह की फटकार है झुठलाने वालों पर। [सूरह अल बकरह 2:89]
बहुत से किताब वाले (यहूदी और ईसाई) सिर्फ अपनी ईर्ष्या (हसद) के कारण यह चाहते हैं कि तुम्हारे ईमान लाने के बाद वह फिर तुम्हें कुफ़्र (इनकार) की तरफ पलटा दें, इसके बावजूद के सच उनपर पूरी तरह स्पष्ट हो चूका। [सूरह अल बकरह 2:109]
(ये हक़ीक़त है कि) जिनको हमने किताब दी है, वो इस चीज़ को ऐसा पहचानते हैं, जैसा अपने बेटों को पहचानते हैं । और उनमें ये एक गिरोह है जो जानते बूझते हक़ को छुपाता है। [सूरह अल बकरह 2:146]
मालूम हुआ कि ये वो शख़्स है जो सच्चाई को जानते बूझते छुपाते है। यहीं वो लोग है जिन्हें “जहन्नम” की बशारत दी गयी है और ऐसी ही लोगों को निंदनीय काफिर कहा गया है। इसलिए कुरआन मजीद को पढ़ते वक़्त इस बात को ज़हन में रखिएगा।
अहले किताब (यहूदी और ईसाई) और मुशरिकीन (बहुदेववादियों) में से जिन लोगों ने इनकार कर दिया है, वह यकीनन नरक की आग में जायेंगे। यह लोग सब से बुरे प्राणी हैं। [सूरह बय्यिना 98:6]
यहाँ एक सवाल उठता है की क्या हर गैर मुस्लिम काफिर है? नहीं ऐसा नहीं है, हर गैर मुस्लिम काफिर नहीं है। जिस गैर मुस्लिम तक इस्लाम की दावत नहीं पहुंची या अगर पहुंची भी तो किसी ऐसे शख़्स के द्वारा पहुंचा जिसने भ्रामक या गलत जानकारी दी हो तो स्वाभाविक बात है वो इस्लाम को स्वीकार नहीं करेगा। इसी लिए इस्लाम के सिवा बाक़ी तमाम मज़हबों के मानने वालों को हम सिर्फ “ग़ैर-मुस्लिम” कहेंगे और यही शब्द उन लोगों के लिए भी कहा जाएगा जो किसी दीन या मज़हब को नहीं मानते। हमें ये अधिकार है कि किसी शख़्स की ग़लती उनपर स्पष्ट करें, उन्हें सही बात के क़बूल करने की दावत दें, उनके नज़रियात एवं मान्यताओं में कोई चीज़ शिर्क है तो उसे शिर्क और कुफ़्र है तो उसे कुफ़्र कहें और लोगों को भी उस पर सचेत करें, मगर उन के बारे में ये फ़ैसला करना कि फलां शख़्स “काफिर” है ये अधिकार हममे से किसी को नहीं। इसलिए कि ये हक़ ख़ुदा ही दे सकता था और उसने ये हक़ किसी को नहीं दिया है। लेकिन हमारा रवैया भी कितना अजीब है हम हर वो शख़्स (चाहे मुस्लिम ही क्यों न हो) जिसकी राय से हम इख्तेलाफ़ करते है उसे बिना सोचे समझे "काफिर" करार दे देते है। ये बहुत बड़ी हिमाकत का काम है जिसके बारे में आपसे आखिरत में सवाल होगा।
ऊपर की बहस का खुलासा ये है:
काफ़िर से मुराद वो शख़्स है जो जान-बूझ कर हक़ का इनकार करता है, यानी जिसके सामने इस्लाम पेश किया गया या उसने ख़ुद से उसका अध्ययन किया और फिर उसकी समझ में ये बात आ गई कि ये हक़ है और उसे क़बूल करना हक़परसती का तक़ाज़ा है, लेकिन उसने जान-बूझ कर उस को झुटला दिया और उसे नहीं माना तो ऐसा शख़्स ख़ुदा के नज़दीक काफ़िर शुमार होगा। जो लोग भी इस्लाम को नहीं मान रहे, अगर उनका मामला ये है कि वो ये जानते हैं कि ये हक़ है और उसे मानना उनके लिए लाज़िम है, लेकिन इसके बावजूद वो उसका इनकार करते हैं तो बेशक वो लोग काफ़िर शुमार होंगे।
ग़ैर मुस्लिम से हर वो शख़्स मुराद है जो मुस्लमान नहीं है और हमारे इलम की हद तक वो जानबूझ कर इस्लाम का इनकार भी नहीं कर रहा कि उसे काफ़िर कहा जाये। दुनिया के बेशुमार लोग जो मुस्लमान नहीं हैं, उनका मामला क्या है? वो काफ़िर हैं या ग़ैर मुस्लिम? इस सवाल का जवाब ये है कि चूँकि हम उनके दिल में झांक कर ये फ़ैसला नहीं कर सकते कि वो इस्लाम को जान-बूझ कर झुटला रहे हैं या वो इस में माज़ूर (लाचार) हैं, लिहाज़ा हम उन्हें ग़ैर मुस्लिम तो कहेंगे, लेकिन काफ़िर नहीं कह सकते।
कुरआन का पैग़ाम
पार्ट-25
पैग़ंबर की इताअत (पैरवी)
हम अल्लाह के पैगंबर पर ईमान रखते है और हम जानते है कि अल्लाह तआला ने अपना पैग़ाम फरिश्तों के ज़रिये इन्सानों तक पहुंचाया है। इसके लिए इन्सानों के अंदर से ऐसे लोगों को मुंतखब किया जिन्हें नुबुव्वत और रिसालत दी गयी और यह सिलसिला हज़रत मुहम्मद (स) पर खत्म हुआ। अब दीन का तन्हा माखज़ (अकेला स्त्रोत) आप ही की हस्ती है। पैगंबर की हैसियत से जब हम आप पर ईमान रखते है तो कुरआन मजीद हमसे कहता है कि अगर किसी मामले में आप (स) का कोई फैसला हमारे इल्म में आ जाये या कोई हुक्म हमारे इल्म में आ जाये तो हमें बगैर किसी तरद्दुद के उसे कुबूल करना चाहिए । इस बात को हमें हर हाल मलहूज़ रखना चाहिए।
पैगंबर का मामला किसी सियासी रहनुमा, किसी दानिश्वर या किसी हकीम जैसा नहीं होता। किसी हस्ती को पैगंबर मानने का मतलब ही ये है कि हम उसे खुदा का सफ़ीर (नुमाइंदा) मान रहे है और उसकी बात खुदा की बात है। इसमें कोई शक नहीं कि पैगंबर, अल्लाह की बात हम तक पहुंचाते है और इसी हैसियत से अल्लाह के सफ़ीर (नुमाइंदे) के तौर पर हमसे इताअत (आज्ञापालन) का मुतालबा करतें है। पैगंबर की इताअत करना, पैग़ंबर की पैरवी करना, पैगंबर से मुहब्बत करना, ये पैगंबर पर ईमान के तकाज़े है।
कुरआन मजीद ये कहता है कि ख़ुदा के जो पैगंबर भी आए है उन्होनें एक तो लोगों को "दीन" पहुंचाया है जिसमें अल्लाह तआला के दिये हुए अहकाम है मिसाल के तौर पर इबादात, पाकीज़गी की हिदायत, खाना पीना के आदाब, अखलाक इत्यादि। इसके अलावा जब पैगंबर दुनिया में होते है तो किसी मुक़द्दमे का फैसला भी करते है, किसी मामले मे कोई इजतिहाद भी फरमाते है तो उन चीजों के बारे में भी ये बता दिया गया है कि उन्हें किसी आम आलिम के इजतिहाद या किसी आम हुकमरान (शासक) के हुक्म या किसी आम काज़ी के फैसले जैसा नहीं समझना चाहिए। वो तो असल में पैगंबर का हुक्म, फैसला और इजतिहाद होता है। इसी वजह से बगैर दिल मे कोई तंगी महसूस किए उसको बिना चूँ-चा के मानना यही ईमान का तक़ाज़ा है।
हज़रत मुहम्मद (स) ने जो दीन हमें दिया है वो कुरआन और सुन्नत में है, ये दीन के अहकाम का माखज़ (स्त्रोत) है लेकिन उसी के साथ रसूलुल्लाह (स) के ज़माने में आपसे जो भी सवालात किए गए है, चीजों की वज़ाहत पूछि गयी है और आपने उसमें कुछ फैसले किए, कुछ हिदायत दी है और ये तमाम चीज़ें हम तक रिवायत (हदीस) की सूरत में पहुंची है। उस जमाने के लोगों का जो ताल्लुक रसूलुल्लाह (स) के साथ था ठीक वही ताल्लुक हदीस के ज़रिये से हमारा भी आप (स) से कायम होता है। आप (स) के हुक्म और फैसलों पर सर झुकाना ये हर ईमान-वाले का फर्ज़ है। और अगर वो ऐसा नहीं करता तो ये रवैया ईमान के खिलाफ है।
कुरआन मजीद के ज़माने में जब आप (स) दुनिया में माजूद थे उस वक़्त मुसलमानों को मुख़ातिब करके अल्लाह तआला ने फरमाया कि पैगंबर के मामले को आम लोगों जैसा न समझो, वो बुलाये तो ये न समझों कि कोई आम शख़्स बुला रहा है, वो हुक्म दे तो ये ख्याल न करों कि कोई आम आदमी हुक्म दे रहा है, वो क़ाज़ी की तरह कोई फैसला करें तो ये न समझो कि ये कोई आम क़ाज़ी का फैसला है जिससे तुम इख्तिलाफ़ (मतभेद) भी कर सकते हो बल्कि ये सब पैगंबर के फैसले और उसी के अहकाम है और पैगंबर का मामला आम इंसानों जैसा क़तअई नहीं होता।
इसे कुरआन में कुछ इस तरह बयान किया गया हैं:
लेकिन नहीं (ए पैग़ंबर), तुम्हारे परवरदिगार की क़सम, ये लोग कभी मोमिन नहीं हो सकते, जब तक अपने इख़तिलाफ़ात (मतभेदों) में तुम्ही को फ़ैसला करने वाला ना मान लें, फिर जो कुछ तुम फ़ैसला कर दो, उसपर अपने दिलों में कोई तंगी महसूस किए बग़ैर उस के आगे सर ना झुका दें। [सूरह निसा 4:65]
अल्लाह तआला ने अपनी हस्ती की क़सम खा कर फ़रमाया कि ये लोग उस वक़्त तक मोमिन नहीं हो सकते, जब तक ये अपने दरमयान पैदा होने वाली तमाम इख्तिलाफ़ात में आप (स) का हुक्म ना मानें और फिर साथ ही पूरे इतमीनान के साथ मानें। रसूल की इताअत (पैरवी) ख़ुद ख़ुदा की इताअत है, इस वजह से इसका हक़ सिर्फ़ ज़ाहिरी इताअत से अदा नहीं होता, बल्कि उसके लिए दिल की इताअत भी ज़रूरी है।
शुक्रिया
पार्ट-24
#काफ़िर_कौन_है ??
“काफिर” शब्द कुरआन मजीद में दो तरह से इस्तेमाल हुआ है एक अपने “लुगवी मफ़हूम में” (यानि शाब्दिक अर्थ में) और दूसरा अपने “इस्तलाही मफ़हूम में” (यानि एक ख़ास अर्थ लिए हुए)। “काफिर” शब्द (क़+फ+र) के संयोग से बनता है और अरबी शब्दकोश मे इसके तीन अर्थ मिलते है वो है ढक लेना, इन्कार करना, न मानना और नाशुक्री करना। ये है इसका शाब्दिक अर्थ। अपने शाब्दिक अर्थ में ये लफ्ज जगह जगह इस्तेमाल हुआ है। मिसाल के लिए देखें:
[सूरह हदीद 57:20, सूरह बकरह 2:256, सूरह लुक़मान 31:12]
अपने इस्तलाही मफ़हूम (पारिभाषिक अर्थ) में काफिर का मतलब होता है, “ऐसा शख़्स जिस तक इस्लाम की दावत पहुंच चुकी हो और उसने उस पैग़ाम की सत्यता जान ली हो, उसके मन-मस्तिष्क पर इस्लाम की सच्चाई स्पष्ट हो चुकी हो लेकिन इसके बावजूद सिर्फ ज़िद और हठधर्मी की बुनियाद पर वो उसे कुबूल करने से इन्कार कर दें। ऐसा शख़्स काफिर कहलाता है”।
अगर आपने इस परिभाषा को ध्यान से पढ़ा है तो किसी शख़्स को “काफिर” करार देने के लिए दो चीज़ें ज़रूरी है। पहला ये कि उस शख़्स तक इस्लाम का पैग़ाम साफ तौर पर पहुंचा हो और दूसरा ये कि उसने उस पैग़ाम की सच्चाई जानने के बाद भी उसका जानते बूझते इन्कार कर दिया हो। हम पहली बात के बार में तो कुछ कह भी सकते है कि फलां शख़्स तक इस्लाम का पैग़ाम पहुँच चुका है लेकिन हम इस बात के बार में कोई हुक्म नहीं लगा सकते कि क्या उस शख़्स ने उस पैग़ाम को जानते बूझते झुठलाया है या किसी गलतफहमी की वजह से। क्योंकि इस दूसरी बात का ताल्लुक दिल से होता है और दिलों का हाल सिर्फ अललह तआला जानते है तो मालूम हुआ कि किसी भी शख़्स को “काफिर” सिर्फ और सिर्फ अललह तआला करार दे सकते है। मिसाल के तौर पर फिरौन और अबू-लहब वगैरह के काफिर होना हमें इसलिए पता है क्योंकि अल्लाह तआला और उसके रसूल ने हमें इसके बारे में सूचित किया है।
चुनांचे जब भी अल्लाह का कोई नबी या रसूल अपनी क़ौम को दावत देना शुरू करता है तो वो “ए मेरी क़ौम के लोगों” कहकर संबोधित करता है न कि “ए काफ़िरों” कहकर। क्योंकि लफ्ज “काफिर” का इतलाक होता ही तब है जब किसी शख़्स तक पैग़ाम पहुंचे और वो प्रमाण स्थापित हो जाने के बाद भी उसे मानने से इन्कार कर दे। लेहाज़ा जब अल्लाह के नबी और रसूल पैग़ाम को आखरी दर्जे तक पहुंचा देते है और सच्चाई इस तरह स्पष्ट हो जाती है जैसे सूरज चमक रहा हो और किसी शख़्स के लिए भी इन्कार करने की कोई गुंजाइश या बहाना बाकी नहीं रह जाता सिवाय इसके कि वो ज़िद और हठधर्मी की बुनियाद पर इन्कार करना शुरू कर दें। ये वो चरण (stage) है जब ऐसे लोगों को अल्लाह तआला “काफिर” करार देते है। अल्लाह तआला अपने रसूल को “वही” (आकाशवाणी) के जरिये स्वयं इस बात की जानकारी पहुंचा दिया करता था। चूंकि हज़रत मुहम्मद (स) अल्लाह के आख़री रसूल और नबी है लेहाज़ा आपके बाद अब कोई भी शख़्स किसी के बारे में भी यह निर्धारित नहीं कर सकता की वह “काफ़िर” हो गया है, क्योंकि अब किसी के पास अल्लाह का सन्देश नहीं आता। मालूम हुआ कि किसी शख़्स को “काफिर” करार देना बहुत बड़ी जुर्रत का काम है क्योंकि किसी भी “शख़्स” को काफिर कहना गोया उसके जहन्नम के मुस्तहिक (पात्र) होने का ऐलान करना है। और ये ऐलान केवल अल्लाह तआला की अज़ीम हस्ती ही कर सकती है।
जो लोग इन्कार करते है बावजूद इसके कि उनपर हक़ वाज़ेह हो जाये इसे कुरआन मजीद ने खुद कई जगह बयान किया है।
इरशाद है:
फिर जब उनके पास वह चीज़ आयी जिसको उन्होंने पहचान लिया था तो उन्होंने उसको झुठला दिया। अत: अल्लाह की फटकार है झुठलाने वालों पर। [सूरह अल बकरह 2:89]
बहुत से किताब वाले (यहूदी और ईसाई) सिर्फ अपनी ईर्ष्या (हसद) के कारण यह चाहते हैं कि तुम्हारे ईमान लाने के बाद वह फिर तुम्हें कुफ़्र (इनकार) की तरफ पलटा दें, इसके बावजूद के सच उनपर पूरी तरह स्पष्ट हो चूका। [सूरह अल बकरह 2:109]
(ये हक़ीक़त है कि) जिनको हमने किताब दी है, वो इस चीज़ को ऐसा पहचानते हैं, जैसा अपने बेटों को पहचानते हैं । और उनमें ये एक गिरोह है जो जानते बूझते हक़ को छुपाता है। [सूरह अल बकरह 2:146]
मालूम हुआ कि ये वो शख़्स है जो सच्चाई को जानते बूझते छुपाते है। यहीं वो लोग है जिन्हें “जहन्नम” की बशारत दी गयी है और ऐसी ही लोगों को निंदनीय काफिर कहा गया है। इसलिए कुरआन मजीद को पढ़ते वक़्त इस बात को ज़हन में रखिएगा।
अहले किताब (यहूदी और ईसाई) और मुशरिकीन (बहुदेववादियों) में से जिन लोगों ने इनकार कर दिया है, वह यकीनन नरक की आग में जायेंगे। यह लोग सब से बुरे प्राणी हैं। [सूरह बय्यिना 98:6]
यहाँ एक सवाल उठता है की क्या हर गैर मुस्लिम काफिर है? नहीं ऐसा नहीं है, हर गैर मुस्लिम काफिर नहीं है। जिस गैर मुस्लिम तक इस्लाम की दावत नहीं पहुंची या अगर पहुंची भी तो किसी ऐसे शख़्स के द्वारा पहुंचा जिसने भ्रामक या गलत जानकारी दी हो तो स्वाभाविक बात है वो इस्लाम को स्वीकार नहीं करेगा। इसी लिए इस्लाम के सिवा बाक़ी तमाम मज़हबों के मानने वालों को हम सिर्फ “ग़ैर-मुस्लिम” कहेंगे और यही शब्द उन लोगों के लिए भी कहा जाएगा जो किसी दीन या मज़हब को नहीं मानते। हमें ये अधिकार है कि किसी शख़्स की ग़लती उनपर स्पष्ट करें, उन्हें सही बात के क़बूल करने की दावत दें, उनके नज़रियात एवं मान्यताओं में कोई चीज़ शिर्क है तो उसे शिर्क और कुफ़्र है तो उसे कुफ़्र कहें और लोगों को भी उस पर सचेत करें, मगर उन के बारे में ये फ़ैसला करना कि फलां शख़्स “काफिर” है ये अधिकार हममे से किसी को नहीं। इसलिए कि ये हक़ ख़ुदा ही दे सकता था और उसने ये हक़ किसी को नहीं दिया है। लेकिन हमारा रवैया भी कितना अजीब है हम हर वो शख़्स (चाहे मुस्लिम ही क्यों न हो) जिसकी राय से हम इख्तेलाफ़ करते है उसे बिना सोचे समझे "काफिर" करार दे देते है। ये बहुत बड़ी हिमाकत का काम है जिसके बारे में आपसे आखिरत में सवाल होगा।
ऊपर की बहस का खुलासा ये है:
काफ़िर से मुराद वो शख़्स है जो जान-बूझ कर हक़ का इनकार करता है, यानी जिसके सामने इस्लाम पेश किया गया या उसने ख़ुद से उसका अध्ययन किया और फिर उसकी समझ में ये बात आ गई कि ये हक़ है और उसे क़बूल करना हक़परसती का तक़ाज़ा है, लेकिन उसने जान-बूझ कर उस को झुटला दिया और उसे नहीं माना तो ऐसा शख़्स ख़ुदा के नज़दीक काफ़िर शुमार होगा। जो लोग भी इस्लाम को नहीं मान रहे, अगर उनका मामला ये है कि वो ये जानते हैं कि ये हक़ है और उसे मानना उनके लिए लाज़िम है, लेकिन इसके बावजूद वो उसका इनकार करते हैं तो बेशक वो लोग काफ़िर शुमार होंगे।
ग़ैर मुस्लिम से हर वो शख़्स मुराद है जो मुस्लमान नहीं है और हमारे इलम की हद तक वो जानबूझ कर इस्लाम का इनकार भी नहीं कर रहा कि उसे काफ़िर कहा जाये। दुनिया के बेशुमार लोग जो मुस्लमान नहीं हैं, उनका मामला क्या है? वो काफ़िर हैं या ग़ैर मुस्लिम? इस सवाल का जवाब ये है कि चूँकि हम उनके दिल में झांक कर ये फ़ैसला नहीं कर सकते कि वो इस्लाम को जान-बूझ कर झुटला रहे हैं या वो इस में माज़ूर (लाचार) हैं, लिहाज़ा हम उन्हें ग़ैर मुस्लिम तो कहेंगे, लेकिन काफ़िर नहीं कह सकते।
कुरआन का पैग़ाम
पार्ट-25
पैग़ंबर की इताअत (पैरवी)
हम अल्लाह के पैगंबर पर ईमान रखते है और हम जानते है कि अल्लाह तआला ने अपना पैग़ाम फरिश्तों के ज़रिये इन्सानों तक पहुंचाया है। इसके लिए इन्सानों के अंदर से ऐसे लोगों को मुंतखब किया जिन्हें नुबुव्वत और रिसालत दी गयी और यह सिलसिला हज़रत मुहम्मद (स) पर खत्म हुआ। अब दीन का तन्हा माखज़ (अकेला स्त्रोत) आप ही की हस्ती है। पैगंबर की हैसियत से जब हम आप पर ईमान रखते है तो कुरआन मजीद हमसे कहता है कि अगर किसी मामले में आप (स) का कोई फैसला हमारे इल्म में आ जाये या कोई हुक्म हमारे इल्म में आ जाये तो हमें बगैर किसी तरद्दुद के उसे कुबूल करना चाहिए । इस बात को हमें हर हाल मलहूज़ रखना चाहिए।
पैगंबर का मामला किसी सियासी रहनुमा, किसी दानिश्वर या किसी हकीम जैसा नहीं होता। किसी हस्ती को पैगंबर मानने का मतलब ही ये है कि हम उसे खुदा का सफ़ीर (नुमाइंदा) मान रहे है और उसकी बात खुदा की बात है। इसमें कोई शक नहीं कि पैगंबर, अल्लाह की बात हम तक पहुंचाते है और इसी हैसियत से अल्लाह के सफ़ीर (नुमाइंदे) के तौर पर हमसे इताअत (आज्ञापालन) का मुतालबा करतें है। पैगंबर की इताअत करना, पैग़ंबर की पैरवी करना, पैगंबर से मुहब्बत करना, ये पैगंबर पर ईमान के तकाज़े है।
कुरआन मजीद ये कहता है कि ख़ुदा के जो पैगंबर भी आए है उन्होनें एक तो लोगों को "दीन" पहुंचाया है जिसमें अल्लाह तआला के दिये हुए अहकाम है मिसाल के तौर पर इबादात, पाकीज़गी की हिदायत, खाना पीना के आदाब, अखलाक इत्यादि। इसके अलावा जब पैगंबर दुनिया में होते है तो किसी मुक़द्दमे का फैसला भी करते है, किसी मामले मे कोई इजतिहाद भी फरमाते है तो उन चीजों के बारे में भी ये बता दिया गया है कि उन्हें किसी आम आलिम के इजतिहाद या किसी आम हुकमरान (शासक) के हुक्म या किसी आम काज़ी के फैसले जैसा नहीं समझना चाहिए। वो तो असल में पैगंबर का हुक्म, फैसला और इजतिहाद होता है। इसी वजह से बगैर दिल मे कोई तंगी महसूस किए उसको बिना चूँ-चा के मानना यही ईमान का तक़ाज़ा है।
हज़रत मुहम्मद (स) ने जो दीन हमें दिया है वो कुरआन और सुन्नत में है, ये दीन के अहकाम का माखज़ (स्त्रोत) है लेकिन उसी के साथ रसूलुल्लाह (स) के ज़माने में आपसे जो भी सवालात किए गए है, चीजों की वज़ाहत पूछि गयी है और आपने उसमें कुछ फैसले किए, कुछ हिदायत दी है और ये तमाम चीज़ें हम तक रिवायत (हदीस) की सूरत में पहुंची है। उस जमाने के लोगों का जो ताल्लुक रसूलुल्लाह (स) के साथ था ठीक वही ताल्लुक हदीस के ज़रिये से हमारा भी आप (स) से कायम होता है। आप (स) के हुक्म और फैसलों पर सर झुकाना ये हर ईमान-वाले का फर्ज़ है। और अगर वो ऐसा नहीं करता तो ये रवैया ईमान के खिलाफ है।
कुरआन मजीद के ज़माने में जब आप (स) दुनिया में माजूद थे उस वक़्त मुसलमानों को मुख़ातिब करके अल्लाह तआला ने फरमाया कि पैगंबर के मामले को आम लोगों जैसा न समझो, वो बुलाये तो ये न समझों कि कोई आम शख़्स बुला रहा है, वो हुक्म दे तो ये ख्याल न करों कि कोई आम आदमी हुक्म दे रहा है, वो क़ाज़ी की तरह कोई फैसला करें तो ये न समझो कि ये कोई आम क़ाज़ी का फैसला है जिससे तुम इख्तिलाफ़ (मतभेद) भी कर सकते हो बल्कि ये सब पैगंबर के फैसले और उसी के अहकाम है और पैगंबर का मामला आम इंसानों जैसा क़तअई नहीं होता।
इसे कुरआन में कुछ इस तरह बयान किया गया हैं:
लेकिन नहीं (ए पैग़ंबर), तुम्हारे परवरदिगार की क़सम, ये लोग कभी मोमिन नहीं हो सकते, जब तक अपने इख़तिलाफ़ात (मतभेदों) में तुम्ही को फ़ैसला करने वाला ना मान लें, फिर जो कुछ तुम फ़ैसला कर दो, उसपर अपने दिलों में कोई तंगी महसूस किए बग़ैर उस के आगे सर ना झुका दें। [सूरह निसा 4:65]
अल्लाह तआला ने अपनी हस्ती की क़सम खा कर फ़रमाया कि ये लोग उस वक़्त तक मोमिन नहीं हो सकते, जब तक ये अपने दरमयान पैदा होने वाली तमाम इख्तिलाफ़ात में आप (स) का हुक्म ना मानें और फिर साथ ही पूरे इतमीनान के साथ मानें। रसूल की इताअत (पैरवी) ख़ुद ख़ुदा की इताअत है, इस वजह से इसका हक़ सिर्फ़ ज़ाहिरी इताअत से अदा नहीं होता, बल्कि उसके लिए दिल की इताअत भी ज़रूरी है।
शुक्रिया
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