कुरआन का पैग़ाम
पार्ट-13
उम्मत ए वसत (The Middle Nation)
अल्लाह तआला ने इन्सानों की हिदायत के लिए और उनपर अपनी हुज्जत पूरी करने के लिए जिस तरह इन्सानों में से नबियों को नियुक्त किया ठीक उसी तरह नुबुव्वत के दूसरे दौर में सय्यदना इब्राहीम की नस्ल को नियुक्त किया गया। यानि सय्यदना इब्राहीम की औलाद को इस मक़ाम पर फ़ाइज़ किया की वो तौहीद का मरकज़ दुनिया के केंद्र में बनाए और क़ौमी हैसीयत से ख़ुदा का पैगाम लोगों तक पहुंचाए, ये एक गैर मामूली फैसला था। चुनांचे कुरआन मजीद को जब आप पढ़ेंगे तो वो जगह-जगह ये ऐलान करेगा कि ए बनी इसराईल हमने अपने इल्म के मुताबिक दुनिया वालों के ऊपर तुम्हें फ़ज़ीलत (प्रधानता) देकर तुम्हारा इंतखाब (चयन) किया था । पूरी क़ौम को इस मंसब पर फ़ाइज़ कर दिया कि वो खुदा के दीन की गवाही दे और खुदा के दीन के साक्षी बनें।
इसी मक़सद के लिए फिलिस्तीन में "बैतउल मकदिस" को तौहीद के मरकज़ के तौर पर तामीर किया गया और इसी मक़सद के लिए सय्यदना इब्राहीम (स) ने जज़ीरा ए अरब में "बैतुल्लाह" की बुनियाद रखी। ये एक गैर मामूली फैसला था और कयामत तक के लिए ये ज़िम्मेदारी हज़रत इब्राहीम की नस्ल पर डाली गयी।
इसका पहला मरहला (चरण) वही था जिसमें बनी इसराईल ने ये ख़िदमत अंजाम दी कम से कम 2000 साल तक, उनके ज़िम्मे खुदा के पैगाम को पहुँचाने के लिए एक विशेष कानून तौरत में भी बयान हुआ और कुरआन मजीद में भी उसे दोहराया गया। वो कानून ये था की अगर औलाद ए इब्राहीम अपनी जिम्मेदारी को अदा करेगी तो उन्हें दुनिया की सब क़ौमों पर सरफ़रज़ी हासिल होगी, और अगर ये उस ज़िम्मेदारी में कौताही करेगी तो खुदा के अज़ाब से इसी दुनिया में दो-चार हो जाएगी। यानि दुनिया की वही क़ौमें जिसपर उन्हें सरफ़राज़ी हासिल होनी थी वो ही इसपर चड़ दौड़ेगी और उसे गाजर मूली की तरह काटना शुरू कर देगी, उसके ऊपर आजाब बनकर टूट पड़ेंगी। इस कानून को तौरत ने बड़ी वज़ाहत के साथ बयान किया है। कुरआन मजीद की शुरुवाती सूरतों को भी देखा जाये तो उनमें भी इसी हक़ीक़त की याददिहानी कराई गयी हैं, और बनी इसराईल को ये बताया गया है कि वो अपनी इस ज़िम्मेदारी को पूरा करें।
ये ज़िम्मेदारी दूसरे मरहले (चरण) में बनी इसमाईल को दी गयी। बनी इसमाईल में हज़रत मुहम्मद (स0) की बेसत हुई और आपने उनपर रसूल की हैसियत से इतमाम ए हुज्जत की फिर खुदा का कानून लागू हुआ और जिन लोगों ने ईमान कुबूल किया उन्हें सरफराज़ी दी गयी (यानि गौरवपूर्ण स्थान मिला), और जिनहोनें इनकार किया उनपर खुदा के अज़ाब का फैसला सादिर हुआ। ये उम्मत यानि बनी इसमाईल में से जो उम्मत उठाई गयी है उसकी ज़िम्मेदारी शहादत-ए-हक़ (सच के साक्षी होने) की ज़िम्मेदारी है। उन्हें ये बताया गया है कि खुदा के रसूल ने तुम पर हुज्जत पूरी कर दी है और तुम्हें अब बाकी इन्सानों तक ये पैग़ाम पहुंचाना हैं। इनको इसी लेहाज़ से "उम्मत ए वसत" कहा गया, यानि एक तरफ खुदा का रसूल है और दूसरी तरफ पूरी दुनिया के लोग हैं और ये दरमियान में खड़े है। इनको खुदा के पैगंबर से पैगाम लेना है और पूरी इंसानियत तक पहुंचाना है। ये एहतेमाम अल्लाह तआला ने पूरी इंसानियत तक दीन का पैगाम पहुंचाने के लिए किया है। यानि पहले चरण में ये ज़िम्मेदारी बनी इसराईल को दी गयी और दूसरे चरण में ये ज़िम्मेदारी बनी इसमाईल को दी गयी। अब क़यामत तक के लिए दुनिया की सब क़ौमों पर खुदा की हुज्जत पूरी करने और खुदा की दावत (पैग़ाम) उन तक पहुंचाने की ज़िम्मेदारी इन्हीं पर (यानि हम मुसलमानों पर) है।
कुरआन मजीद ने कई जगह इसे बयान फरमाया है। मिसाल के तौर पर:
और (मज़ीद ये कि अपने मन्सब की ज़िम्मेदारीयों को पूरा करने के लिए) अल्लाह की राह में जद्द-ओ-जहद करो, जैसा कि जद्द-ओ-जहद करने का हक़ है। उसने तुम्हें चुन लिया है और (जो) शरीयत (तुम्हें अता फ़रमाई है, उस) में तुम पर कोई तंगी नहीं रखी है। तुम्हारे बाप इबराहीम की मिल्लत तुम्हारे लिए पसंद फ़रमाई है। उसी ने तुम्हारा नाम मुस्लिम रखा था, इससे पहले और इस (क़ुरआन) में भी (तुम्हारा नाम मुस्लिम है)। इसलिए (चुन लिया है) कि रसूल तुम पर (इस दीन की) गवाही दे और दुनिया के सब लोगों पर तुम (उसकी) गवाही देने वाले बनो। सो नमाज़ का एहतिमाम रखों और ज़कात अदा करते रहो और अल्लाह को मज़बूत पकड़ो। वही तुम्हारा मौला है। सो किया ही अच्छा मौला है और क्या ही अच्छा मददगार। [सूरह हज 22:78]
और (जिस तरह मस्जिद हराम को तुम्हारा क़िबला ठहराया है), ईसी तरह हमने तुम्हें भी एक दरमयान की जमात बना दिया है ताकि तुम दुनिया के सब लोगों पर (हक़ की) शहादत देने वाले बनो और अल्लाह का रसूल तुम पर ये शहादत दे। [सूरह बकरा 2:143]
(ईमान वालो, उस वक़्त तो अल्लाह की इनायत से) तुम एक बेहतरीन जमात हो जो लोगों (पर हक़ की शहादत) के लिए बरपा की गई है। तुम भलाई की तलक़ीन करते हो, बुराई से रोकते हो और अल्लाह पर सच्चा ईमान रखते हो। [सूरह अल इमरान 3:110]
खुलासा ये है कि ये मुसलमानों की ज़िम्मेदारी है कि वो खुदा के पैग़ाम पर ख़ुद भी अमल करें और इसे दूसरी क़ौमों तक पहुंचाए। अगर हम ऐसा नहीं करेंगे तो हमें जिस मंसब पर फ़ाइज़ किया गया है उसका हक़ अदा नहीं होगा और हम ख़ुदा के आज़ाब से इसी दुनिया में दो-चार होंगे जैसा की आजकल हो रहे है।
...
कुरआन का पैग़ाम
पार्ट-14
इबादत की रूह
दीन में जिन चीज़ों का बयान आता है उनमें हमारे शरीर की सफ़ाई है, हमारे खाने पीने की पाकीज़गी है,और इसी तरह हमारे अखलाक की पाकीज़गी है। इन तीन चीजों के अलावा एक चौथी चीज़ "इबादत" है।
इबादत दो चीज़ों का मजमुआ है, एक बाहरी ढांचा और दूसरा उसकी रूह। इबादत की रूह का मतलब है कि हमने अपने परवरदिगर को पहचाना,उसकी सच्ची मारिफ़त हासिल की और अपने बातिन से उसके सामने झुक गए। एक दूसरी चीज़ असल में इस रूह को ढांचा देने के लिए है, वो है इबादत के कुछ आदाब यानि etiquette। जैसा की हम नमाज़ में हाथ ऊपर उठाते है, क़ियाम करते है, रुकू करते है, सुजूद करते है इसी तरह हज के मुखतलिफ़ अहकाम है। इबादत में ये चीज़ें अलामती (symbolic) हैसियत रखती है। जिस परवरदिगार के सामने हम अपने बातिन से झुक गए है उसके सामने अपने ज़ाहिर को भी झुका दें।
आमतौर पर ये होता है कि दीन की रूह और इबादत की रूह नजरों से ओझल हो जाती है और इन अलामतों को ही लोग गैर मामूली हैसियत दे बैठते है। ये अलामतें बेशक गैर मामूली अहमियत रखती है लेकिन सिर्फ उसी वक़्त जब असल रूह और असल हक़ीक़त पेश-ए-नज़र रहे और ओझल न हो। मिसाल के तौर पर कुर्बानी के लिए सिर्फ जानवर ज़िबह करना काफी नहीं होगा जबतक आपके अंदर कुर्बानी का जज़्बा न हो, आप अपनी ख़्वाहिशों को रब के सामने सरैंडर न कर दें। असल मे होना ये चाहिए कि वो चीज़ जो दीन हमारे अंदर पैदा करना चाहता है हम उसको समझें और उनको समझकर इन अलामतों के ज़रिये से उस हक़ीक़त का इज़हार करें।
कुरआन मजीद में एक मुकाम पर इसी चीज़ को विषय बनाया है। ये मौका उस वक़्त आया जब नमाज़ के लिए दिशा (क़िबले) की बहस पैदा हुई। वो बहस ये थी कि किस रुख होकर नमाज़ पढ़ी जाये। इसका संदर्भ (background) ये है की जब हज़रत मुहम्मद (स) मक्का से हिजरत करके मदीना तशरीफ ले गए तब मदीने में आप "बैतउल-मक़दिस (यरूशलम)" की तरफ रुख करके नमाज़ पढ़ते थे। फिर अल्लाह तआला ने क़िबले को "बैतउल-मक़दिस" से बदल कर "बैतुल्लाह (मक्का)" की तरफ करने का हुक्म फ़रमाया। ये बात उस वक़्त के यहूद को नागवार गुज़री। और नसारा भी इस मामले में मुसलमानो से इख्तिलाफ़ रखते थे। उन्होनें जब इस मामले में इख्तिलाफ़ किया तो कुरआन मजीद ने इसपर टिप्पणी की। चुनांचे इरशाद है (ग़ौर फरमाए):
(ये समझते हैं कि अल्लाह से वफ़ा का हक़ मज़हब की कुछ रस्में पूरी कर देने से अदा हो जाता है। उन्हें मालूम होना चाहिए कि) अल्लाह के साथ वफ़ादारी सिर्फ ये नहीं कि तुमने (नमाज़ में) अपना रुख मशरिक़ (पूर्व) या मग़रिब (पश्चिम) की तरफ़ कर लिया, बल्कि वफ़ा-दारी तो उनकी वफ़ा-दारी है जो (पूरे दिल से) अल्लाह को मानें और क़ियामत के दिन को मानें और अल्लाह के फ़रिश्तों को मानें और उसकी किताबों को मानें और उसके नबियों को मानें और माल की मुहब्बत के बावजूद उसे क़राबत मंदों, यतीमों, मिस्कीनों, मुसाफ़िरों और मांगने वालों पर और लोगों की गर्दनें छुड़ाने (यानि ग़ुलाम आज़ाद करवाने) में ख़र्च करें, और नमाज़ का एहतिमाम करें और ज़कात अदा करें। और (वफ़ादारी तो उन की वफ़ादारी है कि) जब अह्द (वादा) कर बैठें तो अपने इस अह्द को पूरा करने वाले हों और बिलख़सूस (उनकी) जो तंगी और बीमारी में और जंग के मौक़े पर साबित-क़दम रहने वाले हों। यही हैं जो (अल्लाह के साथ अपने अहद-ए-वफ़ा में) सच्चे हैं और यही हैं जो फ़िलवाक़े परहेज़गार हैं।
[सूरह बकरह 2:177]
अल्लाह के यहाँ जो चीज़ क़ाबिल ए कुबूल है वह सिर्फ किसी क़िस्म की ज़ाहिरी चीज़ नहीं बल्कि वह अमल है (ज़ाहिर+बातिन) जो आदमी अपने पूरे वुजूद के साथ ख़ालिस अल्लाह के लिए करता है। अल्लाह का मक़बूल बंदा वह है जो अल्लाह को इस तरह पा ले कि अल्लाह का हुक्म उसकी ज़िंदगी बन जायें। आदमी अपने रब को इस तरह पा लें कि मुश्किल से मुश्किल वक़्तों में भी उसकी रस्सी उसके हाथों से छूटने न पायें और मौज के समय में भी वह ख़ुदा की याद से से गाफिल न हो। अल्लाह का हक़ उसकी सच्ची वफादारी से अदा होता है न कि महज़ ज़ाहिरी अलामतों को अदा करने से।
.....
कुरआन का पैग़ाम
पार्ट-15
दीन में अति मत करो
दीन में जिन चीजों को बड़ा गुनाह करार दिया गया है उनमें से एक चीज़
"ग़ुलू" यानि "अति" है । कुरआन मजीद ने सूरह निसा और सूरह माइदाह यानि दो मकामात पर अहले किताब को ख़िताब करके ये कहा है कि अपने दीन में अति न करों।
ए अहले-किताब, अपने दीन में ग़ुलू (अति) ना करो और अल्लाह के हक़ में, हक़ के सिवा कोई बात ना कहो। हक़ीक़त ये है कि मसीह ईसा इब्न मरियम अल्लाह के एक रसूल और उसका एक क़ौल ही थे जो उसने मरियम की तरफ़ अलक़ा फ़रमाया था और उसकी जानिब से एक रूह थे (जो अल्लाह ने उसमें फूंक दी थी)। सो अल्लाह और उसके रसूलों पर ईमान लाओ और (अल्लाह को) तीन ना बनाओ। बाज़ आ जाओ, यही तुम्हारे हक़ में बेहतर है। अल्लाह ही तन्हा माबूद है, वो इससे पाक है कि उसके औलाद हो, ज़मीन और आसमानों में जो कुछ है, उसी का है और उन के मुआमलात को देखने के लिए अल्लाह ही काफ़ी है।
[सूरह निसा 4:171]
ग़ुलू को आम बोल चाल में हम "इंतिहापसंदी" भी कहते है। दीन में हर चीज़ की एक जगह और एक मक़ाम मुकर्रर कर दिया गया है, हर चीज़ का एक वज़न मुकर्रर है। अगर एक चीज़ "पाओ" है और एक चीज़ "सेर" है तो हम अपनी तरफ से पाओ को सेर और सेर को पाओ नहीं बना सकते। दीन के मामले में हमे पाबंद कर दिया गया है कि जैसा कि वो है उसे बिलकुल वैसा ही लोगों तक पहुंचाएँ और अपनी तरफ से उसमें कोई इज़ाफ़ा न करें।
इंसान के साथ मामला ये है कि जिस तरह ख़ुदा ने दीन हमको दिया है हम बिलकुल उसी तरह उसको दुनिया तक नहीं पहुंचाते बल्कि इसमें आमतौर पर इंतिहापसंदी (अति) इख्तियार कर ली जाती है।
अल्लाह तआला ने पैगंबर भेजे और बार बार ये तवज्जो दिलाई कि इन पैगंबरों का इंतखाब "इन्सानों" में से किया गया है, उनकी तरफ "वही" (प्रकाशना) की जाती है, वे ख़ुदा के बंदे और उसके रसूल या उसके नबी होते हैं। लेकिन हम जानते है कि उन्हीं पैगंबरों में से कुछ को ख़ुदा का बेटा बना लिया जाता है। अल्लाह तआला ने फरिश्तों के बारे में ये बताया कि वो भी ख़ुदा के बंदे है जो उसका पैग़ाम लेकर आते है और उनको जो भी ज़िम्मेदारी दी जाती है उसे वो ज़रूर पूरी करते है और कभी भी अल्लाह के किसी हुक्म की खिलाफवरजी नहीं करते। लेकिन उन्हीं फरिश्तों को लोगों ने देवी-देवता बनाकर उनकी इबादत करना शुरू कर दी। अरब के मुश्रिकीन ने फ़रिश्तों के बारे में भी ये तसव्वुर कायम किया कि ये ख़ुदा की बेटियाँ है और इस लेहाज से लोग अपनी फरियादें उनके सामने पेश कने लगते है।
कुरआन में सय्यदा मरियम को बहुत ऊंचा मक़ाम दिया गया है, कुरआन मजीद में बार बार ये कहा गया है कि वो सच्ची और ख़ुदा की नेक बंदी थीं। लेकिन कुछ लोगों ने उनको भी इस मक़ाम से उठाकर ख़ुदा की माँ बना दिया और इसी तरह के बेशुमार मामलात है जिनकी मिसाल देकर कुरआन मजीद ये कहता है कि ये इंतिहापसंदी है और ये अल्लाह तआला पर झूठ बांधना है। यानि एक ऐसी बात अल्लाह तआला की तरफ मनसूब की जा रही है जो अल्लाह तआला ने कभी नहीं कही।
दीन के मामले में ये ज़रूरी है कि हम जब उसका कोई हुक्म बयान करें या लोगों तक उसको पहुंचायें तो ये ज़रूर देखें कि उसके क्या हुदूद बयान किए गए है, अल्लाह तआला ने उसको किस तरह पेश किया है, उसको खूब अच्छी तरह समझे और अपनी तरफ से ज़ोर पैदा करने के लिए बात को कहीं से कहीं न पहुंचा दें। ज़रा सी बात को अफसाना न बना दें, बात का बतंगड़ न बना दें, बल्कि हमेशा पूरी ज़ोर के साथ ये बताएं कि ये बात अल्लाह तआला ने फरमाई है और इतनी फरमाई है।
बदकिस्मती से हमारे यहाँ भी यही सूरतेहाल है। दीन में बहुत सी चीज़ें है जिनके बारे में हमको ये बताया गया है कि वो गुनाह है, मिसाल के तौर पर कोई शिर्क करता है, कोई शख्स जानते बूझते अल्लाह के पैगंबर का इनकार कर देता है या दीन के हकाइक़ का इनकार कर देता है तो ये सब बड़े गुनाह है लेकिन इन गुनाहों के बारे में इसके साथ ही हमको ये बात भी बता दी गयी है कि हमारा काम इनपर तवज्जो दिलाना है, लोगों को ये बताना है कि ये गुनाह है, तबलीग़ करना है, दावत देना है, दलील के साथ उनकी गलती वाज़ेह करना है, लोगों के दिलो दिमाग पर दस्तक देकर उनको बताना है कि वो किस गुनाह में लिप्त है और दलाइल के साथ अपनी बात बयान करना है, लेकिन ये हक़ हममें से किसी को भी हासिल नहीं है कि हम इन गुनाहों के करने वालों को "मुशरीक" और "काफिर" करार दें या उनपर फतवे लगाए, या उनके खिलाफ कोई इक़दाम करने की कोशिश करें, इसके हुदूद (सीमाएं) निर्धारित कर दी गई है और ये बताया गया है कि अल्लाह तआला ने अपने दीन के मामले में ज़ोर ज़बरदस्ती नहीं रखी है। चुनांचे ये इलान किया गया है:
(ये जो रवैय्या चाहें, इख़तियार करें), दीन के मुआमले में (अल्लाह की तरफ़ से) कोई ज़बरदस्ती नहीं है। हक़ीक़त ये है कि हिदायत (इस क़ुरआन के बाद अब) गुमराही से बिलकुल अलग हो चुकी है। लिहाज़ा जिसने शैतान का इनकार किया और अल्लाह को माना तो उसने गोया निहायत मज़बूत रस्सी पकड़ ली जो कभी टूट नहीं सकती। और (ये इस लिए कि) अल्लाह समीअ व अलीम है। [सूरह बरकाह 2:256]
अगर अल्लाह चाहता तो ये कभी शिर्क ना कर पाते। हमने उन पर तुम्हें निगरान (दारोगा) मुक़र्रर नहीं किया है और ना तुम उन के ज़ामिन हो। [सूरह अनआम 6:107]
लेहाज़ा हमें अपनी हद में रहकर केवल अच्छे अंदाज़ में, दलाइल के साथ पैग़ाम पहुंचाने का काम करना चाहिए। किसी के कुफ़र और ईमान का फैसला करना या किसी को जन्नत और जहन्नम के सर्टिफिकेट बांटना हमारा काम क़तअई नहीं है।
....
कुरआन का पैग़ाम
पार्ट-16
हुकूमत की ज़िम्मेदारी
अल्लाह का पैग़ाम लोगों तक पहुंचाया जाये इसके लिए एक एहतेमाम (प्रबंध) वो है जिसका ज़िक्र हम पिछले पार्ट्स में कर चुके हैं यानि बनी इसमाईल (मुस्लिम उम्मत) को ये ज़िम्मेदारी दी गयी की वो दुनिया की सब क़ौमों तक खुदा का पैग़ाम पहुंचाए लेकिन खुद बनी इसमाईल के अंदर इसका क्या एहतेमाम (प्रबंध) होगा? और वो लोग जो बनी इसमाईल की दावात कुबूल करके मुसलमान होंगे उनेक लिए क्या एहतेमाम किया जाएगा? इसके लिए एक हिदायत कुरआन मजीद में दी गयी है।
जहा कहीं भी कोई जमीयत होती है (यानि लोगों का समूह होता है) वहाँ लोग एक आपस में संगठित रहने की एक प्रणाली कायम करते हैं, ये कानून पूरी दुनिया में लागू है। यानि जब भी इंसान कहीं जमा होते है तो वो अपने अंदर एक संगठन का निर्माण कर लेते हैं, इसी संगठन को हम रियासत कहते है। प्राचीन जमाने में जब लोग कबीले की सूरत मे इखट्टे हो जाते थे तो एक कबीले के सरदार को चुनते थे, उसी से आगे बढ़कर एक रियासत फिर हुकूमत की संकल्पना पैदा हुई । इस वक़्त हम क़ौमी रियासतों (nation-states) के दौर मे जी रहे हैं। इस तरह की हुकूमत दुनिया के सारे मुसलमानों के लिए भी क़ायम हो सकती है या विभिन्न क़ौमों के लेहाज से अलग-अलग भी कायम हो सकती हैं, जिस तरह कि इस वक़्त कायम है। मुसलमानों को अल्लाह तआला ने ये हिदायत फरमाई है कि जब उनका एक नज़्म क़ायम हो जाये और उनकी एक रियासत वुजूद में आ जाएँ तो उस रियासत की कुछ दीनी जिम्मेदारियाँ भी है। यानि शांति व्यवस्था, सुरक्षा के बंदोबस्त इत्यादि के साथ ही उसे कुछ दीनी फराइज़ (धार्मिक कर्तव्यों) को भी पूरा करना चाहिए। ये कर्तव्य एक मुसलमान की हैसियत से उनके परवरदिगर ने उनपर लाज़िम किए है । उनमें से एक फर्ज़ ये है, कि सरकारी सतह पर मुसलमानों में से कुछ लोगों को इस काम के लिए नियुक्त किया जाये जाना चाहिए कि वो लोगों को भलाई की तलकीन करें और बुराई से रोकने की नसीहत करें। इसे कुरआन में कुछ इस तरह बयान किया गया हैं:
और चाहिए कि तुम्हारे अंदर से कुछ लोग नियुक्त किए जायें जो नेकी की दावत दें, भलाई का सदुपदेश दें और बुराई से रोकते रहें। (तुम ये व्यवस्था करो) और (याद रखो कि जो ये करेंगे) वही क़ामयाबी पाएँगे।
[सूरह अल इमरान 3:104]
इसके कुछ पहलू है जिसको हम पहले बहुत अच्छी तरह समझ लेते हैं। इसमें मुसलमानों की हुकूमत (गवर्नमेंट) की तरफ से कुछ लोगों को नियुक्त करने की हिदायत की गयी है । आज के दौर में इसका ये तरीका कायम किया जा सकता हैं कि जहां कहीं भी मुस्लिम हुकूमत हो वहाँ की "जामा मस्जिदों" का संचालन रियासत के पास होना चाहिए और सप्ताह में एक दिन निश्चित किया जाना चाहिए (जैसे जुमे का दिन)। उस दिन लोग नमाज़ के लिए वहाँ जमा होंगे और उससे पहले खुतबा दिया जाएगा, ताकि दावत इलल-खैर (यानि भलाई की तलकीन) की ज़िम्मेदारी रियासत की सतह पर पूरी की जाये। ये शासकों की ज़िम्मेदारी है कि वो ख़ुद या उनके नुमाइंदे मस्जिद में आयें वो जमात से नमाज़ पढ़ें और खुतबा भी वही दे और इस खुतबे का विषय "दावत इलल खैर" होना चाहिए यानि "भलाई की दावत"। यानि ये बात कि तुम्हें पूरा तौलना है, तुम्हें सच बोलना हैं, ईमानदारी से काम करना हैं, तुम्हें सरकार की संपत्ति को अपनी संपत्ति नहीं समझना बल्कि सभी लोगों की संपत्ति समझनी है, भलाई की बातों के अलावा बुरी बात से रोकें। अगर ये चीज़ इसी तरीके से होती रहेगी तो मुसलमान उम्मत सही रास्ते में कायम रहेगी और कामयाबी पाएगी।
कुरआन का पैग़ाम
पार्ट-17
उलमा और हमारी ज़िम्मेदारी
अल्लाह तआला ने पूरी इंसानियत के तज़किए (शुद्धिकरण) के लिए बहुत से पैग़ंबर भेजे और जनाब मुहम्मदुर रसूलुल्लाह (स) पर नुबुव्वत का सिलसिला ख़त्म हुआ। इसके बाद बनी इसमाईल को ये ज़िम्मेदारी दी गयी की अब वो ये पैग़ाम दुनिया तक पहुंचायें । यहीं असल में “मुसलमान उम्मत” है। हम जब ईमान कुबूल करते हैं तो हम भी इस उम्मत का हिस्सा बन जाते हैं। इसके बाद खुद इनके लिए ये बंदोबस्त किया गया की जब किसी जगह इनकी हुकूमत क़ायम हो जाये तो जुमे के दिन इनके लिए भी तज़कीर और नसीहत का इंतिज़ाम हो और इनको भी ये बताया जाये कि तुम्हें शुद्धि कैसे हासिल करनी है। अब हम देखते है की कुरआन मजीद में उलमा और आम मुसलमानों के बारे में क्या दिशा-निर्देश आयें है।
इरशाद है:
ये तो मुम्किन नहीं था कि मुस्लमान, सब के सब निकल खड़े होते, मगर ऐसा क्यों ना हुआ कि उनके हर गिरोह में से कुछ लोग निकलते ताकि दीन में बसीरत (प्रतिभा) पैदा करते और अपनी क़ौम के लोगों को ख़बरदार करते, जब उनकी तरफ़ लोटते, इसलिए कि वो बचते।
[सूरह तौबाह 9:122]
ये वो इंतेज़ाम है जो अल्लाह तआला ने उन लोगों की इस्लाह और तालीम और तर्बीयत (शिक्षा आर प्रशिक्षण) के लिए तजवीज़ फ़रमाया जो दूर दराज़ के इलाक़ों में रहने की वजह से रसूलअल्लाह (सल्ल-अल्लाहु अलैहि वसल्लम) के जीवन के दौरान भी आपसे सीधे तौर पर लाभान्वित नहीं हो सकते थे। स्पष्ट है कि यही प्रबंध आपके दुनिया से रुख़स्त हो जाने के बाद भी होना चाहिए। चुनांचे इरशाद हुआ है कि सब मुस्लमानों के लिए तो ये मुम्किन नहीं है, लेकिन उनकी हर जमात में से कुछ लोगों को लाज़िमन इस मक़सद के लिए निकलना चाहिए कि वो दीन का इलम हासिल करें और अपनी क़ौम के लिए नज़ीर (आदर्श) बनकर उसे आख़िरत के अज़ाब और ख़ुदा की गिरिफ़त से बचाने की कोशिश करें। ये लगभग वही काम है जो अल्लाह के नबी और रसूल अपनी क़ौम में करते हैं। इससे मालूम हुआ कि नबी (स) से दावत और ख़बरदार करने का ये अज़ीम काम आपके बाद इस उम्मत के उलमा को ट्रांस्फर हुआ है और ख़त्म नबुव्वत के बाद ये ज़िम्मेदारी अब क़ियामत तक उन्हें ही अदा करनी है चाहे मुस्लिम हुकूमत ये काम सरकारी सतह पर करें या ना करें!
जैसा की हा देख चुके है कि हमारे दीन ने हमसे जिस तरह ये तक़ाज़ा किया गया है कि ईमान लाने के बाद हम अच्छा अमल करे उसी तरह ये तक़ाज़ा भी किया गया है की हम सच्चाई का और हक़ का पैगाम दूसरों तक भी पहुंचाते रहें। हमारे दीन का एक उसूल ये है कि इसमें लोगो पर ज़िम्मेदारी उनकी ताकत के हिसाब से डाली जाती है। चुनांचे पूरी दुनिया तक खुदा का पैग़ाम पहुंचाने की ज़िम्मेदारी संगठित और समूहिक रूप से पूरी "मुसलमान उम्मत" पर डाली गयी है न कि किसी एक शख़्स पर। इसी तरह मुस्लिम हुकूमत पर ये ज़िम्मेदारी डाली गयी है की वो पूरी क़ौम को खैर और भलाई की दावत पहुंचाने के लिए मसजिद का संचालन (नज़्म) अपने हाथों में ले और यदि ये व्यवस्था कहीं कमजोर पढ़ रही हो या इसकी तरफ ध्यान दिलाने की ज़रूरत हो तो उलमा का इदारा (विद्वानों की संस्था) कायम करने का निर्देश दिया है यानि कुछ लोग ऐसे हों जो दीन में गहरी नज़र पैदा करें और सच्चाई का पैगाम लोगों तक पहुंचाए और उनको ख़बरदार करें। अब सवाल ये है कि इसके संबंध में आम आदमी पर क्या ज़िम्मेदारी डाली गयी है? यानि मुसलमान उम्मत, हुकूमत और उलमा की ज़िम्मेदारी तो हम समझ चुके है अब आम मुसलमान से क्या तक़ाज़ा किया गया है?
इसे कुरआन में कुछ इस तरह बयान किया गया हैं:
मोमिन मर्द और मोमिन औरतें, (वो भी) एक दूसरे के रफ़ीक़ (सहचर) हैं । (इन मुनाफ़िक़ों के बरख़िलाफ़) वो भलाई की तलक़ीन करते और बुराई से रोकते हैं, नमाज़ का एहतिमाम करते हैं, ज़कात देते हैं और अल्लाह और उसके रसूल की इताअत (आज्ञापालन) करते हैं। यही लोग हैं जिन्हें अल्लाह जल्द ही अपनी रहमत से नवाज़ेगा। इसमें शुबा नहीं कि अल्लाह ज़बरदस्त है, वो बड़ी हिक्मत वाला है। [सूरह तौबाह 9:71]
इस आयत में ये बताया गया है कि एक मुसलमान जिस भी माहौल में हो, जहां भी वो उठे बैठे, जहां भी काम करे तो उनपर ये ज़िम्मेदारी डाली गयी है कि वो हर जगह भलाई की बातों के लिए तलकीन करते रहें और बुरे कामों से लोगों को रोकते रहें। “भलाई” क्या होती है और “बुराई” किसे कहते है इससे हर इंसान परिचित है क्योंकि अच्छाई-बुराई की बुनियादी समझ अल्लाह तआला ने हमारे अंदर इल्हाम करके ही हमें दुनिया में भेजा है। सूरह अस्र में भी इसी पैग़ाम को दोहराया गया है:
ज़माना गवाही देता है, ये इंसान घाटे में पड़कर रहेंगे हाँ मगर वो नहीं जो ईमान लायें और उन्होने नेक अमल कियें। और एक दूसरे को हक़ की नसीहत की और (हक़ पर) साबित क़दमी की नसीहत की।
[सूरह अल अस्र 103:1-3]
.
कुरआन का पैग़ाम
पार्ट-18
दावत ए दीन का तरीका
इससे पहले हम देख चुके है कि अल्लाह तआला ने पूरी उम्मत ए मुस्लिमा (बनी इसमाईल) पर ये ज़िम्मेदारी डाली है कि वो एक उम्मत की हैसियत से ख़ुदा के पैग़ाम को पूरी दुनिया तक पहुंचायें फिर हमने देखा कि मुस्लिम हुकूमत (वो दुनिया में जहां कहीं भी क़ायम हो) उसपर ये ज़िम्मेदारी डाली गयी है कि वो जामा मस्जिद का नज़्म अपने पास रखें और जुमे के मिम्बर से लोगों को दावत इलल ख़ैर करें (यानि भलाई की दावत दें), फिर हमनें देखा कि उलमा चूंकि अंबिया के बाद उनके वारिस की हैसियत रखते हैं तो उन्हें दीन में बसीरत हासिल करके क़ौम के लिए एक नज़ीर (आदर्श) बनना है। आखिर में हमने ये देखा कि आम मुसलमानों की ज़िम्मेदारी ये हैं कि उन्हें खुद दीन पर अमल करने के साथ साथ अपने गिर्दोपेश में भी भलाई की दावत देते रहना है और बुराई से रोकते रहना है। अब सवाल ये हैं कि दीन की दावत देने का क्या तरीक़ा हमें कुरआन मजीद ने सिखाया है?
इरशाद है:
तुम, (ए पैग़ंबर), अपने परवरदिगार के रास्ते की तरफ़ दावत देते रहो हिक्मत के साथ और अच्छी नसीहत के साथ, और उनके साथ इस तरीक़े से बहस करो जो पसंदीदा है। यक़ीनन तेरा परवरदिगार ख़ूब जानता है कि कौन उसकी राह से भटका हुआ है और वो उनको भी ख़ूब जानता है जो हिदायत पाने वाले हैं। [सूरह नहल 16:125]
आयत ए मुबारक में अल्लाह तआला ने निहायत खूबसूरती के साथ ये बताया है कि दीन की तरफ हमेशा हिकमत (तत्वदर्शिता) के साथ बुलाना चाहिए और जब भी नसीहत की ज़रूरत पेश आयें तो हमेशा अच्छी नसीहत करनी चाहिए। नसीहत जब भी कोई करें चाहे बाप बेटे को, उस्ताद शागिर्द को, शौहर बीवी को, रियासत अपने अफराद को या उलमा कभी कोई नसीहत करें तो हमेशा अच्छी नसीहत करें। चूंकि नसीहत के दौरान तल्खी आने का अंदेशा रहता हैं, लबो लहज़े में खराबी आ सकती है, टोन बिगड़ने का अंदेशा रेहता है, इसलिए ख़ासतौर पर ये तरघीब (शिक्षा) दी गयी है कि नसीहत हर हाल में भले तरीक़े से ही होनी चाहिए और उसका उसलूब (टोन) अच्छा हो, बात इस तरह से कही जाये के हमारे दिल से निकले और सीधे सामने वाले के दिल में उतर जाये।
दीन की दावत के दौरान ये अंदेशा भी रेहता हैं कि कई बार बहस की नौबत आ जाती है, कोई ऐतराज करता है तो कोई सवाल उठाता है इसलिए इसमें भी हमें ये हिदायत की गयी है कि कभी बहस भी हो जायें तो हमेशा विनम्र ही रहना चाहिए, बात इस तरह से होनी चाहिए कि उसमें कोई तल्खी न हो, कोई लान तान न हो, गाली-गलौच न हो, कोई फतवेबाजी न हो बल्कि अच्छे उसलूब में अपना मत व्यक्त किया जाना चाहिए । बात समझाने के लिए होनी चाहिए न कि थोपने या मनवाने के लिए और ना ही अपने इल्म की शेख़ी बगारने के लिए।
हम जब गुफ्तगू करते हैं तो कई बार ऐसा होता है कि दूसरे पर लान तान शुरू कर देते हैं, फतवेबाजी शुरू कर देते है, सामने वाले की नियत पर हमलावर हो जाते हैं, उसक अंजाम निश्चित करने लगते हैं, उसे जन्नत/जहन्नम के सर्टिफिकेट बांटने लगते है, उसे अलग-अलग तरह के नामों और लकाबों से बुलाने लगते है, ज़रा बहस की नौबत आने पर हम अपने तमाम अखलाक़ी (नैतिक) उसूलों को भूल जातें हैं। कुरआन मजीद ने इस आयत में हमें इससे रोका हैं। जिस वक़्त दीन की बात हो रही हो तो हमें सामने वाले के बारे में हुस्न ए ज़न (अच्छी सोच) रखना चाहिए, उनको नेक नियत समझ कर बात करनी चाहिए, उनके इख्तिलाफ़ (मतभेद) को गंवारा करना है, अपनी बात इस तरह पहुंचानी है कि दिल जीतना है, दिल और दिमाग पर प्रभाव डालना हैं, दूसरों के बारे में नफरत पैदा नहीं करनी। हमारा काम सिर्फ ये है कि हम ख़ुदा का पैग़ाम निहायत ख़ूबी के साथ लोगों तक पहुंचा दें। याद रहें हम किसी पर दारोगा बनाकर नहीं भेजे गयें है। ये वो चीज़ें हैं जिसे हर उस शख़्स को अपने दिल और दिमाग में रखनी चाहिए जिसे अल्लाह तआला अपना पैग़ाम पहुंचाने की तौफीक दे।
औऱ हमारी ज़िम्मेदारी तो केवल स्पष्ट रूप से संदेश पहुँचा देने की हैं।
[सूरह यासीन 36:17]
एक आखरी बात इसमें ये बतानी है कि कई बार ऐसा होता है कि किसी शख़्स से बात करने के दौरान हमें महसूस होता है कि सामने वाला शख़्स किसी चीज़ को समझने के मूड में नहीं है बल्कि वह सिर्फ उपहास उड़ाने आर ताना देने के के लिए आया है। कई बार ऐसे शख़्स बदज़बानी करते है और बदतमीजी से पेश आते है। कुरआन मजीद ने हमें बताया है कि जब भी ऐसा मामला हो तो उसमें हमारा रवैया कैसा होना चाहिए।
चुनांचे इरशाद है:
रहमान के (प्रिय) बन्दें वहीं है जो धरती पर नम्रतापूर्वक चलते है और जब जाहिल उनसे उलझने की कोशिश करें तो उनको सलाम करके अलग हो जाते हैं। [सूरह अल फुरकान 25:63]
यानि मुराद ये है कि ऐसा मौकों पर बहस में उलझकर अपना समय बर्बाद नहीं करना चाहिए और न ही उनकी तरह बदतमीजी पर उतरना चाहिए, बल्कि शाइस्तगी से सलाम करके उनसे अलग हो जाना चाहिए। जब तक हम अपने रवईये को इन उसूलों के मुताबिक नहीं ढालेंगे तब तक ये अमल ख़ुदा की मंशा के मुताबिक़ अमल न कहलाएगा।
अल्लाह तआला से दुआ है:
"मेरे रब! मेरा सीना मेरे लिए खोल दे और मेरे काम को मेरे लिए आसान कर दे और मेरी ज़बान की गिरह खोल दे कि वे मेरी बात समझ सकें।
[सूरह ताहा 20:25-27]
कुरआन का पैग़ाम
पार्ट-19
नुसरत ए दीन
हम जब ईमान लाते हैं तो ये ईमान हमसे कुछ चीजों का तक़ाज़ा करता हैं उसका पहला तक़ाज़ा ये है कि हम अच्छा अमल करें। जब हमनें ये मान लिया कि हमारा एक परवरदिगार है और इस बात को स्वीकार कर लिया कि एक दिन हमें उसके सामने जवाबदेह होना है, जब हमने ये मान लिया कि मुहम्मदूर रसूलुल्लाह (स0) अल्लाह के पैगंबर है और हम आप पर ईमान ले आयें है तो उसी ईमान के लाज़मी तकाज़े (स्वाभाविक परिणाम) के तौर पर अब हमें अपनी ज़िंदगी पर एक निगाह डालकर देखनी है कि कहीं हम बुरे आमाल में लिप्त तो नहीं हैं या क्या हम अच्छा अमल कर रहे है? हमारे अखलाक, हमारा किरदार और हमारी सीरत कैसी है? क्या हम सच बोलते है, लोगों के साथ इंसाफ करते है, भलाई की बात करते है, हम किसी का हक नहीं मारते, हम मिलावट नहीं करते, हम धोका नहीं देते, हम फरेब नहीं देते, हम किसी के माल पर क़ब्ज़ा नहीं करते, हम किसी की जान माल आबरू को नुकसान नहीं पहुंचाते, हम खियानात नहीं करते, हम गबन नहीं करते, हम सच्चाई पर कायम है और सच्चाई की दावत देनें वाले हैं, ये आमाल-ए-सालेह है यानि अच्छे आमाल है और ईमान का सबसे पहला तक़ाज़ा यही है कि हम अच्छे अमल (कर्म) करें। ईमान का दूसरा तक़ाज़ा ये है कि हम जिस हक़ को खुद समझ चुके है अपने गिर्दोपेश (आस-पास) के माहौल में लोगों को उसकी दावत दें। ये तकाजे तो हर वक़्त हर माहौल में हर इंसान से हैं लेकिन इसके अलावा फिर ईमान के कुछ ऐसे तकाज़े भी है जो हालात के लेहाज़ से पैदा होते है इनमें से एक तक़ाज़ा वो है जिसे "नुसरत ए दीन" कहते है यानि "दीन की मदद"।
इसे कुरआन मजीद ने सूरह सफ़्फ़ की आयत 14 में बयान किया है:
ईमान वालो, अल्लाह के मददगार बनों , जिस तरह ईसा इबन-ए-मरियम ने हवारियों से कहा था: कौन अल्लाह की राह में मेरा मददगार बनता है? हवारियों ने जवाब दिया: हम अल्लाह के मददगार हैं। चुनांचे बनी इसराईल में से एक गिरोह ईमान लाया और एक गिरोह अपने कुफ़्र पर जमा रहा। फिर हमने ईमान वालों की उनके दुश्मनों के मुक़ाबले में मदद की तो वही ग़ालिब हो कर रहे। [सूरह सफ़्फ़ 61:14]
वाक़या ये है कि जब यहूद ने हज़रत ईसा की दावत को कुबूल करने से इन्कार कर दिया तो हज़रत मसीह अलैहिस-सलाम ने अपने साथीयों को आगे की जद्द-ओ-जहद के लिए तैयार रहने को कहा और उन्होनें फ़रमाया कि मैं तो ख़ुदा की राह में निकल पड़ा हूँ, अब जिसमें हौसला हो , वो उठे और मेरा साथ दे। यानी हम इस काम में हिस्सा लेने के लिए तैयार हों जो अल्लाह तआला चाहता तो अपनी क़ुव्वत के ज़रीये कर सकता था लेकिन इसके बजाए उसने अपने बंदों के ज़रीये ऐसा करवाना चाहा।
अल्लाह ने अपना दीन पैगंबरों के ज़रिये भेजा है और इस दीन को पैगंबरों ने इन्सानों तक पहुंचाया है और फिर इन्सानों ने दूसरे इन्सानों तक पहुंचाया है । इस दीन को मदद की ज़रूरत होती है और ये मदद कई लेहाज़ से हो सकती है। यानि ऐसा होता है कि इस दीन का कोई मरकज़ (केंद्र) बनाने की ज़रूरत पड़े जैसे हज़रत इब्राहीम ने “बैतुल्लाह” को दीन का मरकज़ बनाया या हज़रत सुलैमान/हज़रत दाउद ने “बैतुल-मक़्दिस” की सूरत में एक मरकज़ बनाया। मौजूदा दौर में ये ज़रूरत होती है कि कहीं मुसलमानों की आबादी है तो वहाँ मस्जिद बनाई जाये। इसी तरह इस दीन की एक ये ज़रूरत होती है कि इसके लिए कोई दीनी तालीम का एहतेमाम किया जाये, दीन के आलिम बनाने का एहतेमाम किया जाये, दीन के पैगाम को पहुँचाने के लिए साधन का इंतेज़ाम किया जाये। इसके लिए किसी को अपना वक़्त देना है, किसी को अपनी ऊर्जा लगानी करनी है, किसी को अपनी पूंजी देना है, इन सब चीज़ों को नुसरत-ए-दीन (यानि दीन की मदद) कहा जाता है। ये भी ईमान के तक़ाज़ों में से एक अहम तक़ाज़ा हैं।
हमारी मुसलमान उम्मत में दीन की नुसरत (मदद) के जितने काम होते रहे है वो सारे इसी के तहत है। इसमें ज़ाहिर है कि हालात बहुत बहुत बड़ा किरदार अदा करता है यानि कहाँ पर किसी चीज़ की ज़रूरत है ये हर शख़्स अपनी समझ के मुताबिक तय करेगा कि इस वक़्त, इस ज़माने में, इस माहौल में फलां चीज़ की ज़रूरत है । मान लीजिये हम किसी दूसरे मुल्क में गए है और हम महसूस करते है कि वहाँ कोई इस्लामी मरकज़ बनना चाहिए या फिर दीनी तालीम का कोई एहतेमाम होना चाहिए या उलमा पैदा करने के लिए आला इदारे (संस्था) होनी चाहिए या दीन पर तहक़ीक़ी काम (रिसर्च वर्क) के लिए अकडेमी होनी चाहिए वगैरह तो हमें इसके लिए तन-मन-धन से कोशिश करनी चाहिए। इसी को नुसरत ए दीन कहा जाता है। जब भी कोई पैगंबर दुनिया में आते हैं तो वो भी लोगों से कहते है कि ईमानवलो हमारे मददगार बन जाओ। ये याद रहें कि अल्लाह तआला को किसी की मदद की ज़रूरत नहीं है बल्कि ये उन्हीं की स्कीम है कि वो इन्सानो के ज़रिये से ये काम करवाये।
इसी बात को कुरआन मजीद में एक दूसरे अंदाज़ में भी बयान किया गया है:
कौन है जो अल्लाह को क़र्ज़ देगा, अच्छा क़र्ज़ कि अल्लाह उस के लिए उसे कई गुना बढ़ा दे। और अल्लाह ही है जो तंगी भी करता है और फ़राख़ी भी । (इस लिए जो कुछ मिला है , ये उसी की इनायत है ) और तुमको ( एक दिन) उसी की तरफ़ लौटना भी है। [सूरह बकरह 2:245]
अल्लाह तआला ने ईमानवालों द्वारा की गयी उसकी राह में कोशिश को अपने ज़िम्मे "अच्छा कर्ज़" करार दिया है। क़र्ज़दार के ज़िम्मे वाजिब होता है कि वो उसे लौटाये। रब्बे करीम का कितना बड़ा एहसान है कि जो माल उसने ख़ुद अपने बंदों को इनायत फ़रमाया है , वही माल वो जब उनसे अपनी राह में ख़र्च करने के लिए कहता है तो उसको अपने ज़िम्मे क़र्ज़ ठहराता है , यानी उसकी वापसी खु़द अपने ज़िम्मे वाजिब क़रार देता है। फिर इससे ज़्यादा दिल को छूने वाली बात ये है कि वो परवरदिगार ये क़र्ज़ इसलिए मांगता है कि वो उसका सवाब कई गुना बढ़ाकर अपने बंदों को वापिस करे। इस गलतफ़हमी में न पड़ जाना कि उसके खजाने में कमी आने के कारण उसे इस क़र्ज़ की ज़रूरत पेश आई है। उसका ख़ज़ाना तो भरपूर है लेकिन ये उसकी रहमत है कि उसने अपने बंदों के लिए कई गुना नफ़ा कमाने की ये राह खोली।
कुरआन का पैग़ाम
पार्ट-20
कियाम बिल क़िस्त (इंसाफ पर क़ायम रहो)
ईमान सिर्फ ये नहीं है कि हम चंद वास्तविकताओं को स्वीकार कर लें। बल्कि हम जब ये कहते है कि हमारा एक परवरदिगार है और हम जब इस बात का एतराफ़ करते है कि एक दिन हमें उसके सामने जवाबदेह होना है तो इसके कुछ तकाजे है जो हमें हर हाल मे पूरे करने होते हैं। हम पहले ये बयान कर चुके है कि ईमान का एक तक़ाज़ा ये है कि हम अच्छा अमल करें, एक तक़ाज़ा ये है कि हम अपने गिर्दोपेश (आस-पास) में हक़ और हक़ पर साबित क़दमी (दृड़ रहने) की नसीहत करेंगे, एक तक़ाज़ा ये है कि हम ख़ुदा के दीन की मदद करेंगे, इसी तरह एक तक़ाज़ा “कियम बिल क़िस्त” का बयान किया गया है यानि हम ईमान रखते है तो फिर हमें हर हाल में इंसाफ पर कायम रहना है, निजी ज़िंदगी में भी और सामूहिक ज़िंदगी में भी। चुनांचे इरशाद है:
ईमान वालो, इन्साफ़ पर क़ायम रहो, अल्लाह के लिए उसकी गवाही देते हुए, अगरचे ये गवाही ख़ुद तुम्हारी ज़ात, तुम्हारे माँ बाप और तुम्हारे क़राबत मंदों के ख़िलाफ़ ही पड़े। अमीर हो या ग़रीब, अल्लाह ही दोनों के लिए ज़्यादा हक़दार है, इस लिए (ख़ुदा की हिदायत को छोड़कर) तुम ख़्वाहिशों की पैरवी ना करो कि इस के नतीजे में हक़ से हट जाओ और (याद रखो कि) अगर (हक़-ओ-इन्साफ़ की बात को) बिगाड़ने या (इससे) पहलू बचाने की कोशिश करोगे तो (याद रखो कि) जो कुछ तुम करते हो अल्लाह उससे ख़ूब वाक़िफ़ है। [सूरह निसा 4:135]
सामाजिक जीवन में बार बार ऐसा होता है कि इंसान के सामने ऐसे मामले आते है जिसमें एक रास्ता अपने फायदे और ख़्वाहिश का होता है और दूसरा हक और इंसाफ का। जो लोग अल्लाह की तरफ से घाफिल होते है, जिन्हें यकीन नहीं होता कि अल्लाह हर वक़्त उन्हें देख रहा है वे ऐसे मौको पर अपनी खवाहिश के रुख पर चल पड़ते है। वे इसे कामयाबी समझते है कि हक़ की परवाह ना करें और मामले को अपने फायदे और अपनी मर्ज़ी के मुताबिक तय करें। मगर जो अल्लाह से डरते है, जो अल्लाह को अपना निगरान बनायें हुए है, वे तमामतर इंसाफ के पहलू को देखते है और वही करते है जो हक़ और इंसाफ का तक़ाज़ा है। उनकी कोशिश हमेशा यही होती है कि उन्हें मौत आयें तो इस हाल में आए कि उन्होने किसी के साथ बेनसाफ़ी न की हो, वो अपने आप को मुकम्मल तौर पर न्याय पर कायम किए हो। उनकी इनसाफ़पसंदी का यह जज़्बा इतना बढ़ा हुआ होता है कि उनके लिए नामुमकिन हो जाता है कि वो इंसाफ से हटा हुआ कोई रवैया देखें और उसे बर्दाश्त कर लें। जब भी ऐसा कोई मामला सामने आता है कि एक शख़्स दूसरे शख़्स के साथ नाइंसाफी कर रहा हो तो वो ऐसे मौके पर हक़ का ऐलान करने से पीछे नहीं हटते। अगर इंसाफ का ऐलान करने मे उनके करीबी रिशतेदारों के खिलाफ़ गवाही जाती हो या उनकी अपनी मसलिहतें प्रभावित होती हो तब भी वे वहीं करते है जो इंसाफ के लेहाज़ से उन्हें करना चाहिए। उनकी ज़बान खुलती है तो अल्लाह के लिए खुलती है न कि किसी और चीज़ के लिए। इसी तरह ये बात भी गलत है कि सामने वाला ताकतवर हो तो उसे उसका हक़ दे दिया जायें और अगर वो कमजोर हो तो उसका हक़ उसे ना दिया जाये। मोमिन वह है जो हर आदमी के साथ इंसाफ करें चाहे वह ताकतवर हो या कमज़ोर।
यहाँ एक अहम बात समझने की ये है कि जब कोई आदमी नाइंसाफी का साथ दे रहा होता है तो वह यह कहकर ऐसा नहीं करता कि में नाइंसाफ़ी करने वालों का साथी हूँ बल्कि वह अपनी नाइंसाफी को इंसाफ का रंग देने की कोशिश करता है। ऐसे मौके पर हर आदमी दो में से एक तरीके इख्तियार करता है। या तो वह ये करता है कि बात को बदल देता है और मामले को ऐसे अलफाज में बयान करता है जिससे ज़ाहिर हो कि यह नाइंसाफी का मामला नहीं बल्कि पूरे इंसाफ का मामला है और जिसके साथ ज्यादती की जा रही है वो इसी का मुस्तहिक है और उसके साथ ऐसा ही होना चाहिए। दूसरी सूरत यह है कि आदमी खामोशी इख्तियार कर लें। यह जानते हुए कि यहाँ नाइंसाफी की जा रही है वह मुंह चुराकर कर निकाल जाये और जो कहने की बात है उसे ज़बान पर न लाये । इस क़िस्म का अमल साबित करता है कि आदमी अपने ऊपर अल्लाह को निगरान नहीं समझता।
इंसाफ के इसी तकाज़े को "सूरह अल माइदाह" में इज्तिमाई (सामूहिक) ज़िंदगी के बारे में बयान किया है। आमतौर पर ये होता है कि हम इनफ़िरदी (निजी) मामलों में तो इसे कुबूल कर लेते है लेकिन जब दूसरी क़ौमों का मामला हो तो कई लोग ऐसा समझते है कि अपनी क़ौम के फायदे के लिए झूठ बोल दिया जाये और सच्चाई को छुपा दिया जाये। ये दोहरापन दुनिया में आपको बहुत जगह देखने को मिलेगा। कुरआन मजीद ने पूरी शिद्दत के साथ इस रवैये का रद्द किया है । चुनांचे इरशाद है:
ईमान वालो,(इस प्रतिज्ञा और वादे का तक़ाज़ा है कि ) अल्लाह के लिए खड़े हो जाओ, इन्साफ़ की गवाही देते हुए और किसी क़ौम की दुश्मनी भी तुम्हें इसपर ना उभारे कि इन्साफ़ से फिर जाओ। इन्साफ़ करो, ये तक़्वा से ज़्यादा क़रीब है और अल्लाह से डरते रहो। बेशक, अल्लाह तुम्हारे हर अमल से बा-ख़बर है। [सूरह माइदाह 5:8]
इंसाफ का मतलब यह है कि किसी शख़्स के साथ कमी बेशी किए बगैर वह सुलूक करना जिसका वह हकदार है। मामलात में हक़ को अपनाना है न कि ख्वाहिशात को। मतलब ये है कि हममें से हर शख़्स ना सिर्फ ये कि हक़ और इन्साफ़ पर क़ायम रहे, बल्कि अगर कभी गवाही देना भी पड़ जाये तो जान की बाज़ी लगाकर ये मांग भी पूरी करना है। हक़ कहें, इन्साफ़ करें, इन्साफ़ की गवाही दें और अपने अक़ीदा और अमल में हक़ और इन्साफ़ के सिवा कभी कोई चीज़ इख़तियार ना करें। यहां तक कि किसी क़ौम की दुश्मनी भी हमें आमादा ना करें कि हम हक़ और इन्साफ़ की राह से हट जाये। काई बार ऐसा होता है कि शिकायतें और तल्ख यादें हम पर असरन्दाज हो जाती है और हमें इंसाफ से हटने पर आमादा करती है लेकिन कुरआन मजीद ने हमें ये तालीम दी है कि दुश्मनों और बातिलपरसतों से मामला करते वक़्त भी हमें अपने आप को इंसाफ से बाँधें रखना है। यही दीन का तक़ाज़ा है। यानि अगर ये तक़ाज़ा पूरा नहीं हुआ तो ईमान का हक़ अदा नहीं हुआ और इसके लिए हमें जवाबदेह होना है।
.
कुरआन का पैग़ाम
पार्ट-21
इंसानी जान की अहमियत
ख़ुदा की शरीयत में तीन ऐसे जुर्म है जिसे करने वाले को हमेशा की जहन्नम की चेतावनी है। पहला है शिर्क, दूसरा है किसी मासूम इंसान का क़त्ल करना और तीसरा है बदकारी। इस बात को अल्लाह तआला ने सूरह फ़ुरकान में बयान किया है। इरशाद है:
और (वो हैं) जो अल्लाह के साथ किसी दूसरे माबूद को नहीं पुकारते, अल्लाह की हराम की हुई किसी जान को नाहक़ क़तल नहीं करते और ना ज़िना के मुर्तक़िब होते हैं। ये गुनाह जो शख़्स भी करेगा, उनका नतीजा भुगतेगा। क़ियामत के दिन उसका अज़ाब बढ़ता ही जाएगा और वो उसमें ज़लील होकर हमेशा रहेगा। [सूरह अल फ़ुरकान 25:69]
इंसान की जान, माल, इज्ज़त और आबरू सबको सम्मान हासिल है। जो शख़्स भी किसी मासूम इनसान का क़त्ल करेगा वो हमेशा की जहन्नम का मुस्तहिक होगा। किसी मासूम इंसान की जान लेना कोई मामूली जुर्म नहीं है। “जीवन” इंसान के लिए सबसे बड़ी नेमत होती है और जब कोई शख़्स किसी मासूम इंसान को क़त्ल करता है तो वो गोया उसे सबसे बड़ी नेमत से महरूम करता है जो बड़ी हिमाकत का काम है। इंसान की जान की क़ीमत को अल्लाह तआला ने एक दूसरे मक़ाम पर और वज़ाहत के साथ बयान किया है। इरशाद है:
(इन्सान की) यही (सरकशी) है जिसकी वजह से हमने (मूसा को शरीयत दी तो उसमें) बनी-इसराईल पर भी फ़र्ज़ कर दिया कि जिसने किसी एक इन्सान को क़तल क्या, उसके बग़ैर कि उसने किसी को क़तल किया हो या ज़मीन में कोई फ़साद बरपा किया हो तो उसने गोया तमाम इन्सानों को क़तल कर दिया और जिसने किसी एक इन्सान को ज़िंदगी बख़शी, उसने गोया तमाम इन्सानों को ज़िंदगी बख़श दी। (फिर यही नहीं, उसके साथ) ये भी हक़ीक़त है कि (उन पर इतमाम-ए-हुज्जत के लिए) हमारे पैग़ंबर उनके पास निहायत वाज़िह निशानीयां लेकर आए, लेकिन इसके बावजूद उनमें से बहुत से हैं जो ज़मीन में ज़्यादतियां करने वाले हैं।
[सूरह अल माइदाह 5:32]
ऊपर बयान की गयी आयत में अललह तआला ने जिस शान के साथ इंसानी जान की अहमियत को बयान किया है उससे बेहतर बयान करना मुमकिन ही नहीं। आयत में अलफाज “नफ़्स” इस्तेमाल हुआ है जो तमाम इंसानों के लिए बोला जाता है चाहे वो किसी भी धर्म, जाती, रंग, नस्ल या संप्रदाय का हो। जब भी कोई शख़्स किसी शख्स को क़त्ल करता है चाहे वो किसी भी पंथ का हो तो वो सिर्फ एक इंसान का क़ातिल नहीं होता बल्कि वो तमाम इंसानों और पूरी इंसानियत का क़ातिल होता है। ऐसा इसलिए क्योंकि किसी को नाहक़ क़त्ल करने से वो उस क़ानून को तोड़ता जिससे तमाम इंसानों की ज़िंदगियाँ बंधी हुई है। अगर आयत मुबारक में सिर्फ इतना ही बयान होता तो वो भी जान की अहमियत बताने के लिए काफी था लेकिन अल्लाह तआला की शान देखिये कि उसने इससे आगे ये भी फरमाया कि जिस किसी शख़्स ने किसी एक इंसान की जान बचाई तो गोया कि उसने पूरी इंसानियत को बचा लिया। इसलिए जब कोई शख़्स किसी को ज़ालिम के ज़ुल्म से नजात देता है तो वो सिर्फ एक शख़्स को नजात देने वाला नहीं होता बल्कि बल्कि तमाम इंसानों को नजात देने वाला होता है। ऐसा इसलिए क्योंकि ऐसा करके वो उस उसूल की हिफाज़त करता है जिसके अनुसार तमाम इन्सानों की जान सम्माननीय है। मालूम हुआ कि कोई शख़्स अगर किसी दूसरे शख़्स को ख़तरे में देखे तो उसको पराया झगड़ा समझ कर नज़रअंदाज करना उसके लिए बिलकुल जायज़ नहीं है, बल्कि उसकी हिफ़ाज़त और हिमायत करना उसके लिए ज़रूरी है, चाहे उसके लिए उसे ख़ुद जोख़िम बर्दाश्त करना पड़े। ऐसा इसलिए कि जो शख़्स किसी मज़लूम की मदद करता है तो वो सिर्फ़ मज़लूम ही की हिमायत नहीं कर रहा होता, बल्कि तमाम इंसानियत की हिमायत कर रहा होता है जिसमें वो ख़ुद भी शामिल है।
इसी के साथ इस आयत में ये भी बता दिया गया है कि किन मामलों में किसी शख़्स को हुकूमत “सज़ा ए मौत” दे सकती है। ऐसे सिर्फ दो ही जुर्म है, पहला ये कि उस शख़्स ने ख़ुद किसी का क़त्ल किया हो और दूसरा ये कि वो “फ़साद फिल अर्ज़” का मुर्तकिब हो (यानि ज़मीन में फसाद फैला रहा हो)। ये वो जुर्म है जिसके अलावा किसी भी जुर्म के लिए मौत की सज़ा नहीं दी जा सकती। याद रहे की ये सज़ा किसी व्यक्ति को नाफ़िज़ (लागू) करने का अधिकार बिलकुल नहीं है बल्कि ये काम हुकूमत का है। सिर्फ हुकूमत या अदालत ही ये सज़ा नाफ़िज़ कर सकती है वो भी तब जब जुर्म आख़री दर्जे में साबित हो जाये।
क़ातिल की सज़ा क़त्ल इसलिए है क्योंकि जब कोई शख़्स किसी दूसरे शख़्स को जानबूझकर क़त्ल करता है तो वो अपनी जान को हासिल सम्मान खो बैठता है। और हुकूमत पर ये लाज़िम होता है कि वो उसका क़िसास (बदला) ले। दूसरा जुर्म जिसके लिए क़त्ल की सज़ा बयान की गयी है वो है “फ़साद फिल अर्ज़”। “फ़साद फिल अर्ज़” का मतलब होता है ज़मीन में फ़साद फैलाना, इसको अँग्रेजी में “anarchy” या "disorder" और हिन्दी में “अराजकता” कहते है। “फ़साद फिल अर्ज़” का मतलब होता है कि जब कोई शख़्स या गिरोह क़ानून से बग़ावत करके लोगों की जान, माल, इज्ज़त, आबरू के ख़िलाफ़ उठ खड़ा हो। जब क़तल आतंकवाद बन जाये, व्यभिचार बलात्कार बन जाये और चोरी डाका बन जाये या लोग बदकारी को पेशा बना लें या फिर देश के ख़िलाफ़ बग़ावत के लिए उठ खड़े हो इत्यादि तो ये सभी जुर्म “फ़साद फिल अर्ज़” कहलाते है। ऐसे मुजरिमों को सिर्फ़ क़तल ही नहीं, बल्कि इबरतनाक तरीक़े से क़तल करने का हुक्म है। ध्यान रहे कि ये सज़ा इंतिहाई है यानि ये सज़ा तब ही दी जा सकती है जब ऐसा करने वाला अपने हालात और परिस्थितियों के लेहाज़ से किसी भी रियायत का पात्र न हो। वो रियायत का पात्र है या नहीं इसका फैसला ज़ाहिर है अदालत ही करेगी। ये मैंने सैद्धांतिक तौर पर कुछ बातें रखी है, इसकी और भी ज़रूरी व्याख्या है जिसे यहाँ बयान करना फिलहाल मक़सद नहीं।
कुरआन का पैग़ाम
पार्ट-22
जिहाद की हक़ीक़त
जिहाद का मतलब होता है "कोशिश करना" यानि किसी जद्दोजहद में अपनी पूरी ताक़त लगा देना। कुरआन मजीद में "जिहाद" का लफ़्ज़ अल्लाह की राह में की गयी आम कोशिश के लिए भी आया है और जंग के लिए भी इस्तेमाल हुआ है। वैसे अल्लाह की राह में "जंग" के लिए आमतौर पर कुरआन में "किताल" का लफ़्ज़ इस्तेमाल हुआ है। अल्लाह तआला ने "कुरआन के पैग़ाम" को आम करने के लिए की गयी कोशिश को "जिहादन कबीरा" क़रार दिया है यानि बहुत बड़ा जिहाद।
इरशाद है:
अतः इनकार करनेवालों की बात न मानना और इस (क़ुरआन) के द्वारा उनसे जिहाद करो, बड़ा जिहाद! (जी तोड़ कोशिश)।
[सूरह फ़ुरकान 25:52]
हमारा मक़सद यहाँ जिहाद के जंग वाले पहलू को स्पष्ट करना है। इसकी दो सूरतें क़ुरआन मजीद में बयान हुई हैं:
1. एक कुफ़्र के ख़िलाफ़ जंग
2. दूसरे ज़ुल्म और ज़्यादती के ख़िलाफ़ जंग।
पहली सूरत का ताल्लुक़ शरीयत से नहीं है बल्कि अल्लाह तआला के एक ख़ास क़ानून से है जिसे क़ानून "इतमाम-ए-हुज्जत" कहते है। ये जिहाद इस दुनिया में हमेशा उसके "रसूलों" के ज़रिये से लागू होता रहा है। यानि जब कोई रसूल किसी क़ौम की तरफ भेजा जाता है तो उस क़ौम के भविष्य का फैसला अल्लाह तआला इसी दुनिया में कर देते है। जो लोग रसूल पर ईमान लाते है उन्हें इस दुनिया के जीवन में हुकूमत दे दी जाती है और जो लोग रसूल का इनकार करते है उन्हें इस दुनिया से मिटा दिया जाता है। क़ौम ए नूह, क़ौम ए आद, क़ौम ए समूद, क़ौम ए लूत इत्यादि पर जो आज़ाब नाज़िल हुआ वो इसी क़ानून के मुताबिक था। इन्सानी इतिहास में इस क़ानून का ज़हूर (implementation) आख़िरी मर्तबा हज़रत मुहम्मद (स) की क़ौम के साथ पेश आया क्योंकि हज़रत मुहम्मद (स) आख़री रसूल थे।
इस क़ानून के तहत आपने कुफ़्र के ख़िलाफ़ जो जंगें लड़ी हैं, वो महिज़ जंगें ना थीं, बल्कि ख़ुदा का अज़ाब था जो ख़ुदा के इस क़ानून के मुताबिक़ था। । और ये आज़ाब अरब के मुशरिकीन और यहूद और नसारा पर नाज़िल किया गया। इसके साथ ही आप पर नबुव्वत ख़त्म कर दी गई है। इसलिए लोगों के ख़िलाफ़ महिज़ उनके कुफ़्र (इस्लाम से इन्कार) की वजह से जंग करना और उनका क़तल करना हमेशा के लिए ख़त्म हो गया है। क़ियामत तक कोई भी शख़्स अब दुनिया की किसी क़ौम पर या किसी शख़्स पर इस मक़सद से हमला बिलकुल नहीं कर सकता। इरशाद है:
प्रत्येक समुदाय के लिए एक रसूल है। फिर जब उनके पास उनका रसूल आ जाता है तो उनके बीच न्यायपूर्वक फ़ैसला कर दिया जाता है। उनपर कुछ भी अत्याचार नहीं किया जाता। [सूरह युनूस 10:47]
हम कभी सज़ा नहीं देते, जब तक एक रसूल ना भेज दें।
[सूरह अल इसरा 17:15]
कुरआन मजीद में "सूरह तौबाह" और दूसरे सूरतों की दीगर आयतें इसी आज़ाब और सज़ा से संबंधित है। लोग गलती ये करते है की इस सूरत में बयान हुए ख़ुदा के आज़ाब/सज़ा को आम जंग का हुक्म समझ बैठते है और ये आक्षेप करते है की कुरआन मजीद ने सभी "ग़ैर मुस्लिमों" को मारने का हुक्म दिया है। हरगिज़ नहीं! कुरआन मजीद ने साफ साफ इसका ऐलान किया है कि ये कोई आम (general) हुक्म नहीं बल्कि रसूल की क़ौम के साथ ख़ास (specific) हुक्म है। अमल (Application) के लेहाज़ से आज के दौर से इसका कोई संबंध नहीं है। ये बात बहुत अच्छी तरह समझ ले।
ये आज़ाब है इसे कुरआन में ख़ुद बयान किया गया है। इरशाद है:
उनसे लड़ो, अल्लाह तुम्हारे हाथों से उन को सज़ा (आज़ाब) देगा और उन्हें ज़लील और ख़ार करेगा और तुम्हें उन पर ग़लबा अता फ़रमाएगा।
[सूरह तौबाह 9:14]
दूसरी सूरत, यक़ीनन इस्लामी शरीयत का हुक्म है। मुस्लमान केवल "ज़ुल्म और ज़्यादती" के खिलाफ ही जंग कर सकता है। इस्लामी शरीयत में जिहाद ईसी मक़सद से किया जाता है। ये मन की इच्छा के लिए, माल-दौलत के लिए, ज़मीन की हुकूमत के लिए, नाम और शौहरत के लिए हरगिज़ नहीं किया जा सकता। जिहाद के लिए कुरआन में जो क़ानून बयान हुआ है वो संक्षेप में इस तरह है:
1. जिहाद और क़िताल का हुक्म मुस्लमानों की हुकूमत (government) को दिया गया है न की किसी व्यक्ति या गिरोह को। इसकी जो आयतें भी क़ुरआन में आई हैं उनका मुखातिब मुस्लिम हुकूमत है ना कि कोई शख़्स या गिरोह। कोई व्यक्ति या गिरोह हरगिज़ ये हक़ नहीं रखता कि अपनी तरफ़ से इस तरह के किसी इक़दाम का फ़ैसला करे।
2. क़ुरआन में इसका हुक्म "फ़ितने" के खात्मे के लिए आया है। "फ़ितने" का मतलब किसी शख़्स को ज़ुल्म और ज़बरदस्ती के साथ उसके मज़हब से फेरने की कोशिश करना है। यही चीज़ है जिसे अंग्रेज़ी ज़बान में persecution कहा जाता है। जिस जगह भी इस मामले कि कोई ज़बरदस्ती हो रही हो चाहे वो किसी भी मज़हब के मानने वाले के साथ हो रही हो, एक मुस्लिम हुकूमत का फर्ज़ है कि इस ज़बरदस्ती को ख़त्म करने की कोशिश करे। और लोगों को आज़ाद मर्ज़ी से अपने-अपने धर्म पर चलने की सहूलत दे।
3. जिहाद मुस्लमानों पर उस वक़्त तक फ़र्ज़ नहीं होता, जब तक दुश्मन के मुक़ाबले में उनकी जंगी कुव्वत एक ख़ास हद तक ना पहुंच जाये।
4. जिहाद में हिस्सा ना लेना सिर्फ इस सूरत में जुर्म होता है, जब कोई मुस्लमान हुकूमत के ऐलान के बावजूद भी व्यक्ति घर में बैठा रहे।
5. जिहाद नैतिक हदों से बेपरवाह होकर नहीं किया जा सकता। नैतिकता हर हाल में और हर चीज़ से आगे हैं और जंग के मौक़ा पर भी अल्लाह तआला ने उसकी खिलाफवरज़ी की इजाज़त किसी शख़्स को नहीं दी। इसके संबंध में सबसे अहम हिदायत जो क़ुरआन में बयान हुई है, वो "वचन" की पाबंदी है। कोई ऐसी क़ौम जिससे मुस्लिम हुकूमत ने संधि की हो अगर वो मुस्लमानों पर ज़ुलम भी कर रही हो तो भी संधि के खिलाफ कोई काम नहीं किया जा सकता। ईसी तरह जो लोग जंग के लिए ना निकलें उनके ख़िलाफ़ भी हमले की इजाज़त नहीं है। जंग सिर्फ़ लड़ाको (combatants) के ख़िलाफ़ ही की जा सकती है। आम शहरियों पर तलवार हरगिज़ नहीं उठाई जा सकती।
ज़ाहिर है ये विषय बहुत बड़ा है लेहाज़ा उसे पूरा बयान कर पाना यहाँ मुमकिन नहीं। इसलिए मैंने सिर्फ संक्षेप में सिद्धांत बयान कर दिये है ताकि "जिहाद" का सही मतलब लोगों पर स्पष्ट हो जाये और कुरआन मजीद को पढ़ते वक़्त जिहाद की दोनों सूरतों का फ़र्क लोगों पर स्पष्ट रहे और कोई कन्फ़्युशन न हो। और ये साफ रहें कि कौनसी आयतें आज़ाब/सज़ा से संबंधित है और कौनसी आयतें जिहाद के आम हुक्म (general rules) से संबंधीत है। जो लोग जिहाद के नाम पर "मासूमों" की निर्मम हत्या कर रहे है वो जिहाद नहीं बल्कि "आतंकवाद" फैला रहे है। और किसी एक मासूम इंसान का कत्ल (चाहे वो किसी भी धर्म, पंथ, संप्रदाय या नस्ल का हो) इंसान को हमेशा की जहन्नम का पात्र बना देता है।
शुक्रिया !
कुरआन का पैग़ाम
पार्ट-23
ग़ैर मुस्लिम भाई और हम
सबसे पहली बात तो ये समझ लीजिये की कोई शख़्स मुसलमान और ग़ैर मुस्लिम बाद में होता है, अव्वल तो वो एक इंसान है। कुरआन मजीद ने हमें बताया है कि हम सब एक आदम और हव्वा की औलाद है। और इस लेहाज़ से हम आपस में इंसानियत के रिश्ते से बहन-भाई है। हमारी ये हैसियत किसी हाल में भी ख़त्म नहीं होती। इसलिए जो इंसानी रिश्ते है, इंसानी अधिकार है वो हर हाल में कायम रहेंगे। और इसी इंसानियत के लेहाज़ से जो ज़िम्मेदारियाँ हम पर आती है वो भी हर हाल में क़ायम रहेगी। अगर एक शख्स हमारा पड़ोसी है तो चाहे वो किसी भी मज़हब का मानने वाला हो, हमें उसके अधिकार हर हाल में अदा करना है। भलाई के काम में हमें एक दूसरे का सहयोग करना है। एक दूसरे को खुशी के मौक़ो पर मुबारकबाद देना है। किसी ग़रीब, मिसकीन, यात्री, बीमार की मदद करते वक़्त उसका मज़हब नहीं देखना है। ये वो इंसानियत का ताल्लुक है जो हर हाल में बरकरार रहना चाहिए।
कुरआन मजीद ने जगह जगह इन बातों की नसीहत की है।
और नेकी और तक़्वा के कामों में तुम एक दूसरे का सहयोग करो, मगर गुनाह और ज़्यादती के काम में किसी का सहयोग ना करो और अल्लाह से डरते रहो। [सूरह माइदाह 5:2]
ऐ लोगो! हमनें तुम्हें एक पुरुष और एक स्त्री से पैदा किया और तुम्हें बिरादरियों और क़बिलों का रूप दिया, ताकि तुम एक-दूसरे को पहचानो। वास्तव में अल्लाह के यहाँ तुममें सबसे अधिक प्रतिष्ठित वह है, जो तुममे सबसे अधिक परहेज़गार है और ख़ुदा का डर रखता है। निश्चय ही अल्लाह सबकुछ जाननेवाला, ख़बर रखनेवाला है।
[सूरह हुजूरत 49:13]
इसके बाद एक अगली चीज़ ये है कि हमतक अल्लाह तआला का एक पैगाम पहुंचा है और हमने उस पैग़ाम को कुबूल किया और उसको कुबूल करने के बाद हम पर ये बात वाज़ेह हुई कि इस पैग़ाम को मानने और इन्कार करने से लोगों की हमेशा की ज़िंदगी का दारोमदार है। यानि ये हक़ीक़त हमें पैग़ंबरों के ज़रिये से बताई गयी है कि तुम इस दुनिया में आरज़ी (temporary) तौर पर भेजे गए हो और तुम्हें एक दिन अपने परवरदिगार के सामने जवाबदेह होना है और वहाँ से एक नयी ज़िंदगी शुरू होगी। ये एक गैर मामूली ख़बर है। हम इसके संबंध में अपने ग़ैर मुस्लिम भाइयो को आगाह करेंगे। इसी को अरबी ज़बान में “इंजार” कहते है।
यानि इस बात से लोगों को खबरदार किया जाये कि एक बड़ा हादसा पेश आने वाला है और उनसे कहा जाये कि आप भी इस हादसे के लिए तैयारी कीजिये। इस दुनिया ही में अगर आप देखें तो जब कोई शख़्स किसी हादसे के पहले ख़बर कर देता है तो हम उसके शुक्रगुज़ार हो जाते है। ठीक ऐसी ही हम उस हादसे से ख़बरदार करते है, जब हममें से हर शख्स को अपने परवरदिगार के सामने जवाबदेही के लिए उठाया जाएगा। और उसके नतीजे में हमेशा की जन्नत या हमेशा की जहन्नम का फैसला किया जाएगा। इस अज़ीम हादसे से हम अपने भाइयो को खबरदार करना चाहते है। इस लेहाज़ से हमारे और उनके बीच एक ताल्लुक और पैदा होता है वो है एक "उपदेशक (दाई)" और "जिसे उपदेश दिया जाये (मदउ)" का ताल्लुक। ये ताल्लुक अपनी असल के लेहाज़ से हमसे ये तक़ाज़ा करता है कि हम ख़ैरख़ाह बनकर उठे।और खेरखाही का जज़्बा ये मांग करता है कि हमें उनसे मुहब्बत हो। अगर हम दुश्मनी के ताल्लुक को बुनियाद बनाकर उठेंगे तो हम ये ताल्लुक कभी पैदा नहीं कर सकते। इसलिए इस बात को अच्छी तरह समझ लेना चाहिए कि हमें दुनिया में हर गैर मुस्लिम भाई को चाहे वो जहां भी रेहता हो ख़ुदा का ये पैग़ाम इज्ज़त और एहतेराम के साथ पहुंचाना है। दुनिया में मतभेद होते है लेकिन इन मतभेदों को हमें गंवारा करना है और शालीनता और विनम्रता का दामन नहीं कभी नहीं छोड़ना।
इसी विषय के संबंध में कुरआन मजीद ने एक बहुत अहम हिदायत दी है जिसे बदक़िसमति से हमारे कुछ भाई भूलते है और नैतिक हदें लाँग जाते है। उन्हें लगता है कि वो ख़ुदा के दीन कि कोई ख़िदमत कर रहे है लेकिन असल में वो ख़ुदा के दिये हुए निर्देशों का उल्लंघन कर रहे होते है। वो बात है किसी दूसरे धर्म के देवी- देवताओं को अपशब्द कहना। कुरआन ने ऐसा ना करने की नसीहत की है। इरशाद है:
अल्लाह के सिवा जिन्हें ये पुकारते है, तुम उनके प्रति अपशब्द का प्रयोग न करो। [सूरह अनआम 6:108]
एक उपदेशक को इस उसूल का हमेशा ख़्याल रखना चाहिए। क्योंकि असल मक़सद इंसान को ख़ुदा से जोड़ना है न कि किसी न किसी तरह से लोगों को अपने गिरोह में शामिल करना। उत्तेजित होकर बदकलामी करना जाहिलाना तरीका है। इसके उलट अगर कोई भाई आपसे द्वेष (बुग्ज़) रखता हो तो आपको उसके बुरे आचरण का जवाब बुराई से नहीं देना है बल्कि अच्छाई से देना है। जी हाँ! इसकी नसीहत भी हमें ख़ुदा की किताब ने ही की है। इरशाद है:
भलाई और बुराई समान नहीं है। तुम (बुरे आचरण की बुराई को) अच्छे से अच्छे आचरण के द्वारा दूर करो। फिर क्या देखोगे कि वही व्यक्ति तुम्हारे और जिसके बीच बैर पड़ा हुआ था, जैसे वह कोई घनिष्ठ मित्र है।
[सूरह फुस्सिलत 41:34]
शुक्रिया!
To be continue....
पार्ट-13
उम्मत ए वसत (The Middle Nation)
अल्लाह तआला ने इन्सानों की हिदायत के लिए और उनपर अपनी हुज्जत पूरी करने के लिए जिस तरह इन्सानों में से नबियों को नियुक्त किया ठीक उसी तरह नुबुव्वत के दूसरे दौर में सय्यदना इब्राहीम की नस्ल को नियुक्त किया गया। यानि सय्यदना इब्राहीम की औलाद को इस मक़ाम पर फ़ाइज़ किया की वो तौहीद का मरकज़ दुनिया के केंद्र में बनाए और क़ौमी हैसीयत से ख़ुदा का पैगाम लोगों तक पहुंचाए, ये एक गैर मामूली फैसला था। चुनांचे कुरआन मजीद को जब आप पढ़ेंगे तो वो जगह-जगह ये ऐलान करेगा कि ए बनी इसराईल हमने अपने इल्म के मुताबिक दुनिया वालों के ऊपर तुम्हें फ़ज़ीलत (प्रधानता) देकर तुम्हारा इंतखाब (चयन) किया था । पूरी क़ौम को इस मंसब पर फ़ाइज़ कर दिया कि वो खुदा के दीन की गवाही दे और खुदा के दीन के साक्षी बनें।
इसी मक़सद के लिए फिलिस्तीन में "बैतउल मकदिस" को तौहीद के मरकज़ के तौर पर तामीर किया गया और इसी मक़सद के लिए सय्यदना इब्राहीम (स) ने जज़ीरा ए अरब में "बैतुल्लाह" की बुनियाद रखी। ये एक गैर मामूली फैसला था और कयामत तक के लिए ये ज़िम्मेदारी हज़रत इब्राहीम की नस्ल पर डाली गयी।
इसका पहला मरहला (चरण) वही था जिसमें बनी इसराईल ने ये ख़िदमत अंजाम दी कम से कम 2000 साल तक, उनके ज़िम्मे खुदा के पैगाम को पहुँचाने के लिए एक विशेष कानून तौरत में भी बयान हुआ और कुरआन मजीद में भी उसे दोहराया गया। वो कानून ये था की अगर औलाद ए इब्राहीम अपनी जिम्मेदारी को अदा करेगी तो उन्हें दुनिया की सब क़ौमों पर सरफ़रज़ी हासिल होगी, और अगर ये उस ज़िम्मेदारी में कौताही करेगी तो खुदा के अज़ाब से इसी दुनिया में दो-चार हो जाएगी। यानि दुनिया की वही क़ौमें जिसपर उन्हें सरफ़राज़ी हासिल होनी थी वो ही इसपर चड़ दौड़ेगी और उसे गाजर मूली की तरह काटना शुरू कर देगी, उसके ऊपर आजाब बनकर टूट पड़ेंगी। इस कानून को तौरत ने बड़ी वज़ाहत के साथ बयान किया है। कुरआन मजीद की शुरुवाती सूरतों को भी देखा जाये तो उनमें भी इसी हक़ीक़त की याददिहानी कराई गयी हैं, और बनी इसराईल को ये बताया गया है कि वो अपनी इस ज़िम्मेदारी को पूरा करें।
ये ज़िम्मेदारी दूसरे मरहले (चरण) में बनी इसमाईल को दी गयी। बनी इसमाईल में हज़रत मुहम्मद (स0) की बेसत हुई और आपने उनपर रसूल की हैसियत से इतमाम ए हुज्जत की फिर खुदा का कानून लागू हुआ और जिन लोगों ने ईमान कुबूल किया उन्हें सरफराज़ी दी गयी (यानि गौरवपूर्ण स्थान मिला), और जिनहोनें इनकार किया उनपर खुदा के अज़ाब का फैसला सादिर हुआ। ये उम्मत यानि बनी इसमाईल में से जो उम्मत उठाई गयी है उसकी ज़िम्मेदारी शहादत-ए-हक़ (सच के साक्षी होने) की ज़िम्मेदारी है। उन्हें ये बताया गया है कि खुदा के रसूल ने तुम पर हुज्जत पूरी कर दी है और तुम्हें अब बाकी इन्सानों तक ये पैग़ाम पहुंचाना हैं। इनको इसी लेहाज़ से "उम्मत ए वसत" कहा गया, यानि एक तरफ खुदा का रसूल है और दूसरी तरफ पूरी दुनिया के लोग हैं और ये दरमियान में खड़े है। इनको खुदा के पैगंबर से पैगाम लेना है और पूरी इंसानियत तक पहुंचाना है। ये एहतेमाम अल्लाह तआला ने पूरी इंसानियत तक दीन का पैगाम पहुंचाने के लिए किया है। यानि पहले चरण में ये ज़िम्मेदारी बनी इसराईल को दी गयी और दूसरे चरण में ये ज़िम्मेदारी बनी इसमाईल को दी गयी। अब क़यामत तक के लिए दुनिया की सब क़ौमों पर खुदा की हुज्जत पूरी करने और खुदा की दावत (पैग़ाम) उन तक पहुंचाने की ज़िम्मेदारी इन्हीं पर (यानि हम मुसलमानों पर) है।
कुरआन मजीद ने कई जगह इसे बयान फरमाया है। मिसाल के तौर पर:
और (मज़ीद ये कि अपने मन्सब की ज़िम्मेदारीयों को पूरा करने के लिए) अल्लाह की राह में जद्द-ओ-जहद करो, जैसा कि जद्द-ओ-जहद करने का हक़ है। उसने तुम्हें चुन लिया है और (जो) शरीयत (तुम्हें अता फ़रमाई है, उस) में तुम पर कोई तंगी नहीं रखी है। तुम्हारे बाप इबराहीम की मिल्लत तुम्हारे लिए पसंद फ़रमाई है। उसी ने तुम्हारा नाम मुस्लिम रखा था, इससे पहले और इस (क़ुरआन) में भी (तुम्हारा नाम मुस्लिम है)। इसलिए (चुन लिया है) कि रसूल तुम पर (इस दीन की) गवाही दे और दुनिया के सब लोगों पर तुम (उसकी) गवाही देने वाले बनो। सो नमाज़ का एहतिमाम रखों और ज़कात अदा करते रहो और अल्लाह को मज़बूत पकड़ो। वही तुम्हारा मौला है। सो किया ही अच्छा मौला है और क्या ही अच्छा मददगार। [सूरह हज 22:78]
और (जिस तरह मस्जिद हराम को तुम्हारा क़िबला ठहराया है), ईसी तरह हमने तुम्हें भी एक दरमयान की जमात बना दिया है ताकि तुम दुनिया के सब लोगों पर (हक़ की) शहादत देने वाले बनो और अल्लाह का रसूल तुम पर ये शहादत दे। [सूरह बकरा 2:143]
(ईमान वालो, उस वक़्त तो अल्लाह की इनायत से) तुम एक बेहतरीन जमात हो जो लोगों (पर हक़ की शहादत) के लिए बरपा की गई है। तुम भलाई की तलक़ीन करते हो, बुराई से रोकते हो और अल्लाह पर सच्चा ईमान रखते हो। [सूरह अल इमरान 3:110]
खुलासा ये है कि ये मुसलमानों की ज़िम्मेदारी है कि वो खुदा के पैग़ाम पर ख़ुद भी अमल करें और इसे दूसरी क़ौमों तक पहुंचाए। अगर हम ऐसा नहीं करेंगे तो हमें जिस मंसब पर फ़ाइज़ किया गया है उसका हक़ अदा नहीं होगा और हम ख़ुदा के आज़ाब से इसी दुनिया में दो-चार होंगे जैसा की आजकल हो रहे है।
...
कुरआन का पैग़ाम
पार्ट-14
इबादत की रूह
दीन में जिन चीज़ों का बयान आता है उनमें हमारे शरीर की सफ़ाई है, हमारे खाने पीने की पाकीज़गी है,और इसी तरह हमारे अखलाक की पाकीज़गी है। इन तीन चीजों के अलावा एक चौथी चीज़ "इबादत" है।
इबादत दो चीज़ों का मजमुआ है, एक बाहरी ढांचा और दूसरा उसकी रूह। इबादत की रूह का मतलब है कि हमने अपने परवरदिगर को पहचाना,उसकी सच्ची मारिफ़त हासिल की और अपने बातिन से उसके सामने झुक गए। एक दूसरी चीज़ असल में इस रूह को ढांचा देने के लिए है, वो है इबादत के कुछ आदाब यानि etiquette। जैसा की हम नमाज़ में हाथ ऊपर उठाते है, क़ियाम करते है, रुकू करते है, सुजूद करते है इसी तरह हज के मुखतलिफ़ अहकाम है। इबादत में ये चीज़ें अलामती (symbolic) हैसियत रखती है। जिस परवरदिगार के सामने हम अपने बातिन से झुक गए है उसके सामने अपने ज़ाहिर को भी झुका दें।
आमतौर पर ये होता है कि दीन की रूह और इबादत की रूह नजरों से ओझल हो जाती है और इन अलामतों को ही लोग गैर मामूली हैसियत दे बैठते है। ये अलामतें बेशक गैर मामूली अहमियत रखती है लेकिन सिर्फ उसी वक़्त जब असल रूह और असल हक़ीक़त पेश-ए-नज़र रहे और ओझल न हो। मिसाल के तौर पर कुर्बानी के लिए सिर्फ जानवर ज़िबह करना काफी नहीं होगा जबतक आपके अंदर कुर्बानी का जज़्बा न हो, आप अपनी ख़्वाहिशों को रब के सामने सरैंडर न कर दें। असल मे होना ये चाहिए कि वो चीज़ जो दीन हमारे अंदर पैदा करना चाहता है हम उसको समझें और उनको समझकर इन अलामतों के ज़रिये से उस हक़ीक़त का इज़हार करें।
कुरआन मजीद में एक मुकाम पर इसी चीज़ को विषय बनाया है। ये मौका उस वक़्त आया जब नमाज़ के लिए दिशा (क़िबले) की बहस पैदा हुई। वो बहस ये थी कि किस रुख होकर नमाज़ पढ़ी जाये। इसका संदर्भ (background) ये है की जब हज़रत मुहम्मद (स) मक्का से हिजरत करके मदीना तशरीफ ले गए तब मदीने में आप "बैतउल-मक़दिस (यरूशलम)" की तरफ रुख करके नमाज़ पढ़ते थे। फिर अल्लाह तआला ने क़िबले को "बैतउल-मक़दिस" से बदल कर "बैतुल्लाह (मक्का)" की तरफ करने का हुक्म फ़रमाया। ये बात उस वक़्त के यहूद को नागवार गुज़री। और नसारा भी इस मामले में मुसलमानो से इख्तिलाफ़ रखते थे। उन्होनें जब इस मामले में इख्तिलाफ़ किया तो कुरआन मजीद ने इसपर टिप्पणी की। चुनांचे इरशाद है (ग़ौर फरमाए):
(ये समझते हैं कि अल्लाह से वफ़ा का हक़ मज़हब की कुछ रस्में पूरी कर देने से अदा हो जाता है। उन्हें मालूम होना चाहिए कि) अल्लाह के साथ वफ़ादारी सिर्फ ये नहीं कि तुमने (नमाज़ में) अपना रुख मशरिक़ (पूर्व) या मग़रिब (पश्चिम) की तरफ़ कर लिया, बल्कि वफ़ा-दारी तो उनकी वफ़ा-दारी है जो (पूरे दिल से) अल्लाह को मानें और क़ियामत के दिन को मानें और अल्लाह के फ़रिश्तों को मानें और उसकी किताबों को मानें और उसके नबियों को मानें और माल की मुहब्बत के बावजूद उसे क़राबत मंदों, यतीमों, मिस्कीनों, मुसाफ़िरों और मांगने वालों पर और लोगों की गर्दनें छुड़ाने (यानि ग़ुलाम आज़ाद करवाने) में ख़र्च करें, और नमाज़ का एहतिमाम करें और ज़कात अदा करें। और (वफ़ादारी तो उन की वफ़ादारी है कि) जब अह्द (वादा) कर बैठें तो अपने इस अह्द को पूरा करने वाले हों और बिलख़सूस (उनकी) जो तंगी और बीमारी में और जंग के मौक़े पर साबित-क़दम रहने वाले हों। यही हैं जो (अल्लाह के साथ अपने अहद-ए-वफ़ा में) सच्चे हैं और यही हैं जो फ़िलवाक़े परहेज़गार हैं।
[सूरह बकरह 2:177]
अल्लाह के यहाँ जो चीज़ क़ाबिल ए कुबूल है वह सिर्फ किसी क़िस्म की ज़ाहिरी चीज़ नहीं बल्कि वह अमल है (ज़ाहिर+बातिन) जो आदमी अपने पूरे वुजूद के साथ ख़ालिस अल्लाह के लिए करता है। अल्लाह का मक़बूल बंदा वह है जो अल्लाह को इस तरह पा ले कि अल्लाह का हुक्म उसकी ज़िंदगी बन जायें। आदमी अपने रब को इस तरह पा लें कि मुश्किल से मुश्किल वक़्तों में भी उसकी रस्सी उसके हाथों से छूटने न पायें और मौज के समय में भी वह ख़ुदा की याद से से गाफिल न हो। अल्लाह का हक़ उसकी सच्ची वफादारी से अदा होता है न कि महज़ ज़ाहिरी अलामतों को अदा करने से।
.....
कुरआन का पैग़ाम
पार्ट-15
दीन में अति मत करो
दीन में जिन चीजों को बड़ा गुनाह करार दिया गया है उनमें से एक चीज़
"ग़ुलू" यानि "अति" है । कुरआन मजीद ने सूरह निसा और सूरह माइदाह यानि दो मकामात पर अहले किताब को ख़िताब करके ये कहा है कि अपने दीन में अति न करों।
ए अहले-किताब, अपने दीन में ग़ुलू (अति) ना करो और अल्लाह के हक़ में, हक़ के सिवा कोई बात ना कहो। हक़ीक़त ये है कि मसीह ईसा इब्न मरियम अल्लाह के एक रसूल और उसका एक क़ौल ही थे जो उसने मरियम की तरफ़ अलक़ा फ़रमाया था और उसकी जानिब से एक रूह थे (जो अल्लाह ने उसमें फूंक दी थी)। सो अल्लाह और उसके रसूलों पर ईमान लाओ और (अल्लाह को) तीन ना बनाओ। बाज़ आ जाओ, यही तुम्हारे हक़ में बेहतर है। अल्लाह ही तन्हा माबूद है, वो इससे पाक है कि उसके औलाद हो, ज़मीन और आसमानों में जो कुछ है, उसी का है और उन के मुआमलात को देखने के लिए अल्लाह ही काफ़ी है।
[सूरह निसा 4:171]
ग़ुलू को आम बोल चाल में हम "इंतिहापसंदी" भी कहते है। दीन में हर चीज़ की एक जगह और एक मक़ाम मुकर्रर कर दिया गया है, हर चीज़ का एक वज़न मुकर्रर है। अगर एक चीज़ "पाओ" है और एक चीज़ "सेर" है तो हम अपनी तरफ से पाओ को सेर और सेर को पाओ नहीं बना सकते। दीन के मामले में हमे पाबंद कर दिया गया है कि जैसा कि वो है उसे बिलकुल वैसा ही लोगों तक पहुंचाएँ और अपनी तरफ से उसमें कोई इज़ाफ़ा न करें।
इंसान के साथ मामला ये है कि जिस तरह ख़ुदा ने दीन हमको दिया है हम बिलकुल उसी तरह उसको दुनिया तक नहीं पहुंचाते बल्कि इसमें आमतौर पर इंतिहापसंदी (अति) इख्तियार कर ली जाती है।
अल्लाह तआला ने पैगंबर भेजे और बार बार ये तवज्जो दिलाई कि इन पैगंबरों का इंतखाब "इन्सानों" में से किया गया है, उनकी तरफ "वही" (प्रकाशना) की जाती है, वे ख़ुदा के बंदे और उसके रसूल या उसके नबी होते हैं। लेकिन हम जानते है कि उन्हीं पैगंबरों में से कुछ को ख़ुदा का बेटा बना लिया जाता है। अल्लाह तआला ने फरिश्तों के बारे में ये बताया कि वो भी ख़ुदा के बंदे है जो उसका पैग़ाम लेकर आते है और उनको जो भी ज़िम्मेदारी दी जाती है उसे वो ज़रूर पूरी करते है और कभी भी अल्लाह के किसी हुक्म की खिलाफवरजी नहीं करते। लेकिन उन्हीं फरिश्तों को लोगों ने देवी-देवता बनाकर उनकी इबादत करना शुरू कर दी। अरब के मुश्रिकीन ने फ़रिश्तों के बारे में भी ये तसव्वुर कायम किया कि ये ख़ुदा की बेटियाँ है और इस लेहाज से लोग अपनी फरियादें उनके सामने पेश कने लगते है।
कुरआन में सय्यदा मरियम को बहुत ऊंचा मक़ाम दिया गया है, कुरआन मजीद में बार बार ये कहा गया है कि वो सच्ची और ख़ुदा की नेक बंदी थीं। लेकिन कुछ लोगों ने उनको भी इस मक़ाम से उठाकर ख़ुदा की माँ बना दिया और इसी तरह के बेशुमार मामलात है जिनकी मिसाल देकर कुरआन मजीद ये कहता है कि ये इंतिहापसंदी है और ये अल्लाह तआला पर झूठ बांधना है। यानि एक ऐसी बात अल्लाह तआला की तरफ मनसूब की जा रही है जो अल्लाह तआला ने कभी नहीं कही।
दीन के मामले में ये ज़रूरी है कि हम जब उसका कोई हुक्म बयान करें या लोगों तक उसको पहुंचायें तो ये ज़रूर देखें कि उसके क्या हुदूद बयान किए गए है, अल्लाह तआला ने उसको किस तरह पेश किया है, उसको खूब अच्छी तरह समझे और अपनी तरफ से ज़ोर पैदा करने के लिए बात को कहीं से कहीं न पहुंचा दें। ज़रा सी बात को अफसाना न बना दें, बात का बतंगड़ न बना दें, बल्कि हमेशा पूरी ज़ोर के साथ ये बताएं कि ये बात अल्लाह तआला ने फरमाई है और इतनी फरमाई है।
बदकिस्मती से हमारे यहाँ भी यही सूरतेहाल है। दीन में बहुत सी चीज़ें है जिनके बारे में हमको ये बताया गया है कि वो गुनाह है, मिसाल के तौर पर कोई शिर्क करता है, कोई शख्स जानते बूझते अल्लाह के पैगंबर का इनकार कर देता है या दीन के हकाइक़ का इनकार कर देता है तो ये सब बड़े गुनाह है लेकिन इन गुनाहों के बारे में इसके साथ ही हमको ये बात भी बता दी गयी है कि हमारा काम इनपर तवज्जो दिलाना है, लोगों को ये बताना है कि ये गुनाह है, तबलीग़ करना है, दावत देना है, दलील के साथ उनकी गलती वाज़ेह करना है, लोगों के दिलो दिमाग पर दस्तक देकर उनको बताना है कि वो किस गुनाह में लिप्त है और दलाइल के साथ अपनी बात बयान करना है, लेकिन ये हक़ हममें से किसी को भी हासिल नहीं है कि हम इन गुनाहों के करने वालों को "मुशरीक" और "काफिर" करार दें या उनपर फतवे लगाए, या उनके खिलाफ कोई इक़दाम करने की कोशिश करें, इसके हुदूद (सीमाएं) निर्धारित कर दी गई है और ये बताया गया है कि अल्लाह तआला ने अपने दीन के मामले में ज़ोर ज़बरदस्ती नहीं रखी है। चुनांचे ये इलान किया गया है:
(ये जो रवैय्या चाहें, इख़तियार करें), दीन के मुआमले में (अल्लाह की तरफ़ से) कोई ज़बरदस्ती नहीं है। हक़ीक़त ये है कि हिदायत (इस क़ुरआन के बाद अब) गुमराही से बिलकुल अलग हो चुकी है। लिहाज़ा जिसने शैतान का इनकार किया और अल्लाह को माना तो उसने गोया निहायत मज़बूत रस्सी पकड़ ली जो कभी टूट नहीं सकती। और (ये इस लिए कि) अल्लाह समीअ व अलीम है। [सूरह बरकाह 2:256]
अगर अल्लाह चाहता तो ये कभी शिर्क ना कर पाते। हमने उन पर तुम्हें निगरान (दारोगा) मुक़र्रर नहीं किया है और ना तुम उन के ज़ामिन हो। [सूरह अनआम 6:107]
लेहाज़ा हमें अपनी हद में रहकर केवल अच्छे अंदाज़ में, दलाइल के साथ पैग़ाम पहुंचाने का काम करना चाहिए। किसी के कुफ़र और ईमान का फैसला करना या किसी को जन्नत और जहन्नम के सर्टिफिकेट बांटना हमारा काम क़तअई नहीं है।
....
कुरआन का पैग़ाम
पार्ट-16
हुकूमत की ज़िम्मेदारी
अल्लाह का पैग़ाम लोगों तक पहुंचाया जाये इसके लिए एक एहतेमाम (प्रबंध) वो है जिसका ज़िक्र हम पिछले पार्ट्स में कर चुके हैं यानि बनी इसमाईल (मुस्लिम उम्मत) को ये ज़िम्मेदारी दी गयी की वो दुनिया की सब क़ौमों तक खुदा का पैग़ाम पहुंचाए लेकिन खुद बनी इसमाईल के अंदर इसका क्या एहतेमाम (प्रबंध) होगा? और वो लोग जो बनी इसमाईल की दावात कुबूल करके मुसलमान होंगे उनेक लिए क्या एहतेमाम किया जाएगा? इसके लिए एक हिदायत कुरआन मजीद में दी गयी है।
जहा कहीं भी कोई जमीयत होती है (यानि लोगों का समूह होता है) वहाँ लोग एक आपस में संगठित रहने की एक प्रणाली कायम करते हैं, ये कानून पूरी दुनिया में लागू है। यानि जब भी इंसान कहीं जमा होते है तो वो अपने अंदर एक संगठन का निर्माण कर लेते हैं, इसी संगठन को हम रियासत कहते है। प्राचीन जमाने में जब लोग कबीले की सूरत मे इखट्टे हो जाते थे तो एक कबीले के सरदार को चुनते थे, उसी से आगे बढ़कर एक रियासत फिर हुकूमत की संकल्पना पैदा हुई । इस वक़्त हम क़ौमी रियासतों (nation-states) के दौर मे जी रहे हैं। इस तरह की हुकूमत दुनिया के सारे मुसलमानों के लिए भी क़ायम हो सकती है या विभिन्न क़ौमों के लेहाज से अलग-अलग भी कायम हो सकती हैं, जिस तरह कि इस वक़्त कायम है। मुसलमानों को अल्लाह तआला ने ये हिदायत फरमाई है कि जब उनका एक नज़्म क़ायम हो जाये और उनकी एक रियासत वुजूद में आ जाएँ तो उस रियासत की कुछ दीनी जिम्मेदारियाँ भी है। यानि शांति व्यवस्था, सुरक्षा के बंदोबस्त इत्यादि के साथ ही उसे कुछ दीनी फराइज़ (धार्मिक कर्तव्यों) को भी पूरा करना चाहिए। ये कर्तव्य एक मुसलमान की हैसियत से उनके परवरदिगर ने उनपर लाज़िम किए है । उनमें से एक फर्ज़ ये है, कि सरकारी सतह पर मुसलमानों में से कुछ लोगों को इस काम के लिए नियुक्त किया जाये जाना चाहिए कि वो लोगों को भलाई की तलकीन करें और बुराई से रोकने की नसीहत करें। इसे कुरआन में कुछ इस तरह बयान किया गया हैं:
और चाहिए कि तुम्हारे अंदर से कुछ लोग नियुक्त किए जायें जो नेकी की दावत दें, भलाई का सदुपदेश दें और बुराई से रोकते रहें। (तुम ये व्यवस्था करो) और (याद रखो कि जो ये करेंगे) वही क़ामयाबी पाएँगे।
[सूरह अल इमरान 3:104]
इसके कुछ पहलू है जिसको हम पहले बहुत अच्छी तरह समझ लेते हैं। इसमें मुसलमानों की हुकूमत (गवर्नमेंट) की तरफ से कुछ लोगों को नियुक्त करने की हिदायत की गयी है । आज के दौर में इसका ये तरीका कायम किया जा सकता हैं कि जहां कहीं भी मुस्लिम हुकूमत हो वहाँ की "जामा मस्जिदों" का संचालन रियासत के पास होना चाहिए और सप्ताह में एक दिन निश्चित किया जाना चाहिए (जैसे जुमे का दिन)। उस दिन लोग नमाज़ के लिए वहाँ जमा होंगे और उससे पहले खुतबा दिया जाएगा, ताकि दावत इलल-खैर (यानि भलाई की तलकीन) की ज़िम्मेदारी रियासत की सतह पर पूरी की जाये। ये शासकों की ज़िम्मेदारी है कि वो ख़ुद या उनके नुमाइंदे मस्जिद में आयें वो जमात से नमाज़ पढ़ें और खुतबा भी वही दे और इस खुतबे का विषय "दावत इलल खैर" होना चाहिए यानि "भलाई की दावत"। यानि ये बात कि तुम्हें पूरा तौलना है, तुम्हें सच बोलना हैं, ईमानदारी से काम करना हैं, तुम्हें सरकार की संपत्ति को अपनी संपत्ति नहीं समझना बल्कि सभी लोगों की संपत्ति समझनी है, भलाई की बातों के अलावा बुरी बात से रोकें। अगर ये चीज़ इसी तरीके से होती रहेगी तो मुसलमान उम्मत सही रास्ते में कायम रहेगी और कामयाबी पाएगी।
कुरआन का पैग़ाम
पार्ट-17
उलमा और हमारी ज़िम्मेदारी
अल्लाह तआला ने पूरी इंसानियत के तज़किए (शुद्धिकरण) के लिए बहुत से पैग़ंबर भेजे और जनाब मुहम्मदुर रसूलुल्लाह (स) पर नुबुव्वत का सिलसिला ख़त्म हुआ। इसके बाद बनी इसमाईल को ये ज़िम्मेदारी दी गयी की अब वो ये पैग़ाम दुनिया तक पहुंचायें । यहीं असल में “मुसलमान उम्मत” है। हम जब ईमान कुबूल करते हैं तो हम भी इस उम्मत का हिस्सा बन जाते हैं। इसके बाद खुद इनके लिए ये बंदोबस्त किया गया की जब किसी जगह इनकी हुकूमत क़ायम हो जाये तो जुमे के दिन इनके लिए भी तज़कीर और नसीहत का इंतिज़ाम हो और इनको भी ये बताया जाये कि तुम्हें शुद्धि कैसे हासिल करनी है। अब हम देखते है की कुरआन मजीद में उलमा और आम मुसलमानों के बारे में क्या दिशा-निर्देश आयें है।
इरशाद है:
ये तो मुम्किन नहीं था कि मुस्लमान, सब के सब निकल खड़े होते, मगर ऐसा क्यों ना हुआ कि उनके हर गिरोह में से कुछ लोग निकलते ताकि दीन में बसीरत (प्रतिभा) पैदा करते और अपनी क़ौम के लोगों को ख़बरदार करते, जब उनकी तरफ़ लोटते, इसलिए कि वो बचते।
[सूरह तौबाह 9:122]
ये वो इंतेज़ाम है जो अल्लाह तआला ने उन लोगों की इस्लाह और तालीम और तर्बीयत (शिक्षा आर प्रशिक्षण) के लिए तजवीज़ फ़रमाया जो दूर दराज़ के इलाक़ों में रहने की वजह से रसूलअल्लाह (सल्ल-अल्लाहु अलैहि वसल्लम) के जीवन के दौरान भी आपसे सीधे तौर पर लाभान्वित नहीं हो सकते थे। स्पष्ट है कि यही प्रबंध आपके दुनिया से रुख़स्त हो जाने के बाद भी होना चाहिए। चुनांचे इरशाद हुआ है कि सब मुस्लमानों के लिए तो ये मुम्किन नहीं है, लेकिन उनकी हर जमात में से कुछ लोगों को लाज़िमन इस मक़सद के लिए निकलना चाहिए कि वो दीन का इलम हासिल करें और अपनी क़ौम के लिए नज़ीर (आदर्श) बनकर उसे आख़िरत के अज़ाब और ख़ुदा की गिरिफ़त से बचाने की कोशिश करें। ये लगभग वही काम है जो अल्लाह के नबी और रसूल अपनी क़ौम में करते हैं। इससे मालूम हुआ कि नबी (स) से दावत और ख़बरदार करने का ये अज़ीम काम आपके बाद इस उम्मत के उलमा को ट्रांस्फर हुआ है और ख़त्म नबुव्वत के बाद ये ज़िम्मेदारी अब क़ियामत तक उन्हें ही अदा करनी है चाहे मुस्लिम हुकूमत ये काम सरकारी सतह पर करें या ना करें!
जैसा की हा देख चुके है कि हमारे दीन ने हमसे जिस तरह ये तक़ाज़ा किया गया है कि ईमान लाने के बाद हम अच्छा अमल करे उसी तरह ये तक़ाज़ा भी किया गया है की हम सच्चाई का और हक़ का पैगाम दूसरों तक भी पहुंचाते रहें। हमारे दीन का एक उसूल ये है कि इसमें लोगो पर ज़िम्मेदारी उनकी ताकत के हिसाब से डाली जाती है। चुनांचे पूरी दुनिया तक खुदा का पैग़ाम पहुंचाने की ज़िम्मेदारी संगठित और समूहिक रूप से पूरी "मुसलमान उम्मत" पर डाली गयी है न कि किसी एक शख़्स पर। इसी तरह मुस्लिम हुकूमत पर ये ज़िम्मेदारी डाली गयी है की वो पूरी क़ौम को खैर और भलाई की दावत पहुंचाने के लिए मसजिद का संचालन (नज़्म) अपने हाथों में ले और यदि ये व्यवस्था कहीं कमजोर पढ़ रही हो या इसकी तरफ ध्यान दिलाने की ज़रूरत हो तो उलमा का इदारा (विद्वानों की संस्था) कायम करने का निर्देश दिया है यानि कुछ लोग ऐसे हों जो दीन में गहरी नज़र पैदा करें और सच्चाई का पैगाम लोगों तक पहुंचाए और उनको ख़बरदार करें। अब सवाल ये है कि इसके संबंध में आम आदमी पर क्या ज़िम्मेदारी डाली गयी है? यानि मुसलमान उम्मत, हुकूमत और उलमा की ज़िम्मेदारी तो हम समझ चुके है अब आम मुसलमान से क्या तक़ाज़ा किया गया है?
इसे कुरआन में कुछ इस तरह बयान किया गया हैं:
मोमिन मर्द और मोमिन औरतें, (वो भी) एक दूसरे के रफ़ीक़ (सहचर) हैं । (इन मुनाफ़िक़ों के बरख़िलाफ़) वो भलाई की तलक़ीन करते और बुराई से रोकते हैं, नमाज़ का एहतिमाम करते हैं, ज़कात देते हैं और अल्लाह और उसके रसूल की इताअत (आज्ञापालन) करते हैं। यही लोग हैं जिन्हें अल्लाह जल्द ही अपनी रहमत से नवाज़ेगा। इसमें शुबा नहीं कि अल्लाह ज़बरदस्त है, वो बड़ी हिक्मत वाला है। [सूरह तौबाह 9:71]
इस आयत में ये बताया गया है कि एक मुसलमान जिस भी माहौल में हो, जहां भी वो उठे बैठे, जहां भी काम करे तो उनपर ये ज़िम्मेदारी डाली गयी है कि वो हर जगह भलाई की बातों के लिए तलकीन करते रहें और बुरे कामों से लोगों को रोकते रहें। “भलाई” क्या होती है और “बुराई” किसे कहते है इससे हर इंसान परिचित है क्योंकि अच्छाई-बुराई की बुनियादी समझ अल्लाह तआला ने हमारे अंदर इल्हाम करके ही हमें दुनिया में भेजा है। सूरह अस्र में भी इसी पैग़ाम को दोहराया गया है:
ज़माना गवाही देता है, ये इंसान घाटे में पड़कर रहेंगे हाँ मगर वो नहीं जो ईमान लायें और उन्होने नेक अमल कियें। और एक दूसरे को हक़ की नसीहत की और (हक़ पर) साबित क़दमी की नसीहत की।
[सूरह अल अस्र 103:1-3]
.
कुरआन का पैग़ाम
पार्ट-18
दावत ए दीन का तरीका
इससे पहले हम देख चुके है कि अल्लाह तआला ने पूरी उम्मत ए मुस्लिमा (बनी इसमाईल) पर ये ज़िम्मेदारी डाली है कि वो एक उम्मत की हैसियत से ख़ुदा के पैग़ाम को पूरी दुनिया तक पहुंचायें फिर हमने देखा कि मुस्लिम हुकूमत (वो दुनिया में जहां कहीं भी क़ायम हो) उसपर ये ज़िम्मेदारी डाली गयी है कि वो जामा मस्जिद का नज़्म अपने पास रखें और जुमे के मिम्बर से लोगों को दावत इलल ख़ैर करें (यानि भलाई की दावत दें), फिर हमनें देखा कि उलमा चूंकि अंबिया के बाद उनके वारिस की हैसियत रखते हैं तो उन्हें दीन में बसीरत हासिल करके क़ौम के लिए एक नज़ीर (आदर्श) बनना है। आखिर में हमने ये देखा कि आम मुसलमानों की ज़िम्मेदारी ये हैं कि उन्हें खुद दीन पर अमल करने के साथ साथ अपने गिर्दोपेश में भी भलाई की दावत देते रहना है और बुराई से रोकते रहना है। अब सवाल ये हैं कि दीन की दावत देने का क्या तरीक़ा हमें कुरआन मजीद ने सिखाया है?
इरशाद है:
तुम, (ए पैग़ंबर), अपने परवरदिगार के रास्ते की तरफ़ दावत देते रहो हिक्मत के साथ और अच्छी नसीहत के साथ, और उनके साथ इस तरीक़े से बहस करो जो पसंदीदा है। यक़ीनन तेरा परवरदिगार ख़ूब जानता है कि कौन उसकी राह से भटका हुआ है और वो उनको भी ख़ूब जानता है जो हिदायत पाने वाले हैं। [सूरह नहल 16:125]
आयत ए मुबारक में अल्लाह तआला ने निहायत खूबसूरती के साथ ये बताया है कि दीन की तरफ हमेशा हिकमत (तत्वदर्शिता) के साथ बुलाना चाहिए और जब भी नसीहत की ज़रूरत पेश आयें तो हमेशा अच्छी नसीहत करनी चाहिए। नसीहत जब भी कोई करें चाहे बाप बेटे को, उस्ताद शागिर्द को, शौहर बीवी को, रियासत अपने अफराद को या उलमा कभी कोई नसीहत करें तो हमेशा अच्छी नसीहत करें। चूंकि नसीहत के दौरान तल्खी आने का अंदेशा रहता हैं, लबो लहज़े में खराबी आ सकती है, टोन बिगड़ने का अंदेशा रेहता है, इसलिए ख़ासतौर पर ये तरघीब (शिक्षा) दी गयी है कि नसीहत हर हाल में भले तरीक़े से ही होनी चाहिए और उसका उसलूब (टोन) अच्छा हो, बात इस तरह से कही जाये के हमारे दिल से निकले और सीधे सामने वाले के दिल में उतर जाये।
दीन की दावत के दौरान ये अंदेशा भी रेहता हैं कि कई बार बहस की नौबत आ जाती है, कोई ऐतराज करता है तो कोई सवाल उठाता है इसलिए इसमें भी हमें ये हिदायत की गयी है कि कभी बहस भी हो जायें तो हमेशा विनम्र ही रहना चाहिए, बात इस तरह से होनी चाहिए कि उसमें कोई तल्खी न हो, कोई लान तान न हो, गाली-गलौच न हो, कोई फतवेबाजी न हो बल्कि अच्छे उसलूब में अपना मत व्यक्त किया जाना चाहिए । बात समझाने के लिए होनी चाहिए न कि थोपने या मनवाने के लिए और ना ही अपने इल्म की शेख़ी बगारने के लिए।
हम जब गुफ्तगू करते हैं तो कई बार ऐसा होता है कि दूसरे पर लान तान शुरू कर देते हैं, फतवेबाजी शुरू कर देते है, सामने वाले की नियत पर हमलावर हो जाते हैं, उसक अंजाम निश्चित करने लगते हैं, उसे जन्नत/जहन्नम के सर्टिफिकेट बांटने लगते है, उसे अलग-अलग तरह के नामों और लकाबों से बुलाने लगते है, ज़रा बहस की नौबत आने पर हम अपने तमाम अखलाक़ी (नैतिक) उसूलों को भूल जातें हैं। कुरआन मजीद ने इस आयत में हमें इससे रोका हैं। जिस वक़्त दीन की बात हो रही हो तो हमें सामने वाले के बारे में हुस्न ए ज़न (अच्छी सोच) रखना चाहिए, उनको नेक नियत समझ कर बात करनी चाहिए, उनके इख्तिलाफ़ (मतभेद) को गंवारा करना है, अपनी बात इस तरह पहुंचानी है कि दिल जीतना है, दिल और दिमाग पर प्रभाव डालना हैं, दूसरों के बारे में नफरत पैदा नहीं करनी। हमारा काम सिर्फ ये है कि हम ख़ुदा का पैग़ाम निहायत ख़ूबी के साथ लोगों तक पहुंचा दें। याद रहें हम किसी पर दारोगा बनाकर नहीं भेजे गयें है। ये वो चीज़ें हैं जिसे हर उस शख़्स को अपने दिल और दिमाग में रखनी चाहिए जिसे अल्लाह तआला अपना पैग़ाम पहुंचाने की तौफीक दे।
औऱ हमारी ज़िम्मेदारी तो केवल स्पष्ट रूप से संदेश पहुँचा देने की हैं।
[सूरह यासीन 36:17]
एक आखरी बात इसमें ये बतानी है कि कई बार ऐसा होता है कि किसी शख़्स से बात करने के दौरान हमें महसूस होता है कि सामने वाला शख़्स किसी चीज़ को समझने के मूड में नहीं है बल्कि वह सिर्फ उपहास उड़ाने आर ताना देने के के लिए आया है। कई बार ऐसे शख़्स बदज़बानी करते है और बदतमीजी से पेश आते है। कुरआन मजीद ने हमें बताया है कि जब भी ऐसा मामला हो तो उसमें हमारा रवैया कैसा होना चाहिए।
चुनांचे इरशाद है:
रहमान के (प्रिय) बन्दें वहीं है जो धरती पर नम्रतापूर्वक चलते है और जब जाहिल उनसे उलझने की कोशिश करें तो उनको सलाम करके अलग हो जाते हैं। [सूरह अल फुरकान 25:63]
यानि मुराद ये है कि ऐसा मौकों पर बहस में उलझकर अपना समय बर्बाद नहीं करना चाहिए और न ही उनकी तरह बदतमीजी पर उतरना चाहिए, बल्कि शाइस्तगी से सलाम करके उनसे अलग हो जाना चाहिए। जब तक हम अपने रवईये को इन उसूलों के मुताबिक नहीं ढालेंगे तब तक ये अमल ख़ुदा की मंशा के मुताबिक़ अमल न कहलाएगा।
अल्लाह तआला से दुआ है:
"मेरे रब! मेरा सीना मेरे लिए खोल दे और मेरे काम को मेरे लिए आसान कर दे और मेरी ज़बान की गिरह खोल दे कि वे मेरी बात समझ सकें।
[सूरह ताहा 20:25-27]
कुरआन का पैग़ाम
पार्ट-19
नुसरत ए दीन
हम जब ईमान लाते हैं तो ये ईमान हमसे कुछ चीजों का तक़ाज़ा करता हैं उसका पहला तक़ाज़ा ये है कि हम अच्छा अमल करें। जब हमनें ये मान लिया कि हमारा एक परवरदिगार है और इस बात को स्वीकार कर लिया कि एक दिन हमें उसके सामने जवाबदेह होना है, जब हमने ये मान लिया कि मुहम्मदूर रसूलुल्लाह (स0) अल्लाह के पैगंबर है और हम आप पर ईमान ले आयें है तो उसी ईमान के लाज़मी तकाज़े (स्वाभाविक परिणाम) के तौर पर अब हमें अपनी ज़िंदगी पर एक निगाह डालकर देखनी है कि कहीं हम बुरे आमाल में लिप्त तो नहीं हैं या क्या हम अच्छा अमल कर रहे है? हमारे अखलाक, हमारा किरदार और हमारी सीरत कैसी है? क्या हम सच बोलते है, लोगों के साथ इंसाफ करते है, भलाई की बात करते है, हम किसी का हक नहीं मारते, हम मिलावट नहीं करते, हम धोका नहीं देते, हम फरेब नहीं देते, हम किसी के माल पर क़ब्ज़ा नहीं करते, हम किसी की जान माल आबरू को नुकसान नहीं पहुंचाते, हम खियानात नहीं करते, हम गबन नहीं करते, हम सच्चाई पर कायम है और सच्चाई की दावत देनें वाले हैं, ये आमाल-ए-सालेह है यानि अच्छे आमाल है और ईमान का सबसे पहला तक़ाज़ा यही है कि हम अच्छे अमल (कर्म) करें। ईमान का दूसरा तक़ाज़ा ये है कि हम जिस हक़ को खुद समझ चुके है अपने गिर्दोपेश (आस-पास) के माहौल में लोगों को उसकी दावत दें। ये तकाजे तो हर वक़्त हर माहौल में हर इंसान से हैं लेकिन इसके अलावा फिर ईमान के कुछ ऐसे तकाज़े भी है जो हालात के लेहाज़ से पैदा होते है इनमें से एक तक़ाज़ा वो है जिसे "नुसरत ए दीन" कहते है यानि "दीन की मदद"।
इसे कुरआन मजीद ने सूरह सफ़्फ़ की आयत 14 में बयान किया है:
ईमान वालो, अल्लाह के मददगार बनों , जिस तरह ईसा इबन-ए-मरियम ने हवारियों से कहा था: कौन अल्लाह की राह में मेरा मददगार बनता है? हवारियों ने जवाब दिया: हम अल्लाह के मददगार हैं। चुनांचे बनी इसराईल में से एक गिरोह ईमान लाया और एक गिरोह अपने कुफ़्र पर जमा रहा। फिर हमने ईमान वालों की उनके दुश्मनों के मुक़ाबले में मदद की तो वही ग़ालिब हो कर रहे। [सूरह सफ़्फ़ 61:14]
वाक़या ये है कि जब यहूद ने हज़रत ईसा की दावत को कुबूल करने से इन्कार कर दिया तो हज़रत मसीह अलैहिस-सलाम ने अपने साथीयों को आगे की जद्द-ओ-जहद के लिए तैयार रहने को कहा और उन्होनें फ़रमाया कि मैं तो ख़ुदा की राह में निकल पड़ा हूँ, अब जिसमें हौसला हो , वो उठे और मेरा साथ दे। यानी हम इस काम में हिस्सा लेने के लिए तैयार हों जो अल्लाह तआला चाहता तो अपनी क़ुव्वत के ज़रीये कर सकता था लेकिन इसके बजाए उसने अपने बंदों के ज़रीये ऐसा करवाना चाहा।
अल्लाह ने अपना दीन पैगंबरों के ज़रिये भेजा है और इस दीन को पैगंबरों ने इन्सानों तक पहुंचाया है और फिर इन्सानों ने दूसरे इन्सानों तक पहुंचाया है । इस दीन को मदद की ज़रूरत होती है और ये मदद कई लेहाज़ से हो सकती है। यानि ऐसा होता है कि इस दीन का कोई मरकज़ (केंद्र) बनाने की ज़रूरत पड़े जैसे हज़रत इब्राहीम ने “बैतुल्लाह” को दीन का मरकज़ बनाया या हज़रत सुलैमान/हज़रत दाउद ने “बैतुल-मक़्दिस” की सूरत में एक मरकज़ बनाया। मौजूदा दौर में ये ज़रूरत होती है कि कहीं मुसलमानों की आबादी है तो वहाँ मस्जिद बनाई जाये। इसी तरह इस दीन की एक ये ज़रूरत होती है कि इसके लिए कोई दीनी तालीम का एहतेमाम किया जाये, दीन के आलिम बनाने का एहतेमाम किया जाये, दीन के पैगाम को पहुँचाने के लिए साधन का इंतेज़ाम किया जाये। इसके लिए किसी को अपना वक़्त देना है, किसी को अपनी ऊर्जा लगानी करनी है, किसी को अपनी पूंजी देना है, इन सब चीज़ों को नुसरत-ए-दीन (यानि दीन की मदद) कहा जाता है। ये भी ईमान के तक़ाज़ों में से एक अहम तक़ाज़ा हैं।
हमारी मुसलमान उम्मत में दीन की नुसरत (मदद) के जितने काम होते रहे है वो सारे इसी के तहत है। इसमें ज़ाहिर है कि हालात बहुत बहुत बड़ा किरदार अदा करता है यानि कहाँ पर किसी चीज़ की ज़रूरत है ये हर शख़्स अपनी समझ के मुताबिक तय करेगा कि इस वक़्त, इस ज़माने में, इस माहौल में फलां चीज़ की ज़रूरत है । मान लीजिये हम किसी दूसरे मुल्क में गए है और हम महसूस करते है कि वहाँ कोई इस्लामी मरकज़ बनना चाहिए या फिर दीनी तालीम का कोई एहतेमाम होना चाहिए या उलमा पैदा करने के लिए आला इदारे (संस्था) होनी चाहिए या दीन पर तहक़ीक़ी काम (रिसर्च वर्क) के लिए अकडेमी होनी चाहिए वगैरह तो हमें इसके लिए तन-मन-धन से कोशिश करनी चाहिए। इसी को नुसरत ए दीन कहा जाता है। जब भी कोई पैगंबर दुनिया में आते हैं तो वो भी लोगों से कहते है कि ईमानवलो हमारे मददगार बन जाओ। ये याद रहें कि अल्लाह तआला को किसी की मदद की ज़रूरत नहीं है बल्कि ये उन्हीं की स्कीम है कि वो इन्सानो के ज़रिये से ये काम करवाये।
इसी बात को कुरआन मजीद में एक दूसरे अंदाज़ में भी बयान किया गया है:
कौन है जो अल्लाह को क़र्ज़ देगा, अच्छा क़र्ज़ कि अल्लाह उस के लिए उसे कई गुना बढ़ा दे। और अल्लाह ही है जो तंगी भी करता है और फ़राख़ी भी । (इस लिए जो कुछ मिला है , ये उसी की इनायत है ) और तुमको ( एक दिन) उसी की तरफ़ लौटना भी है। [सूरह बकरह 2:245]
अल्लाह तआला ने ईमानवालों द्वारा की गयी उसकी राह में कोशिश को अपने ज़िम्मे "अच्छा कर्ज़" करार दिया है। क़र्ज़दार के ज़िम्मे वाजिब होता है कि वो उसे लौटाये। रब्बे करीम का कितना बड़ा एहसान है कि जो माल उसने ख़ुद अपने बंदों को इनायत फ़रमाया है , वही माल वो जब उनसे अपनी राह में ख़र्च करने के लिए कहता है तो उसको अपने ज़िम्मे क़र्ज़ ठहराता है , यानी उसकी वापसी खु़द अपने ज़िम्मे वाजिब क़रार देता है। फिर इससे ज़्यादा दिल को छूने वाली बात ये है कि वो परवरदिगार ये क़र्ज़ इसलिए मांगता है कि वो उसका सवाब कई गुना बढ़ाकर अपने बंदों को वापिस करे। इस गलतफ़हमी में न पड़ जाना कि उसके खजाने में कमी आने के कारण उसे इस क़र्ज़ की ज़रूरत पेश आई है। उसका ख़ज़ाना तो भरपूर है लेकिन ये उसकी रहमत है कि उसने अपने बंदों के लिए कई गुना नफ़ा कमाने की ये राह खोली।
कुरआन का पैग़ाम
पार्ट-20
कियाम बिल क़िस्त (इंसाफ पर क़ायम रहो)
ईमान सिर्फ ये नहीं है कि हम चंद वास्तविकताओं को स्वीकार कर लें। बल्कि हम जब ये कहते है कि हमारा एक परवरदिगार है और हम जब इस बात का एतराफ़ करते है कि एक दिन हमें उसके सामने जवाबदेह होना है तो इसके कुछ तकाजे है जो हमें हर हाल मे पूरे करने होते हैं। हम पहले ये बयान कर चुके है कि ईमान का एक तक़ाज़ा ये है कि हम अच्छा अमल करें, एक तक़ाज़ा ये है कि हम अपने गिर्दोपेश (आस-पास) में हक़ और हक़ पर साबित क़दमी (दृड़ रहने) की नसीहत करेंगे, एक तक़ाज़ा ये है कि हम ख़ुदा के दीन की मदद करेंगे, इसी तरह एक तक़ाज़ा “कियम बिल क़िस्त” का बयान किया गया है यानि हम ईमान रखते है तो फिर हमें हर हाल में इंसाफ पर कायम रहना है, निजी ज़िंदगी में भी और सामूहिक ज़िंदगी में भी। चुनांचे इरशाद है:
ईमान वालो, इन्साफ़ पर क़ायम रहो, अल्लाह के लिए उसकी गवाही देते हुए, अगरचे ये गवाही ख़ुद तुम्हारी ज़ात, तुम्हारे माँ बाप और तुम्हारे क़राबत मंदों के ख़िलाफ़ ही पड़े। अमीर हो या ग़रीब, अल्लाह ही दोनों के लिए ज़्यादा हक़दार है, इस लिए (ख़ुदा की हिदायत को छोड़कर) तुम ख़्वाहिशों की पैरवी ना करो कि इस के नतीजे में हक़ से हट जाओ और (याद रखो कि) अगर (हक़-ओ-इन्साफ़ की बात को) बिगाड़ने या (इससे) पहलू बचाने की कोशिश करोगे तो (याद रखो कि) जो कुछ तुम करते हो अल्लाह उससे ख़ूब वाक़िफ़ है। [सूरह निसा 4:135]
सामाजिक जीवन में बार बार ऐसा होता है कि इंसान के सामने ऐसे मामले आते है जिसमें एक रास्ता अपने फायदे और ख़्वाहिश का होता है और दूसरा हक और इंसाफ का। जो लोग अल्लाह की तरफ से घाफिल होते है, जिन्हें यकीन नहीं होता कि अल्लाह हर वक़्त उन्हें देख रहा है वे ऐसे मौको पर अपनी खवाहिश के रुख पर चल पड़ते है। वे इसे कामयाबी समझते है कि हक़ की परवाह ना करें और मामले को अपने फायदे और अपनी मर्ज़ी के मुताबिक तय करें। मगर जो अल्लाह से डरते है, जो अल्लाह को अपना निगरान बनायें हुए है, वे तमामतर इंसाफ के पहलू को देखते है और वही करते है जो हक़ और इंसाफ का तक़ाज़ा है। उनकी कोशिश हमेशा यही होती है कि उन्हें मौत आयें तो इस हाल में आए कि उन्होने किसी के साथ बेनसाफ़ी न की हो, वो अपने आप को मुकम्मल तौर पर न्याय पर कायम किए हो। उनकी इनसाफ़पसंदी का यह जज़्बा इतना बढ़ा हुआ होता है कि उनके लिए नामुमकिन हो जाता है कि वो इंसाफ से हटा हुआ कोई रवैया देखें और उसे बर्दाश्त कर लें। जब भी ऐसा कोई मामला सामने आता है कि एक शख़्स दूसरे शख़्स के साथ नाइंसाफी कर रहा हो तो वो ऐसे मौके पर हक़ का ऐलान करने से पीछे नहीं हटते। अगर इंसाफ का ऐलान करने मे उनके करीबी रिशतेदारों के खिलाफ़ गवाही जाती हो या उनकी अपनी मसलिहतें प्रभावित होती हो तब भी वे वहीं करते है जो इंसाफ के लेहाज़ से उन्हें करना चाहिए। उनकी ज़बान खुलती है तो अल्लाह के लिए खुलती है न कि किसी और चीज़ के लिए। इसी तरह ये बात भी गलत है कि सामने वाला ताकतवर हो तो उसे उसका हक़ दे दिया जायें और अगर वो कमजोर हो तो उसका हक़ उसे ना दिया जाये। मोमिन वह है जो हर आदमी के साथ इंसाफ करें चाहे वह ताकतवर हो या कमज़ोर।
यहाँ एक अहम बात समझने की ये है कि जब कोई आदमी नाइंसाफी का साथ दे रहा होता है तो वह यह कहकर ऐसा नहीं करता कि में नाइंसाफ़ी करने वालों का साथी हूँ बल्कि वह अपनी नाइंसाफी को इंसाफ का रंग देने की कोशिश करता है। ऐसे मौके पर हर आदमी दो में से एक तरीके इख्तियार करता है। या तो वह ये करता है कि बात को बदल देता है और मामले को ऐसे अलफाज में बयान करता है जिससे ज़ाहिर हो कि यह नाइंसाफी का मामला नहीं बल्कि पूरे इंसाफ का मामला है और जिसके साथ ज्यादती की जा रही है वो इसी का मुस्तहिक है और उसके साथ ऐसा ही होना चाहिए। दूसरी सूरत यह है कि आदमी खामोशी इख्तियार कर लें। यह जानते हुए कि यहाँ नाइंसाफी की जा रही है वह मुंह चुराकर कर निकाल जाये और जो कहने की बात है उसे ज़बान पर न लाये । इस क़िस्म का अमल साबित करता है कि आदमी अपने ऊपर अल्लाह को निगरान नहीं समझता।
इंसाफ के इसी तकाज़े को "सूरह अल माइदाह" में इज्तिमाई (सामूहिक) ज़िंदगी के बारे में बयान किया है। आमतौर पर ये होता है कि हम इनफ़िरदी (निजी) मामलों में तो इसे कुबूल कर लेते है लेकिन जब दूसरी क़ौमों का मामला हो तो कई लोग ऐसा समझते है कि अपनी क़ौम के फायदे के लिए झूठ बोल दिया जाये और सच्चाई को छुपा दिया जाये। ये दोहरापन दुनिया में आपको बहुत जगह देखने को मिलेगा। कुरआन मजीद ने पूरी शिद्दत के साथ इस रवैये का रद्द किया है । चुनांचे इरशाद है:
ईमान वालो,(इस प्रतिज्ञा और वादे का तक़ाज़ा है कि ) अल्लाह के लिए खड़े हो जाओ, इन्साफ़ की गवाही देते हुए और किसी क़ौम की दुश्मनी भी तुम्हें इसपर ना उभारे कि इन्साफ़ से फिर जाओ। इन्साफ़ करो, ये तक़्वा से ज़्यादा क़रीब है और अल्लाह से डरते रहो। बेशक, अल्लाह तुम्हारे हर अमल से बा-ख़बर है। [सूरह माइदाह 5:8]
इंसाफ का मतलब यह है कि किसी शख़्स के साथ कमी बेशी किए बगैर वह सुलूक करना जिसका वह हकदार है। मामलात में हक़ को अपनाना है न कि ख्वाहिशात को। मतलब ये है कि हममें से हर शख़्स ना सिर्फ ये कि हक़ और इन्साफ़ पर क़ायम रहे, बल्कि अगर कभी गवाही देना भी पड़ जाये तो जान की बाज़ी लगाकर ये मांग भी पूरी करना है। हक़ कहें, इन्साफ़ करें, इन्साफ़ की गवाही दें और अपने अक़ीदा और अमल में हक़ और इन्साफ़ के सिवा कभी कोई चीज़ इख़तियार ना करें। यहां तक कि किसी क़ौम की दुश्मनी भी हमें आमादा ना करें कि हम हक़ और इन्साफ़ की राह से हट जाये। काई बार ऐसा होता है कि शिकायतें और तल्ख यादें हम पर असरन्दाज हो जाती है और हमें इंसाफ से हटने पर आमादा करती है लेकिन कुरआन मजीद ने हमें ये तालीम दी है कि दुश्मनों और बातिलपरसतों से मामला करते वक़्त भी हमें अपने आप को इंसाफ से बाँधें रखना है। यही दीन का तक़ाज़ा है। यानि अगर ये तक़ाज़ा पूरा नहीं हुआ तो ईमान का हक़ अदा नहीं हुआ और इसके लिए हमें जवाबदेह होना है।
.
कुरआन का पैग़ाम
पार्ट-21
इंसानी जान की अहमियत
ख़ुदा की शरीयत में तीन ऐसे जुर्म है जिसे करने वाले को हमेशा की जहन्नम की चेतावनी है। पहला है शिर्क, दूसरा है किसी मासूम इंसान का क़त्ल करना और तीसरा है बदकारी। इस बात को अल्लाह तआला ने सूरह फ़ुरकान में बयान किया है। इरशाद है:
और (वो हैं) जो अल्लाह के साथ किसी दूसरे माबूद को नहीं पुकारते, अल्लाह की हराम की हुई किसी जान को नाहक़ क़तल नहीं करते और ना ज़िना के मुर्तक़िब होते हैं। ये गुनाह जो शख़्स भी करेगा, उनका नतीजा भुगतेगा। क़ियामत के दिन उसका अज़ाब बढ़ता ही जाएगा और वो उसमें ज़लील होकर हमेशा रहेगा। [सूरह अल फ़ुरकान 25:69]
इंसान की जान, माल, इज्ज़त और आबरू सबको सम्मान हासिल है। जो शख़्स भी किसी मासूम इनसान का क़त्ल करेगा वो हमेशा की जहन्नम का मुस्तहिक होगा। किसी मासूम इंसान की जान लेना कोई मामूली जुर्म नहीं है। “जीवन” इंसान के लिए सबसे बड़ी नेमत होती है और जब कोई शख़्स किसी मासूम इंसान को क़त्ल करता है तो वो गोया उसे सबसे बड़ी नेमत से महरूम करता है जो बड़ी हिमाकत का काम है। इंसान की जान की क़ीमत को अल्लाह तआला ने एक दूसरे मक़ाम पर और वज़ाहत के साथ बयान किया है। इरशाद है:
(इन्सान की) यही (सरकशी) है जिसकी वजह से हमने (मूसा को शरीयत दी तो उसमें) बनी-इसराईल पर भी फ़र्ज़ कर दिया कि जिसने किसी एक इन्सान को क़तल क्या, उसके बग़ैर कि उसने किसी को क़तल किया हो या ज़मीन में कोई फ़साद बरपा किया हो तो उसने गोया तमाम इन्सानों को क़तल कर दिया और जिसने किसी एक इन्सान को ज़िंदगी बख़शी, उसने गोया तमाम इन्सानों को ज़िंदगी बख़श दी। (फिर यही नहीं, उसके साथ) ये भी हक़ीक़त है कि (उन पर इतमाम-ए-हुज्जत के लिए) हमारे पैग़ंबर उनके पास निहायत वाज़िह निशानीयां लेकर आए, लेकिन इसके बावजूद उनमें से बहुत से हैं जो ज़मीन में ज़्यादतियां करने वाले हैं।
[सूरह अल माइदाह 5:32]
ऊपर बयान की गयी आयत में अललह तआला ने जिस शान के साथ इंसानी जान की अहमियत को बयान किया है उससे बेहतर बयान करना मुमकिन ही नहीं। आयत में अलफाज “नफ़्स” इस्तेमाल हुआ है जो तमाम इंसानों के लिए बोला जाता है चाहे वो किसी भी धर्म, जाती, रंग, नस्ल या संप्रदाय का हो। जब भी कोई शख़्स किसी शख्स को क़त्ल करता है चाहे वो किसी भी पंथ का हो तो वो सिर्फ एक इंसान का क़ातिल नहीं होता बल्कि वो तमाम इंसानों और पूरी इंसानियत का क़ातिल होता है। ऐसा इसलिए क्योंकि किसी को नाहक़ क़त्ल करने से वो उस क़ानून को तोड़ता जिससे तमाम इंसानों की ज़िंदगियाँ बंधी हुई है। अगर आयत मुबारक में सिर्फ इतना ही बयान होता तो वो भी जान की अहमियत बताने के लिए काफी था लेकिन अल्लाह तआला की शान देखिये कि उसने इससे आगे ये भी फरमाया कि जिस किसी शख़्स ने किसी एक इंसान की जान बचाई तो गोया कि उसने पूरी इंसानियत को बचा लिया। इसलिए जब कोई शख़्स किसी को ज़ालिम के ज़ुल्म से नजात देता है तो वो सिर्फ एक शख़्स को नजात देने वाला नहीं होता बल्कि बल्कि तमाम इंसानों को नजात देने वाला होता है। ऐसा इसलिए क्योंकि ऐसा करके वो उस उसूल की हिफाज़त करता है जिसके अनुसार तमाम इन्सानों की जान सम्माननीय है। मालूम हुआ कि कोई शख़्स अगर किसी दूसरे शख़्स को ख़तरे में देखे तो उसको पराया झगड़ा समझ कर नज़रअंदाज करना उसके लिए बिलकुल जायज़ नहीं है, बल्कि उसकी हिफ़ाज़त और हिमायत करना उसके लिए ज़रूरी है, चाहे उसके लिए उसे ख़ुद जोख़िम बर्दाश्त करना पड़े। ऐसा इसलिए कि जो शख़्स किसी मज़लूम की मदद करता है तो वो सिर्फ़ मज़लूम ही की हिमायत नहीं कर रहा होता, बल्कि तमाम इंसानियत की हिमायत कर रहा होता है जिसमें वो ख़ुद भी शामिल है।
इसी के साथ इस आयत में ये भी बता दिया गया है कि किन मामलों में किसी शख़्स को हुकूमत “सज़ा ए मौत” दे सकती है। ऐसे सिर्फ दो ही जुर्म है, पहला ये कि उस शख़्स ने ख़ुद किसी का क़त्ल किया हो और दूसरा ये कि वो “फ़साद फिल अर्ज़” का मुर्तकिब हो (यानि ज़मीन में फसाद फैला रहा हो)। ये वो जुर्म है जिसके अलावा किसी भी जुर्म के लिए मौत की सज़ा नहीं दी जा सकती। याद रहे की ये सज़ा किसी व्यक्ति को नाफ़िज़ (लागू) करने का अधिकार बिलकुल नहीं है बल्कि ये काम हुकूमत का है। सिर्फ हुकूमत या अदालत ही ये सज़ा नाफ़िज़ कर सकती है वो भी तब जब जुर्म आख़री दर्जे में साबित हो जाये।
क़ातिल की सज़ा क़त्ल इसलिए है क्योंकि जब कोई शख़्स किसी दूसरे शख़्स को जानबूझकर क़त्ल करता है तो वो अपनी जान को हासिल सम्मान खो बैठता है। और हुकूमत पर ये लाज़िम होता है कि वो उसका क़िसास (बदला) ले। दूसरा जुर्म जिसके लिए क़त्ल की सज़ा बयान की गयी है वो है “फ़साद फिल अर्ज़”। “फ़साद फिल अर्ज़” का मतलब होता है ज़मीन में फ़साद फैलाना, इसको अँग्रेजी में “anarchy” या "disorder" और हिन्दी में “अराजकता” कहते है। “फ़साद फिल अर्ज़” का मतलब होता है कि जब कोई शख़्स या गिरोह क़ानून से बग़ावत करके लोगों की जान, माल, इज्ज़त, आबरू के ख़िलाफ़ उठ खड़ा हो। जब क़तल आतंकवाद बन जाये, व्यभिचार बलात्कार बन जाये और चोरी डाका बन जाये या लोग बदकारी को पेशा बना लें या फिर देश के ख़िलाफ़ बग़ावत के लिए उठ खड़े हो इत्यादि तो ये सभी जुर्म “फ़साद फिल अर्ज़” कहलाते है। ऐसे मुजरिमों को सिर्फ़ क़तल ही नहीं, बल्कि इबरतनाक तरीक़े से क़तल करने का हुक्म है। ध्यान रहे कि ये सज़ा इंतिहाई है यानि ये सज़ा तब ही दी जा सकती है जब ऐसा करने वाला अपने हालात और परिस्थितियों के लेहाज़ से किसी भी रियायत का पात्र न हो। वो रियायत का पात्र है या नहीं इसका फैसला ज़ाहिर है अदालत ही करेगी। ये मैंने सैद्धांतिक तौर पर कुछ बातें रखी है, इसकी और भी ज़रूरी व्याख्या है जिसे यहाँ बयान करना फिलहाल मक़सद नहीं।
कुरआन का पैग़ाम
पार्ट-22
जिहाद की हक़ीक़त
जिहाद का मतलब होता है "कोशिश करना" यानि किसी जद्दोजहद में अपनी पूरी ताक़त लगा देना। कुरआन मजीद में "जिहाद" का लफ़्ज़ अल्लाह की राह में की गयी आम कोशिश के लिए भी आया है और जंग के लिए भी इस्तेमाल हुआ है। वैसे अल्लाह की राह में "जंग" के लिए आमतौर पर कुरआन में "किताल" का लफ़्ज़ इस्तेमाल हुआ है। अल्लाह तआला ने "कुरआन के पैग़ाम" को आम करने के लिए की गयी कोशिश को "जिहादन कबीरा" क़रार दिया है यानि बहुत बड़ा जिहाद।
इरशाद है:
अतः इनकार करनेवालों की बात न मानना और इस (क़ुरआन) के द्वारा उनसे जिहाद करो, बड़ा जिहाद! (जी तोड़ कोशिश)।
[सूरह फ़ुरकान 25:52]
हमारा मक़सद यहाँ जिहाद के जंग वाले पहलू को स्पष्ट करना है। इसकी दो सूरतें क़ुरआन मजीद में बयान हुई हैं:
1. एक कुफ़्र के ख़िलाफ़ जंग
2. दूसरे ज़ुल्म और ज़्यादती के ख़िलाफ़ जंग।
पहली सूरत का ताल्लुक़ शरीयत से नहीं है बल्कि अल्लाह तआला के एक ख़ास क़ानून से है जिसे क़ानून "इतमाम-ए-हुज्जत" कहते है। ये जिहाद इस दुनिया में हमेशा उसके "रसूलों" के ज़रिये से लागू होता रहा है। यानि जब कोई रसूल किसी क़ौम की तरफ भेजा जाता है तो उस क़ौम के भविष्य का फैसला अल्लाह तआला इसी दुनिया में कर देते है। जो लोग रसूल पर ईमान लाते है उन्हें इस दुनिया के जीवन में हुकूमत दे दी जाती है और जो लोग रसूल का इनकार करते है उन्हें इस दुनिया से मिटा दिया जाता है। क़ौम ए नूह, क़ौम ए आद, क़ौम ए समूद, क़ौम ए लूत इत्यादि पर जो आज़ाब नाज़िल हुआ वो इसी क़ानून के मुताबिक था। इन्सानी इतिहास में इस क़ानून का ज़हूर (implementation) आख़िरी मर्तबा हज़रत मुहम्मद (स) की क़ौम के साथ पेश आया क्योंकि हज़रत मुहम्मद (स) आख़री रसूल थे।
इस क़ानून के तहत आपने कुफ़्र के ख़िलाफ़ जो जंगें लड़ी हैं, वो महिज़ जंगें ना थीं, बल्कि ख़ुदा का अज़ाब था जो ख़ुदा के इस क़ानून के मुताबिक़ था। । और ये आज़ाब अरब के मुशरिकीन और यहूद और नसारा पर नाज़िल किया गया। इसके साथ ही आप पर नबुव्वत ख़त्म कर दी गई है। इसलिए लोगों के ख़िलाफ़ महिज़ उनके कुफ़्र (इस्लाम से इन्कार) की वजह से जंग करना और उनका क़तल करना हमेशा के लिए ख़त्म हो गया है। क़ियामत तक कोई भी शख़्स अब दुनिया की किसी क़ौम पर या किसी शख़्स पर इस मक़सद से हमला बिलकुल नहीं कर सकता। इरशाद है:
प्रत्येक समुदाय के लिए एक रसूल है। फिर जब उनके पास उनका रसूल आ जाता है तो उनके बीच न्यायपूर्वक फ़ैसला कर दिया जाता है। उनपर कुछ भी अत्याचार नहीं किया जाता। [सूरह युनूस 10:47]
हम कभी सज़ा नहीं देते, जब तक एक रसूल ना भेज दें।
[सूरह अल इसरा 17:15]
कुरआन मजीद में "सूरह तौबाह" और दूसरे सूरतों की दीगर आयतें इसी आज़ाब और सज़ा से संबंधित है। लोग गलती ये करते है की इस सूरत में बयान हुए ख़ुदा के आज़ाब/सज़ा को आम जंग का हुक्म समझ बैठते है और ये आक्षेप करते है की कुरआन मजीद ने सभी "ग़ैर मुस्लिमों" को मारने का हुक्म दिया है। हरगिज़ नहीं! कुरआन मजीद ने साफ साफ इसका ऐलान किया है कि ये कोई आम (general) हुक्म नहीं बल्कि रसूल की क़ौम के साथ ख़ास (specific) हुक्म है। अमल (Application) के लेहाज़ से आज के दौर से इसका कोई संबंध नहीं है। ये बात बहुत अच्छी तरह समझ ले।
ये आज़ाब है इसे कुरआन में ख़ुद बयान किया गया है। इरशाद है:
उनसे लड़ो, अल्लाह तुम्हारे हाथों से उन को सज़ा (आज़ाब) देगा और उन्हें ज़लील और ख़ार करेगा और तुम्हें उन पर ग़लबा अता फ़रमाएगा।
[सूरह तौबाह 9:14]
दूसरी सूरत, यक़ीनन इस्लामी शरीयत का हुक्म है। मुस्लमान केवल "ज़ुल्म और ज़्यादती" के खिलाफ ही जंग कर सकता है। इस्लामी शरीयत में जिहाद ईसी मक़सद से किया जाता है। ये मन की इच्छा के लिए, माल-दौलत के लिए, ज़मीन की हुकूमत के लिए, नाम और शौहरत के लिए हरगिज़ नहीं किया जा सकता। जिहाद के लिए कुरआन में जो क़ानून बयान हुआ है वो संक्षेप में इस तरह है:
1. जिहाद और क़िताल का हुक्म मुस्लमानों की हुकूमत (government) को दिया गया है न की किसी व्यक्ति या गिरोह को। इसकी जो आयतें भी क़ुरआन में आई हैं उनका मुखातिब मुस्लिम हुकूमत है ना कि कोई शख़्स या गिरोह। कोई व्यक्ति या गिरोह हरगिज़ ये हक़ नहीं रखता कि अपनी तरफ़ से इस तरह के किसी इक़दाम का फ़ैसला करे।
2. क़ुरआन में इसका हुक्म "फ़ितने" के खात्मे के लिए आया है। "फ़ितने" का मतलब किसी शख़्स को ज़ुल्म और ज़बरदस्ती के साथ उसके मज़हब से फेरने की कोशिश करना है। यही चीज़ है जिसे अंग्रेज़ी ज़बान में persecution कहा जाता है। जिस जगह भी इस मामले कि कोई ज़बरदस्ती हो रही हो चाहे वो किसी भी मज़हब के मानने वाले के साथ हो रही हो, एक मुस्लिम हुकूमत का फर्ज़ है कि इस ज़बरदस्ती को ख़त्म करने की कोशिश करे। और लोगों को आज़ाद मर्ज़ी से अपने-अपने धर्म पर चलने की सहूलत दे।
3. जिहाद मुस्लमानों पर उस वक़्त तक फ़र्ज़ नहीं होता, जब तक दुश्मन के मुक़ाबले में उनकी जंगी कुव्वत एक ख़ास हद तक ना पहुंच जाये।
4. जिहाद में हिस्सा ना लेना सिर्फ इस सूरत में जुर्म होता है, जब कोई मुस्लमान हुकूमत के ऐलान के बावजूद भी व्यक्ति घर में बैठा रहे।
5. जिहाद नैतिक हदों से बेपरवाह होकर नहीं किया जा सकता। नैतिकता हर हाल में और हर चीज़ से आगे हैं और जंग के मौक़ा पर भी अल्लाह तआला ने उसकी खिलाफवरज़ी की इजाज़त किसी शख़्स को नहीं दी। इसके संबंध में सबसे अहम हिदायत जो क़ुरआन में बयान हुई है, वो "वचन" की पाबंदी है। कोई ऐसी क़ौम जिससे मुस्लिम हुकूमत ने संधि की हो अगर वो मुस्लमानों पर ज़ुलम भी कर रही हो तो भी संधि के खिलाफ कोई काम नहीं किया जा सकता। ईसी तरह जो लोग जंग के लिए ना निकलें उनके ख़िलाफ़ भी हमले की इजाज़त नहीं है। जंग सिर्फ़ लड़ाको (combatants) के ख़िलाफ़ ही की जा सकती है। आम शहरियों पर तलवार हरगिज़ नहीं उठाई जा सकती।
ज़ाहिर है ये विषय बहुत बड़ा है लेहाज़ा उसे पूरा बयान कर पाना यहाँ मुमकिन नहीं। इसलिए मैंने सिर्फ संक्षेप में सिद्धांत बयान कर दिये है ताकि "जिहाद" का सही मतलब लोगों पर स्पष्ट हो जाये और कुरआन मजीद को पढ़ते वक़्त जिहाद की दोनों सूरतों का फ़र्क लोगों पर स्पष्ट रहे और कोई कन्फ़्युशन न हो। और ये साफ रहें कि कौनसी आयतें आज़ाब/सज़ा से संबंधित है और कौनसी आयतें जिहाद के आम हुक्म (general rules) से संबंधीत है। जो लोग जिहाद के नाम पर "मासूमों" की निर्मम हत्या कर रहे है वो जिहाद नहीं बल्कि "आतंकवाद" फैला रहे है। और किसी एक मासूम इंसान का कत्ल (चाहे वो किसी भी धर्म, पंथ, संप्रदाय या नस्ल का हो) इंसान को हमेशा की जहन्नम का पात्र बना देता है।
शुक्रिया !
कुरआन का पैग़ाम
पार्ट-23
ग़ैर मुस्लिम भाई और हम
सबसे पहली बात तो ये समझ लीजिये की कोई शख़्स मुसलमान और ग़ैर मुस्लिम बाद में होता है, अव्वल तो वो एक इंसान है। कुरआन मजीद ने हमें बताया है कि हम सब एक आदम और हव्वा की औलाद है। और इस लेहाज़ से हम आपस में इंसानियत के रिश्ते से बहन-भाई है। हमारी ये हैसियत किसी हाल में भी ख़त्म नहीं होती। इसलिए जो इंसानी रिश्ते है, इंसानी अधिकार है वो हर हाल में कायम रहेंगे। और इसी इंसानियत के लेहाज़ से जो ज़िम्मेदारियाँ हम पर आती है वो भी हर हाल में क़ायम रहेगी। अगर एक शख्स हमारा पड़ोसी है तो चाहे वो किसी भी मज़हब का मानने वाला हो, हमें उसके अधिकार हर हाल में अदा करना है। भलाई के काम में हमें एक दूसरे का सहयोग करना है। एक दूसरे को खुशी के मौक़ो पर मुबारकबाद देना है। किसी ग़रीब, मिसकीन, यात्री, बीमार की मदद करते वक़्त उसका मज़हब नहीं देखना है। ये वो इंसानियत का ताल्लुक है जो हर हाल में बरकरार रहना चाहिए।
कुरआन मजीद ने जगह जगह इन बातों की नसीहत की है।
और नेकी और तक़्वा के कामों में तुम एक दूसरे का सहयोग करो, मगर गुनाह और ज़्यादती के काम में किसी का सहयोग ना करो और अल्लाह से डरते रहो। [सूरह माइदाह 5:2]
ऐ लोगो! हमनें तुम्हें एक पुरुष और एक स्त्री से पैदा किया और तुम्हें बिरादरियों और क़बिलों का रूप दिया, ताकि तुम एक-दूसरे को पहचानो। वास्तव में अल्लाह के यहाँ तुममें सबसे अधिक प्रतिष्ठित वह है, जो तुममे सबसे अधिक परहेज़गार है और ख़ुदा का डर रखता है। निश्चय ही अल्लाह सबकुछ जाननेवाला, ख़बर रखनेवाला है।
[सूरह हुजूरत 49:13]
इसके बाद एक अगली चीज़ ये है कि हमतक अल्लाह तआला का एक पैगाम पहुंचा है और हमने उस पैग़ाम को कुबूल किया और उसको कुबूल करने के बाद हम पर ये बात वाज़ेह हुई कि इस पैग़ाम को मानने और इन्कार करने से लोगों की हमेशा की ज़िंदगी का दारोमदार है। यानि ये हक़ीक़त हमें पैग़ंबरों के ज़रिये से बताई गयी है कि तुम इस दुनिया में आरज़ी (temporary) तौर पर भेजे गए हो और तुम्हें एक दिन अपने परवरदिगार के सामने जवाबदेह होना है और वहाँ से एक नयी ज़िंदगी शुरू होगी। ये एक गैर मामूली ख़बर है। हम इसके संबंध में अपने ग़ैर मुस्लिम भाइयो को आगाह करेंगे। इसी को अरबी ज़बान में “इंजार” कहते है।
यानि इस बात से लोगों को खबरदार किया जाये कि एक बड़ा हादसा पेश आने वाला है और उनसे कहा जाये कि आप भी इस हादसे के लिए तैयारी कीजिये। इस दुनिया ही में अगर आप देखें तो जब कोई शख़्स किसी हादसे के पहले ख़बर कर देता है तो हम उसके शुक्रगुज़ार हो जाते है। ठीक ऐसी ही हम उस हादसे से ख़बरदार करते है, जब हममें से हर शख्स को अपने परवरदिगार के सामने जवाबदेही के लिए उठाया जाएगा। और उसके नतीजे में हमेशा की जन्नत या हमेशा की जहन्नम का फैसला किया जाएगा। इस अज़ीम हादसे से हम अपने भाइयो को खबरदार करना चाहते है। इस लेहाज़ से हमारे और उनके बीच एक ताल्लुक और पैदा होता है वो है एक "उपदेशक (दाई)" और "जिसे उपदेश दिया जाये (मदउ)" का ताल्लुक। ये ताल्लुक अपनी असल के लेहाज़ से हमसे ये तक़ाज़ा करता है कि हम ख़ैरख़ाह बनकर उठे।और खेरखाही का जज़्बा ये मांग करता है कि हमें उनसे मुहब्बत हो। अगर हम दुश्मनी के ताल्लुक को बुनियाद बनाकर उठेंगे तो हम ये ताल्लुक कभी पैदा नहीं कर सकते। इसलिए इस बात को अच्छी तरह समझ लेना चाहिए कि हमें दुनिया में हर गैर मुस्लिम भाई को चाहे वो जहां भी रेहता हो ख़ुदा का ये पैग़ाम इज्ज़त और एहतेराम के साथ पहुंचाना है। दुनिया में मतभेद होते है लेकिन इन मतभेदों को हमें गंवारा करना है और शालीनता और विनम्रता का दामन नहीं कभी नहीं छोड़ना।
इसी विषय के संबंध में कुरआन मजीद ने एक बहुत अहम हिदायत दी है जिसे बदक़िसमति से हमारे कुछ भाई भूलते है और नैतिक हदें लाँग जाते है। उन्हें लगता है कि वो ख़ुदा के दीन कि कोई ख़िदमत कर रहे है लेकिन असल में वो ख़ुदा के दिये हुए निर्देशों का उल्लंघन कर रहे होते है। वो बात है किसी दूसरे धर्म के देवी- देवताओं को अपशब्द कहना। कुरआन ने ऐसा ना करने की नसीहत की है। इरशाद है:
अल्लाह के सिवा जिन्हें ये पुकारते है, तुम उनके प्रति अपशब्द का प्रयोग न करो। [सूरह अनआम 6:108]
एक उपदेशक को इस उसूल का हमेशा ख़्याल रखना चाहिए। क्योंकि असल मक़सद इंसान को ख़ुदा से जोड़ना है न कि किसी न किसी तरह से लोगों को अपने गिरोह में शामिल करना। उत्तेजित होकर बदकलामी करना जाहिलाना तरीका है। इसके उलट अगर कोई भाई आपसे द्वेष (बुग्ज़) रखता हो तो आपको उसके बुरे आचरण का जवाब बुराई से नहीं देना है बल्कि अच्छाई से देना है। जी हाँ! इसकी नसीहत भी हमें ख़ुदा की किताब ने ही की है। इरशाद है:
भलाई और बुराई समान नहीं है। तुम (बुरे आचरण की बुराई को) अच्छे से अच्छे आचरण के द्वारा दूर करो। फिर क्या देखोगे कि वही व्यक्ति तुम्हारे और जिसके बीच बैर पड़ा हुआ था, जैसे वह कोई घनिष्ठ मित्र है।
[सूरह फुस्सिलत 41:34]
शुक्रिया!
To be continue....
Comments
Post a Comment